बाइबल व्याख्या

मत्ती 6:8

बाइबल

पाठ

यीशु अभी-अभी कह चुके हैं कि प्रार्थना में बक-बक मत करो, जैसे अन्यजाति करते हैं, जो सोचते हैं कि शब्दों की मात्रा से स्वर्ग का दरवाज़ा खुलता है। अब वे इसका कारण बताते हैं: "इसलिए तुम उनके समान न बनो, क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारे माँगने से पहले ही जानता है, कि तुम्हारी क्या-क्या आवश्यकताएँ है।" यानी प्रार्थना परमेश्वर को सूचना देने की प्रक्रिया नहीं है। वे पहले से जानते हैं। और ठीक इसी कारण तुम्हें उन्हें मनाने, थकाने या शब्दों से घेरने की ज़रूरत नहीं। वाक्य छोटा है, पर इसमें प्रार्थना की पूरी बुनियाद बदल जाती है: माँगने वाला किसी अनजान शक्ति के सामने नहीं, अपने पिता के सामने खड़ा है।

मूल बात

ध्यान दीजिए, यीशु यह नहीं कहते कि "तुम्हारा परमेश्वर जानता है" या "सर्वज्ञ प्रभु जानता है।" वे कहते हैं, "तुम्हारा पिता।" यही इस वचन की धड़कन है। परमेश्वर का सब-कुछ जानना अपने आप में सुकून नहीं देता; एक जज भी सब जानता है, और वह जानना डरावना होता है। पर जब जानने वाला पिता है, तो उसका ज्ञान खोज-बीन नहीं, देखभाल है।

इससे प्रार्थना का उद्देश्य बदल जाता है। हम प्रार्थना इसलिए नहीं करते कि परमेश्वर को हमारी स्थिति का पता चले, बल्कि इसलिए कि हम उस रिश्ते में जीएँ जिसमें माँगना संभव है। अन्यजातियों की बक-बक के पीछे एक छिपा हुआ धर्मशास्त्र था: देवता दूर हैं, उदासीन हैं, उन्हें हिलाना पड़ता है। यीशु उस पूरी तस्वीर को उलट देते हैं। आपका पिता दूर नहीं, उदासीन नहीं, और आपकी ज़रूरत पहले से उनके सामने खुली पड़ी है। प्रार्थना मनाना नहीं, भरोसे में साँस लेना है।

जुड़ा हुआ सूत्र

यह "जानना" बाइबल में नया नहीं है। मिस्र में जब इस्राएल कराह रहा था, परमेश्वर ने मूसा से कहा कि उन्होंने अपनी प्रजा का दुःख देखा है और वे उनकी पीड़ा जानते हैं। वहाँ भी जानना केवल जानकारी नहीं था; उसके बाद तुरंत छुड़ाने का काम शुरू हुआ। परमेश्वर का जानना हमेशा हस्तक्षेप की ओर बढ़ता है।

पर मत्ती 6 में एक नई बात जुड़ती है। वह जो जानता है, अब "तुम्हारा पिता" कहलाता है, और यह नाम यीशु के मुँह से आ रहा है। पुत्र ही हमें पिता के पास यह भाषा बोलने का अधिकार देते हैं। गतसमनी में वही पुत्र घुटनों पर गिरकर "हे अब्बा, हे पिता" कहेंगे, और पिता का जानना उन्हें क्रूस से नहीं बचाएगा, बल्कि क्रूस के पार ले जाएगा। यही वह रास्ता है जिससे आपका माँगना सुरक्षित हो गया।

आईना

ईमानदारी से पूछिए: आप लंबी प्रार्थना क्यों करते हैं? कभी-कभी इसलिए कि प्रेम बहता है। पर कभी-कभी इसलिए कि भीतर एक डर बैठा है कि अगर मैंने ठीक शब्द नहीं कहे, अगर मैं पर्याप्त गंभीर नहीं दिखा, तो शायद परमेश्वर हिलेंगे नहीं। बीमार माँ के लिए, बेरोज़गार बेटे के लिए, उस रिपोर्ट के लिए जो कल आनी है, हम शब्दों की दीवार खड़ी करते हैं, मानो परमेश्वर को समझाना पड़ेगा कि मामला कितना गंभीर है।

यीशु उस डर को एक वाक्य से काट देते हैं। वे पहले से जानते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि माँगना बेकार है; इसका मतलब है कि माँगना अब प्रदर्शन नहीं रहा। आप अपनी ज़रूरत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के बोझ से मुक्त हैं, और उसे छिपाने के शर्म से भी।

आज यह कीजिए: कागज़ पर एक वाक्य में अपनी सबसे बड़ी ज़रूरत लिखिए, फिर ज़ोर से कहिए, "पिता, आप यह पहले से जानते हैं," और उसके बाद दो मिनट चुप बैठिए, बिना एक शब्द जोड़े।

श्रोताओं का चेहरा

पहाड़ पर बैठी भीड़ गरीब गलीली किसानों और मछुआरों की थी, जो रोमी साम्राज्य और मंदिर कर, दोनों के नीचे दबे थे। उनके आसपास की दुनिया में प्रार्थना एक सौदा थी। बुतपरस्त मंदिरों में देवता का सही नाम, सही उपाधि, सही क्रम से पुकारना ज़रूरी माना जाता था, वरना देवता सुनता ही नहीं। जो जितना लंबा और शुद्ध उच्चारण कर सके, उसकी पहुँच उतनी ऊँची।

ऐसे लोगों के लिए यह सुनना कि उनका पिता उनकी ज़रूरत पहले से जानता है, एक क्रांति थी। इसका अर्थ था कि अनपढ़ मछुआरा भी बिना किसी बिचौलिए के, बिना याद किए गए सूत्रों के, सीधे बोल सकता है। गरीबी उनकी प्रार्थना की गुणवत्ता नहीं घटाती। यह सुसमाचार उनके कानों में आर्थिक राहत जैसा लगा होगा।

मुख्य पात्र

इस वचन का असली पात्र वह पिता है जो "गुप्त में देखता है" और जो माँगने से पहले जानता है। यीशु उनका चित्र बहुत संयम से खींचते हैं, पर हर शब्द भारी है। यह परमेश्वर न तो उदासीन है कि उसे जगाना पड़े, न ही अधीर कि वह सुनने से पहले फैसला सुना दे। वे देखते हैं, जानते हैं, और प्रतीक्षा करते हैं कि बच्चा खुद बोले।

यही सबसे कोमल बात है। जो पहले से जानता है, वह फिर भी पूछने देता है, क्योंकि रिश्ता जानकारी के आदान-प्रदान से नहीं, आवाज़ के आदान-प्रदान से जीता है। एक पिता जानता है कि बच्चे को क्या चाहिए, फिर भी उसे सुनना अच्छा लगता है जब बच्चा उसे पुकारता है। परमेश्वर की सर्वज्ञता यहाँ दूरी नहीं, निकटता का नाम है।

अन्य वचनों की गूँज

इसी अध्याय के अंत में यीशु यही बात दोहराते हैं, अब चिंता के संदर्भ में: "तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएँ चाहिए।" पद 8 और पद 32 एक ही खूँटी से लटके हैं। प्रार्थना की बक-बक और रोज़ी-रोटी की चिंता, दोनों की जड़ एक ही है: यह संदेह कि कोई देख नहीं रहा।

इसके ठीक उलट कर्मेल पर्वत का दृश्य है, जहाँ बाल के भविष्यवक्ता सुबह से दोपहर तक चिल्लाते रहे, नाचते रहे, अपने शरीर को काटते रहे, और कोई उत्तर नहीं आया। वह मेहनत भयानक है, और वह आज भी चलती है, बस रूप बदलकर। यीशु हमें उस थकाऊ चिल्लाहट से निकालकर एक बंद कोठरी में ले जाते हैं, जहाँ फुसफुसाहट भी सुनी जाती है।

चिंतन के प्रश्न

जब आप प्रार्थना में शब्द बढ़ाते हैं, तो भीतर कौन सा डर काम कर रहा होता है: कि परमेश्वर सुन नहीं रहे, या कि वे सुनकर भी कुछ नहीं करेंगे?

अगर पिता आपकी ज़रूरत पहले से जानते हैं, तो आपकी प्रार्थना का उद्देश्य बदलकर क्या बनना चाहिए, और इस हफ़्ते वह बदलाव व्यवहार में कैसा दिखेगा?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

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The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

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A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

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The Message of the Sermon on the Mount

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Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 6:8 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 6:8 का क्या अर्थ है?
यीशु अभी-अभी कह चुके हैं कि प्रार्थना में बक-बक मत करो, जैसे अन्यजाति करते हैं, जो सोचते हैं कि शब्दों की मात्रा से स्वर्ग का दरवाज़ा खुलता है। अब वे इसका कारण बताते हैं: "इसलिए तुम उनके समान न बनो, क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारे माँगने से पहले ही जानता है, कि तुम्हारी क्या-क्या आवश्यकताएँ है।" यानी प्रार्थना परमेश्वर को सूचना देने की प्रक्रिया नहीं है। वे पहले से जानते हैं। और ठीक इसी कारण तुम्हें उन्हें मनाने, थकाने या शब्दों से घेरने की ज़रूरत नहीं। वाक्य छोटा है, पर इसमें प्रार्थना की पूरी बुनियाद बदल जाती है: माँगने वाला किसी अनजान शक्ति के सामने नहीं, अपने पिता के सामने खड़ा है।
मत्ती 6:8 किस विषय में है?
यह "जानना" बाइबल में नया नहीं है। मिस्र में जब इस्राएल कराह रहा था, परमेश्वर ने मूसा से कहा कि उन्होंने अपनी प्रजा का दुःख देखा है और वे उनकी पीड़ा जानते हैं। वहाँ भी जानना केवल जानकारी नहीं था; उसके बाद तुरंत छुड़ाने का काम शुरू हुआ। परमेश्वर का जानना हमेशा हस्तक्षेप की ओर बढ़ता है।
मत्ती 6:8 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यीशु उस डर को एक वाक्य से काट देते हैं। वे पहले से जानते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि माँगना बेकार है; इसका मतलब है कि माँगना अब प्रदर्शन नहीं रहा। आप अपनी ज़रूरत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के बोझ से मुक्त हैं, और उसे छिपाने के शर्म से भी।
मत्ती 6:8 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
ऐसे लोगों के लिए यह सुनना कि उनका पिता उनकी ज़रूरत पहले से जानता है, एक क्रांति थी। इसका अर्थ था कि अनपढ़ मछुआरा भी बिना किसी बिचौलिए के, बिना याद किए गए सूत्रों के, सीधे बोल सकता है। गरीबी उनकी प्रार्थना की गुणवत्ता नहीं घटाती। यह सुसमाचार उनके कानों में आर्थिक राहत जैसा लगा होगा।
मत्ती 6:8 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
इसी अध्याय के अंत में यीशु यही बात दोहराते हैं, अब चिंता के संदर्भ में: "तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएँ चाहिए।" पद 8 और पद 32 एक ही खूँटी से लटके हैं। प्रार्थना की बक-बक और रोज़ी-रोटी की चिंता, दोनों की जड़ एक ही है: यह संदेह कि कोई देख नहीं रहा।
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Matthew 6 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 22

शरीर का दीपक आँख है: इसलिए यदि तेरी आँख निर्मल हो, तो तेरा सारा शरीर भी उजियाला होगा।" यीशु ने यह बात धन की चर्चा के बीच में कही। आँख का निर्मल होना यानी लालच से मुक्त, उदार दृष्टि। जिस चीज़ को तू देर तक देखता है, वही तेरे भीतर उतरती है। आज तेरी आँखें किस पर टिकी हैं?

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