बाइबल व्याख्या

मत्ती 9:38

बाइबल

पाठ

यीशु भीड़ को देखते हैं, बिना चरवाहे की भेड़ों जैसी थकी और भटकी हुई, और उनका मन तरस से भर जाता है। फिर वे चेलों से एक अजीब बात कहते हैं: समस्या कटनी की कमी नहीं है, फसल तो बहुत है; कमी मजदूरों की है। और इसका जो उपाय वे बताते हैं, वह भी चौंकाने वाला है। वे यह नहीं कहते, "जाओ, काम पर लग जाओ।" वे कहते हैं, "इसलिए फसल के स्वामी से विनती करो कि वह अपने खेत में काम करने के लिये मजदूर भेज दे।" पहला कदम प्रार्थना है, और प्रार्थना उस स्वामी से है जिसका खेत है, जिसकी फसल है, और जो मजदूर भेजने का अधिकार रखता है।

मूल बात

ध्यान दीजिए, खेत किसका है। "अपने खेत में" यीशु कहते हैं। यह हमारा प्रोजेक्ट नहीं है जिसके लिए हम परमेश्वर से संसाधन मांग रहे हों; यह उनका खेत है जिसमें वे अपने मजदूर लगाते हैं। इसका पहला नैतिक परिणाम यह है कि हमारी व्यस्तता पवित्र नहीं है। हम सोचते हैं कि अगर हम थोड़ी और मेहनत करें, थोड़ा और अच्छा कार्यक्रम बनाएं, तो लोग आ जाएंगे। यीशु इस पूरे सोच को उलट देते हैं: तुम्हारी असली शुरुआत घुटनों पर है, क्योंकि जो चीज सबसे ज्यादा चाहिए, वह तुम पैदा नहीं कर सकते। और दूसरा परिणाम इससे भी तेज है: जो सच में प्रार्थना करता है कि मजदूर भेजे जाएं, वह देर तक अपने आप को उस प्रार्थना से बाहर नहीं रख सकता। यह प्रार्थना खतरनाक है; यह प्रार्थना करने वाले को ही उठा लेती है।

साझा सूत्र

"बिना चरवाहे की भेड़ें" कोई नई तस्वीर नहीं है। मत्ती स्वयं 1 राजा 22:17 की ओर इशारा करते हैं, जहाँ मीकायाह भविष्यवक्ता इस्राएल को बिखरा हुआ देखता है क्योंकि उसका राजा गिर चुका है। पूरे पुराने नियम में यह शिकायत गूँजती रहती है: परमेश्वर ने अपने लोगों को चरवाहे दिए, और चरवाहों ने भेड़ों को अपने पेट के लिए इस्तेमाल किया। इसलिए परमेश्वर ने वादा किया कि वे स्वयं आकर चरवाहे बनेंगे। मत्ती 9 इसी वादे का पूरा होना दिखाता है: लकवे के मारे हुए को क्षमा, चुंगी लेनेवाले को बुलावा, मरी हुई लड़की का हाथ पकड़ना, अंधों की आँखें। और अब यह चरवाहा अपनी भेड़ों के लिए और मजदूर मांगने को कहता है, क्योंकि उनका काम उनके शरीर के साथ खत्म नहीं होता। अगले ही अध्याय में वे उन बारह को भेज देते हैं जिन्हें उन्होंने प्रार्थना करने को कहा था। प्रार्थना और भेजे जाना, दोनों एक ही सूत्र के दो सिरे हैं।

आईना

हम प्रार्थना को अक्सर दूर की चीजों के लिए बचाकर रखते हैं। "मिशन के क्षेत्रों" के लिए, "अपने देश" के लिए, ऐसे शब्दों में जिनमें कोई चेहरा नहीं होता। लेकिन यीशु ने भीड़ को देखा, गिना नहीं। आपके दफ्तर में वह आदमी जो हर सोमवार थका हुआ आता है, आपकी बहन जिससे पिछली बातचीत झगड़े में खत्म हुई थी, वह पड़ोसी जिसकी शराब की आवाज दीवार के पार सुनाई देती है: ये "व्याकुल और भटके हुए" हैं, और इन्हीं के लिए यह प्रार्थना है। यहाँ जो चुभता है, वह यह है कि यह प्रार्थना हमें सुरक्षित नहीं छोड़ती। हम रविवार को समय देने से बचते हैं क्योंकि ओवरटाइम का पैसा दिखता है और मजदूरी दिखती नहीं। हम कहते हैं, "कोई और यह करे," और यीशु कहते हैं, स्वामी से मांगो, और जानते हैं कि मांगनेवाला ही सबसे पहले भेजा जाएगा।

आज, दिन खत्म होने से पहले, एक कागज या फोन पर एक ही नाम लिखिए, किसी ऐसे व्यक्ति का जो आपके आसपास भटका हुआ है, और उस नाम को सामने रखकर ऊँची आवाज में कहिए: "फसल के स्वामी, अपने खेत में मजदूर भेजिए, और यदि वह मजदूर मैं हूँ, तो मुझे भेजिए।"

श्रोता

मत्ती के पहले पाठक यहूदी मसीही थे, और "फसल" शब्द उनके कानों में पहले तो न्याय की तस्वीर थी: आखिरी दिन, जब परमेश्वर गेहूँ और भूसा अलग करेंगे। यीशु उस तस्वीर को लेकर उसे जल्दी में डाल देते हैं। गलील के गाँवों में कटनी का मौसम इंतजार नहीं करता; जौ पक जाए और मजदूर न मिलें, तो खेत में ही सड़ जाती है। हर हाथ खेत में जाता था, बच्चे भी। और दूसरी बात जो वे साफ सुनते थे, वह एक चुभता आरोप था। इस्राएल में चरवाहों की कमी नहीं थी। शास्त्री, फरीसी, याजक, सब मौजूद थे; इसी अध्याय में वे यीशु पर निन्दा का और दुष्टात्माओं की सहायता का आरोप लगाते हैं। यीशु का यह कहना कि भेड़ों का कोई चरवाहा नहीं, उन सबको खारिज कर देना था।

मुख्य पात्र

"उसको लोगों पर तरस आया" में जो शब्द है, वह पेट से निकलता है; यूनानी में यह आंतों का हिल जाना है, कोई सभ्य सहानुभूति नहीं। यीशु भीड़ से न ऊबते हैं और न उसे आदर्श बनाते हैं। वे भीड़ को सचमुच देखते हैं, वैसे ही जैसे उन्होंने चुंगी की चौकी पर बैठे मत्ती को देखा था और पीछे से वस्त्र छूनेवाली स्त्री को मुड़कर देखा था। और यहाँ उनके चरित्र की असली गहराई दिखती है: उनका तरस भावुकता में नहीं ढलता, वह योजना और प्रार्थना में ढलता है। वे थकते हैं, वे अकेले हैं, उनके विरोधी बढ़ रहे हैं, और इस स्थिति में वे अपनी सीमा को नकारते नहीं। वे मजदूर मांगते हैं। परमेश्वर का पुत्र काम बाँटता है, क्योंकि वे अपने खेत में साथी चाहते हैं।

कठिन प्रश्न

अगर खेत का स्वामी परमेश्वर है, तो मजदूर थोड़े क्यों हैं? वे तो भेज सकते हैं। क्या वे रोक रखे हैं जब तक हम विनती न करें? यह सवाल आराम से हल नहीं होता। पाठ दो बातें साथ रखता है और उन्हें जोड़कर नहीं समझाता: कमी की जिम्मेदारी हमारे हाथ में नहीं है, और फिर भी हमसे मांगने को कहा गया है। बीच के समय में भेड़ें सचमुच भटकती रहती हैं, और कुछ इस इंतजार में खो जाती हैं। इसका कोई सस्ता जवाब नहीं है। जो हम जानते हैं, वह इतना है: वह स्वामी उदासीन नहीं है, क्योंकि उसका तरस ही इस आदेश की जड़ है। और जिसे यह प्रश्न सचमुच सताता है, उसके लिए एक ही ईमानदार रास्ता बचता है, वह प्रार्थना करना और खुद उपलब्ध हो जाना।

चिंतन

आपकी प्रार्थनाओं में कितने चेहरे नाम के साथ मौजूद हैं, और कितने केवल "लोग" बनकर?

यदि परमेश्वर आपकी इस प्रार्थना का उत्तर आपको ही भेजकर दें, तो आपके हफ्ते में क्या बदलना पड़ेगा, और आप किस चीज को छोड़ने से सबसे ज्यादा डरते हैं?

Matthew में और गहराई से जानें

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Matthew 9:38 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 9:38 का क्या अर्थ है?
यीशु भीड़ को देखते हैं, बिना चरवाहे की भेड़ों जैसी थकी और भटकी हुई, और उनका मन तरस से भर जाता है। फिर वे चेलों से एक अजीब बात कहते हैं: समस्या कटनी की कमी नहीं है, फसल तो बहुत है; कमी मजदूरों की है। और इसका जो उपाय वे बताते हैं, वह भी चौंकाने वाला है। वे यह नहीं कहते, "जाओ, काम पर लग जाओ।" वे कहते हैं, "इसलिए फसल के स्वामी से विनती करो कि वह अपने खेत में काम करने के लिये मजदूर भेज दे।" पहला कदम प्रार्थना है, और प्रार्थना उस स्वामी से है जिसका खेत है, जिसकी फसल है, और जो मजदूर भेजने का अधिकार रखता है।
मत्ती 9:38 किस विषय में है?
"बिना चरवाहे की भेड़ें" कोई नई तस्वीर नहीं है। मत्ती स्वयं 1 राजा 22:17 की ओर इशारा करते हैं, जहाँ मीकायाह भविष्यवक्ता इस्राएल को बिखरा हुआ देखता है क्योंकि उसका राजा गिर चुका है। पूरे पुराने नियम में यह शिकायत गूँजती रहती है: परमेश्वर ने अपने लोगों को चरवाहे दिए, और चरवाहों ने भेड़ों को अपने पेट के लिए इस्तेमाल किया। इसलिए परमेश्वर ने वादा किया कि वे स्वयं आकर चरवाहे बनेंगे। मत्ती 9 इसी वादे का पूरा होना दिखाता है: लकवे के मारे हुए को क्षमा, चुंगी लेनेवाले को बुलावा, मरी हुई लड़की का हाथ पकड़ना, अंधों की आँखें। और अब यह चरवाहा अपनी भेड़ों के लिए और मजदूर मांगने को कहता है, क्योंकि उनका काम उनके शरीर के साथ खत्म नहीं होता। अगले ही अध्याय में वे उन बारह को भेज देते हैं जिन्हें उन्होंने प्रार्थना करने को कहा था। प्रार्थना और भेजे जाना, दोनों एक ही सूत्र के दो सिरे हैं।
मत्ती 9:38 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज, दिन खत्म होने से पहले, एक कागज या फोन पर एक ही नाम लिखिए, किसी ऐसे व्यक्ति का जो आपके आसपास भटका हुआ है, और उस नाम को सामने रखकर ऊँची आवाज में कहिए: "फसल के स्वामी, अपने खेत में मजदूर भेजिए, और यदि वह मजदूर मैं हूँ, तो मुझे भेजिए।"
मत्ती 9:38 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"उसको लोगों पर तरस आया" में जो शब्द है, वह पेट से निकलता है; यूनानी में यह आंतों का हिल जाना है, कोई सभ्य सहानुभूति नहीं। यीशु भीड़ से न ऊबते हैं और न उसे आदर्श बनाते हैं। वे भीड़ को सचमुच देखते हैं, वैसे ही जैसे उन्होंने चुंगी की चौकी पर बैठे मत्ती को देखा था और पीछे से वस्त्र छूनेवाली स्त्री को मुड़कर देखा था। और यहाँ उनके चरित्र की असली गहराई दिखती है: उनका तरस भावुकता में नहीं ढलता, वह योजना और प्रार्थना में ढलता है। वे थकते हैं, वे अकेले हैं, उनके विरोधी बढ़ रहे हैं, और इस स्थिति में वे अपनी सीमा को नकारते नहीं। वे मजदूर मांगते हैं। परमेश्वर का पुत्र काम बाँटता है, क्योंकि वे अपने खेत में साथी चाहते हैं।
मत्ती 9:38 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी प्रार्थनाओं में कितने चेहरे नाम के साथ मौजूद हैं, और कितने केवल "लोग" बनकर?

Matthew 9 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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