मत्ती 6:6
पाठ
यीशु प्रार्थना का एक नक्शा नहीं, एक दरवाज़ा देते हैं: "परन्तु जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द करके अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर।" चौराहे पर खड़े होकर, देखने वालों की भीड़ के बीच प्रार्थना करने वालों के ठीक सामने वे एक बंद कमरा रख देते हैं, जहाँ कोई तालियाँ नहीं, कोई गवाह नहीं। और उस खाली कमरे में, जहाँ आपको लगता था कि कुछ भी नहीं है, वे एक उपस्थिति की घोषणा करते हैं: पिता, जो गुप्त में हैं, जो गुप्त में देखते हैं, और जो प्रतिफल देंगे। ध्यान दें कि वाक्य में सब कुछ एकवचन है, "तू", "तेरा"; भीड़ को दिया गया उपदेश यहाँ अचानक एक व्यक्ति की ओर मुड़ जाता है, और वह व्यक्ति आप हैं।
मर्म
इस वचन का केंद्र प्रार्थना की तकनीक नहीं, परमेश्वर का स्वभाव है। वे "गुप्त में" हैं, यह कहना कि वे छिपे हुए हैं और साथ ही सबसे नज़दीक हैं। उन्हें ढूँढ़ने के लिए मंच नहीं चाहिए, मंच बल्कि रास्ता रोकता है। जब दरवाज़ा बंद होता है, तो जो कुछ प्रार्थना को सहारा देता था, आवाज़ की गंभीरता, शब्दों का सलीका, दूसरों की स्वीकृति, वह सब हट जाता है, और बचता है केवल एक रिश्ता जिसे यीशु "तेरा पिता" कहते हैं। यही अनुग्रह है: प्रार्थना प्रदर्शन नहीं, संतानपन है। और "प्रतिफल"? यीशु उसे परिभाषित नहीं करते, वे उसे खुला छोड़ देते हैं। क्या हो सकता है कि जो पिता गुप्त में देखते हैं, उनका सबसे बड़ा प्रतिफल स्वयं उनका देखना ही हो? इस प्रश्न को जल्दी हल न कीजिए; उसमें ठहरिए।
सूत्र
यह बंद दरवाज़ा बाइबल में अचानक नहीं आता। परमेश्वर ने अपनी उपस्थिति के लिए जो जगह चुनी थी, वह मंदिर का सबसे भीतरी कक्ष था, परदे के पीछे, अंधेरे में, जहाँ भीड़ की निगाह नहीं पहुँचती थी। यीशु अब कहते हैं कि ऐसा भीतरी कक्ष हर शिष्य के पास है। और यह वे यों ही नहीं कहते: सुसमाचारों में वे स्वयं बार-बार भीड़ छोड़कर सूनी जगहों और पहाड़ पर अकेले प्रार्थना करने चले जाते हैं, बिना किसी दर्शक के। जो पुत्र गुप्त में पिता से बात करता है, वही हमें उस कमरे की चाबी थमाता है। छुटकारे की पूरी कहानी इसी दिशा में बहती है: परदा हटता है, दूरी घटती है, और परमेश्वर एक ऐसा नाम पा लेते हैं जो सम्बोधन बन जाता है, "पिता"।
आइना
पूछिए अपने आप से, बिना जल्दबाज़ी के: मेरी प्रार्थना में कितना हिस्सा सुना जाने के लिए है, और कितना उनसे कहने के लिए? समूह में मेरी प्रार्थना क्या ज़्यादा सुव्यवस्थित हो जाती है? घर में, बच्चों के सामने भोजन की प्रार्थना करते समय क्या मैं थोड़ा उपदेश दे रहा होता हूँ? और अगर कोई कभी न सुने, तो क्या मैं फिर भी प्रार्थना करता रहूँगा? यह वचन दिखावे को उतना नहीं कोसता जितना उस डर को उजागर करता है जो दिखावे के नीचे बैठा है: कि अगर कोई देख न रहा हो, तो जो मैंने किया वह गिना नहीं जाएगा। यीशु उसी डर पर हाथ रखते हैं। कोई देख रहा है। बस वह कोई भीड़ नहीं है।
आज ही किसी कमरे में जाइए, दरवाज़ा बंद कीजिए, और तीन मिनट तक परमेश्वर से एक ऐसी बात कहिए जो आपने आज तक किसी इंसान को नहीं बताई।
प्रश्न
अगर पिता "माँगने से पहले ही" हमारी ज़रूरतें जानते हैं, जैसा यीशु दो वचन बाद कहते हैं, तो बंद कमरे में बोलने का क्या अर्थ रह जाता है? हम किसी को सूचना नहीं दे रहे। तो प्रार्थना क्या है? यहाँ कोई सुविधाजनक उत्तर देना बेईमानी होगी। इतना ही कहा जा सकता है: सम्बन्ध में बोलना जानकारी देने के लिए नहीं होता। पर यह भी सच है कि कई बार बंद कमरे में कुछ भी नहीं होता, न आवाज़, न आँसू, न सांत्वना। यीशु उस खामोशी की व्याख्या नहीं करते। वे केवल कहते हैं कि पिता वहाँ हैं और देख रहे हैं। कभी-कभी विश्वास इसी एक वाक्य पर टिका रहता है।
मुख्य पात्र
इस वचन का मुख्य पात्र वह प्रार्थना करने वाला नहीं, वह पिता है जो गुप्त में है। ध्यान दीजिए, यीशु उन्हें "परमेश्वर" नहीं, "तेरा पिता" कहते हैं, और यह स्वामित्व का सर्वनाम इस वचन का सबसे कोमल शब्द है। यह ऐसा परमेश्वर है जो प्रचार से नहीं, अंतरंगता से पहचाना जाता है; जो प्रभावित होने की चाह नहीं रखता; जो छिपे हुए काम को गिनता है और छिपे हुए हृदय को पढ़ता है। और यही उनका दोहरा चेहरा है: जो गुप्त में देखते हैं, उनसे कुछ छिपा भी नहीं है। यह डरावना भी है और राहत भी। जिसने आपकी सबसे गंदी सोच देखी है, वही आपको संतान कहता है।
संदर्भ
यह पहाड़ी उपदेश का हिस्सा है, गलील में, यीशु की सेवकाई के आरम्भ में, ज़्यादातर गाँव के गरीब सुनने वालों के बीच। उस समाज में इज़्ज़त सार्वजनिक पूँजी थी; आदमी की कीमत इस बात से तय होती थी कि लोग उसके बारे में क्या कहते हैं। दिन में निश्चित समय पर प्रार्थना का रिवाज़ था, और चौराहे पर उस घड़ी में खड़ा होना संयोग भी हो सकता था और गणना भी। और "कोठरी" के लिए जो शब्द है, ताम्येइओन, वह असल में भंडार-कोठरी है, घर का वह छोटा अँधेरा कमरा जिसमें अनाज रखा जाता, अक्सर पूरे घर में एकमात्र जगह जिसमें दरवाज़ा लगता था। कोई प्रार्थना-कक्ष नहीं। रोज़मर्रा की एक कोठरी, और उसमें परमेश्वर।
चिंतन
आपकी प्रार्थना का कितना हिस्सा बच जाएगा, अगर कोई कभी न सुने और न जाने?
"पिता जो गुप्त में देखते हैं" यह वाक्य आपमें डर जगाता है या चैन, और यह उत्तर आपके बारे में क्या बताता है?
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Matthew 6:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मत्ती 6:6 का क्या अर्थ है?
मत्ती 6:6 किस विषय में है?
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मत्ती 6:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 6:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 6 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि मेरी आयु की एक एक घड़ी आपके हाथ में है। मैं चिन्ता करके उसमें एक घड़ी भी नहीं बढ़ा सकता, पर आप हर साँस गिनकर देते हैं। धन्यवाद कि आज की फ़िक्र आपने अपने ऊपर ले ली, इसलिए मैं चैन से सो सकता हूँ।
यीशु ने कहा, "जब तुम उपवास करो, तो कपटियों के समान तुम्हारे मुँह पर उदासी न छाई रहे।" ध्यान दे, समस्या उपवास नहीं, चेहरा बनाना है। जब दुख भी दिखावे का औज़ार बन जाए, तो परमेश्वर की जगह दर्शक ले लेते हैं। और "वे अपना प्रतिफल पा चुके" यानी तालियाँ ही पूरी मज़दूरी थी, हिसाब चुकता। तू किसकी नज़र के लिए भूखा रहता है?
शरीर का दीपक आँख है: इसलिए यदि तेरी आँख निर्मल हो, तो तेरा सारा शरीर भी उजियाला होगा।" यीशु ने यह बात धन की चर्चा के बीच में कही। आँख का निर्मल होना यानी लालच से मुक्त, उदार दृष्टि। जिस चीज़ को तू देर तक देखता है, वही तेरे भीतर उतरती है। आज तेरी आँखें किस पर टिकी हैं?
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