1 तीमुथियुस 2:3
पाठ
पौलुस ने अभी-अभी कहा है कि सब मनुष्यों के लिये, और नाम लेकर राजाओं और ऊँचे पदवालों के लिये भी, विनती और धन्यवाद किया जाए। फिर वे इस पूरी बात पर एक मुहर लगाते हैं: "यह हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर को अच्छा लगता और भाता भी है।" यानी ऐसी प्रार्थना केवल कलीसिया की व्यवस्था का कोई नियम नहीं, न ही तीमुथियुस की सभा को शांत रखने की कोई चतुर रणनीति। यह परमेश्वर की रुचि का विषय है। जब विश्वासी उन लोगों के लिये भी हाथ उठाते हैं जिनसे उन्हें डर लगता है या जिनसे उन्हें चोट पहुँची है, तब परमेश्वर के मन को भला लगता है। वचन इससे आगे तर्क नहीं देता; वह परमेश्वर की प्रसन्नता को ही सबसे भारी कारण मानकर रख देता है।
मर्म
यहाँ जो शब्द चुभता है वह है "उद्धारकर्ता"। पौलुस नहीं कहते कि यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर को भाता है, या न्यायी परमेश्वर को; वे कहते हैं हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर को। कारण अगली आयत में खुलता है: वे चाहते हैं "कि सब मनुष्यों का उद्धार हो"। इसका अर्थ है कि हमारी प्रार्थना का दायरा परमेश्वर के हृदय के दायरे से छोटा नहीं होना चाहिए। जिस क्षण मैं किसी को अपनी प्रार्थना-सूची से बाहर कर देता हूँ, उस क्षण मैं चुपचाप कह रहा हूँ कि उसके लिये मसीह का बलिदान बेकार है। और यहीं यह आयत नैतिक हो जाती है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी रहस्यमय आत्मिक अनुभव में नहीं, बल्कि इस ठोस, कठिन, रोज़ के काम में जुड़ी है: उनका नाम लेकर प्रार्थना करना जिन्हें मैं स्वभाव से छोड़ देना चाहता हूँ।
जोड़ने वाला सूत्र
यह वाक्य आकाश से नहीं गिरा। इस्राएल के भविष्यद्वक्ता के पास परमेश्वर पहले ही कह चुके हैं कि दुष्ट के मरने में उन्हें कोई प्रसन्नता नहीं, बल्कि इसमें कि वह फिरे और जीवित रहे (यहेजकेल 18:23, जिसकी ओर आयत 4 स्वयं इशारा करती है)। परमेश्वर की रुचि सदा से एक ही दिशा में झुकी रही है: बचाने की ओर, नष्ट करने की ओर नहीं। और यह झुकाव किसी भावुक इच्छा तक सीमित नहीं रहा। पौलुस दो आयत बाद उसका मूल्य बताते हैं: मसीह यीशु "जिसने अपने आपको सब के छुटकारे के दाम में दे दिया"। यानी जो बात परमेश्वर को भाती है, उसे उन्होंने अपने पुत्र की कीमत पर सम्भव भी किया। इसलिए शत्रु के लिये की गई प्रार्थना क्रूस की दिशा में चलना है, उसके विरुद्ध नहीं।
दर्पण
अब ईमानदारी से देखिए कि आपकी प्रार्थना किन नामों पर जाकर रुक जाती है। वह मैनेजर जिसने आपकी पदोन्नति रोक दी और जिसके बारे में आप घर आकर आधा घंटा शिकायत करते हैं। वह रिश्तेदार जिसने ज़मीन के बँटवारे में चालाकी की। वह नेता जिसका चेहरा देखते ही आप चैनल बदल देते हैं, और जिसके लिये प्रार्थना करने का विचार आपको लगभग विश्वासघात जैसा लगता है। पौलुस यहाँ आपकी भावना को नहीं झुठलाते, वे केवल उससे बड़ी एक बात रख देते हैं: परमेश्वर को यह भाता है। आपके क्रोध का औचित्य हो सकता है; फिर भी उस व्यक्ति के उद्धार में परमेश्वर की रुचि आपके क्रोध से पुरानी और गहरी है। और ध्यान दीजिए, आयत 1 में केवल विनती नहीं, धन्यवाद भी है। यही सबसे कठिन हिस्सा है।
आज दस मिनट निकालिए, एक कागज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसके लिये प्रार्थना करना आपको सबसे कठिन लगता है, और ऊँची आवाज़ में उसके नाम के साथ परमेश्वर से कहिए: "इसका उद्धार आपको भाता है, इसलिए मैं इसके लिये प्रार्थना करता हूँ।"
एक बारीकी
"अच्छा लगता और भाता भी है" में दो शब्द हैं, और दूसरा शब्द (यूनानी में अपोदेक्तोन, अर्थात "सहर्ष स्वीकार किया हुआ") केवल नैतिक शुद्धता की बात नहीं करता। यह उस भेंट के लिये प्रयोग होता है जिसे कोई खुशी से थाम लेता है। पौलुस यह नहीं कह रहे कि ऐसी प्रार्थना सही है, वे कह रहे हैं कि परमेश्वर उसे प्रसन्नता से ग्रहण करते हैं। अंतर बड़ा है। कर्तव्य और भेंट में जो फ़र्क है, वही यहाँ है। जब आप उस व्यक्ति का नाम लेकर प्रार्थना करते हैं जिसे आप टालना चाहते हैं, तो आप कोई नियम नहीं निभा रहे; आप परमेश्वर के हाथ में कुछ ऐसा रख रहे हैं जिसे वे मुस्कुराकर लेते हैं।
कठिन प्रश्न
यदि परमेश्वर सचमुच चाहते हैं कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, तो सब बचते क्यों नहीं? यह प्रश्न इसी आयत की मिट्टी से उगता है और उसे दबाना बेईमानी होगी। कुछ लोग "सब" को छोटा कर देते हैं, कुछ लोग परमेश्वर की इच्छा को कमज़ोर बना देते हैं; दोनों रास्ते वचन को हमारे तर्क के नाप में काटते हैं। पौलुस इनमें से कोई सफाई नहीं देते। वे बस दो बातें एक साथ रख देते हैं: परमेश्वर की खुली इच्छा, और हमारी प्रार्थना का कर्तव्य। शायद इसीलिए, क्योंकि जिस दिन मुझे इसका पूरा उत्तर मिल जाएगा, उस दिन मैं प्रार्थना करना छोड़ दूँगा। रहस्य यहाँ आलस्य का बहाना नहीं, प्रार्थना का ईंधन है।
पहले सुननेवाले
इफिसुस की उस छोटी मंडली की कल्पना कीजिए। रोमी शासन, स्थानीय अधिकारी जो चाहें तो उनका व्यापार ठप कर दें, और सम्राट जिसके नाम पर मंदिरों में धूप जलती थी। मसीही इनकार करते थे कि सम्राट परमेश्वर है, और इसीलिए संदिग्ध माने जाते थे। पौलुस उनसे नहीं कहते कि सम्राट की पूजा करो, और न यह कि उसके विरुद्ध क्रांति करो। वे कहते हैं: उसके लिये प्रार्थना करो, ताकि "हम विश्राम और चैन के साथ सारी भक्ति और गरिमा में जीवन बिताएँ।" यह डरपोक समझौता नहीं। यह सत्ता के ऊपर एक ऐसे परमेश्वर को खड़ा करना है जिसके सामने सम्राट भी एक प्रार्थना का विषय भर है, और जिसका उद्धार अभी उससे दूर नहीं हुआ।
चिंतन
आपकी प्रार्थना की सूची में जो नाम नहीं हैं, उनकी अनुपस्थिति परमेश्वर के हृदय के बारे में आप क्या मानते हैं, यह क्या बताती है?
विनती करना एक बात है, धन्यवाद देना दूसरी। किसी कठिन व्यक्ति के लिये आप ईमानदारी से किस बात का धन्यवाद दे सकते हैं?
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1 Timothy 2:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 तीमुथियुस 2:3 का क्या अर्थ है?
1 तीमुथियुस 2:3 किस विषय में है?
1 तीमुथियुस 2:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 तीमुथियुस 2:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 तीमुथियुस 2:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Timothy 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपकी कलीसिया में अव्यवस्था नहीं, बल्कि आपकी ठहराई हुई व्यवस्था है। धन्यवाद कि आपने हर एक को उसका स्थान और सेवा सौंपी है। शांत और सीखने को तैयार मन देने के लिए धन्यवाद, ताकि हम आपके वचन के अधीन रहकर आदर के साथ संग चलें।
क्योंकि आदम पहले, उसके बाद हव्वा रची गई।" पौलुस इफिसुस के रीति रिवाज़ों की नहीं, बल्कि बग़ीचे की बात करता है। पहले बनाया जाना बड़ा होना नहीं है। आदम मिट्टी से बना, पर हव्वा एक जीवित देह से। और परमेश्वर ने अकेले आदम को देखकर कहा था कि यह अच्छा नहीं। क्रम में तेरा स्थान तेरा मोल तय नहीं करता। क्या तू सचमुच इस पर भरोसा करता है?
जिसने अपने आपको सबके छुटकारे के दाम में दे दिया" (1 तीमुथियुस 2:6)। छुड़ौती का दाम तभी चुकाया जाता है जब कोई सचमुच बंधन में हो। मसीह ने सोना नहीं, अपने आपको दिया। और यह "सबके" लिए था, उसके लिए भी जिसके लिए तू प्रार्थना करना छोड़ चुका है। जिसकी कीमत परमेश्वर ने अपने पुत्र से चुकाई, क्या तू उसे अपने दिल से निकाल देगा?
और आदम बहकाया न गया, पर स्त्री बहकावे में आकर अपराध में पड़ गई।" बहकावे में आना, यही सबसे डरावनी बात है। हव्वा ने जान बूझकर बगावत नहीं की थी, वह बस एक मीठी सी बात पर भरोसा कर बैठी। आज भी झूठ चिल्लाकर नहीं आता, वह समझाकर आता है। इसलिए परमेश्वर का वचन किसी और के मुँह से सुनना काफी नहीं, तुझे खुद उसे जानना होगा।
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