ओबद्याह 1
पाठ
चौराहे पर एक आदमी खड़ा है। उसके सामने से यरूशलेम के भागते हुए लोग गुज़र रहे हैं, धूल में, बिना जूतों के, बच्चों को गोद में उठाए। वह उन्हें रोक लेता है और पीछे आ रहे सैनिकों के हवाले कर देता है। वह अजनबी नहीं है, वह भाई है। ओबद्याह की यही पूरी पुस्तक है: एदोम, एसाव का वंश, याकूब के वंश की तबाही के दिन तमाशा देखता रहा, हँसा, लूट में हाथ डाला, और भागनेवालों को पकड़वाया। परमेश्वर कहते हैं कि पहाड़ों की दरारों में बसा हुआ यह घमंडी देश नीचे उतारा जाएगा, और अंत में सिय्योन पर्वत पर उद्धार करनेवाले खड़े होंगे और राज्य यहोवा का होगा।
मर्म
एदोम की चट्टानें असली थीं। पेत्रा की घाटियों में एक संकरी दरार से होकर ही अंदर घुसा जा सकता था; वहाँ बैठकर आप सचमुच सोच सकते थे, "कौन मुझे भूमि पर उतार देगा?" यही वाक्य इस पुस्तक का धड़कता हुआ केंद्र है। यह प्रश्न नहीं, चुनौती है। और परमेश्वर का उत्तर उतना ही सीधा है: "चाहे तू उकाब के समान ऊँचा उड़ता हो, वरन् तारागण के बीच अपना घोंसला बनाए हो, तो भी मैं तुझे वहाँ से नीचे गिराऊँगा।" यहाँ परमेश्वर किसी मूर्तिपूजा की सज़ा नहीं दे रहे। वे उस सुरक्षा को तोड़ रहे हैं जो भाई की पीड़ा पर बनी थी। ऊँचाई अपने आप में पाप नहीं; ऊँचाई से नीचे देखते हुए ठंडी आँख पाप है।
जोड़ने वाला सूत्र
एसाव और याकूब एक ही गर्भ में लड़े थे, और यह लड़ाई सदियों तक चलती रही। ओबद्याह उस पुराने पारिवारिक घाव को उठाकर परमेश्वर के न्याय के सामने रख देता है, और फिर कुछ अप्रत्याशित करता है। पुस्तक बदले पर खत्म नहीं होती, बल्कि इस पर: "उद्धार करनेवाले एसाव के पहाड़ का न्याय करने के लिये सिय्योन पर्वत पर चढ़ आएँगे, और राज्य यहोवा ही का हो जाएगा।" दो पहाड़ आमने-सामने हैं: एसाव का पहाड़, जो अपनी दीवारों पर भरोसा करता है, और सिय्योन, जहाँ "बचे हुए लोग" होंगे। सुसमाचार इसी दूसरे पहाड़ की कहानी है, जहाँ एक और भाई खड़ा हुआ, पर पकड़वाने के लिए नहीं, पकड़वाए जाने के लिए। मसीह में यह राज्य सचमुच यहोवा का हुआ।
दर्पण
तेरहवीं आयत की भाषा को धीरे से पढ़िए: देखता रहा, हाथ लगाया, बड़ा बोल बोला। यह क्रम जाना-पहचाना है। पहले हम सिर्फ़ देखते हैं। जिस सहकर्मी को दफ़्तर की राजनीति निगल रही है, उसके बारे में हम कुछ नहीं कहते, बस देखते हैं। फिर उसका खाली हुआ पद हमारे काम आ जाता है। फिर हम किसी से कह देते हैं कि "वैसे भी वह इसी लायक था।" एदोम ने चाकू नहीं चलाया, उसने सिर्फ़ मौका नहीं छोड़ा। और परमेश्वर इसे "उपद्रव" कहते हैं। पारिवारिक झगड़ों में, भाई-बहनों की संपत्ति में, टूटे हुए दोस्तों की बदनामी में यह पाठ हमारी उस चुप्पी को नाम देता है जिसे हम तटस्थता कहकर बचाते हैं।
अन्य वचनों की गूँज
आयत 15 का वाक्य पूरी बाइबल में गूँजता है: "जैसा तूने किया है, वैसा ही तुझ से भी किया जाएगा, तेरा व्यवहार लौटकर तेरे ही सिर पर पड़ेगा।" यही वह सिद्धांत है जिसे यीशु पहाड़ी उपदेश में उलटकर वरदान बना देते हैं, जब वे कहते हैं कि जिस नाप से तुम नापते हो उसी से तुम्हारे लिए नापा जाएगा। दूसरी गूँज पुराने भजनों में है, जहाँ यरूशलेम के गिरने के दिन एदोम की चिल्लाहट याद की जाती है, "ढा दो, ढा दो।" ओबद्याह उस स्मृति का उत्तर है। परमेश्वर भूले नहीं। जो लोग सोचते हैं कि इतिहास में अन्याय बस बह जाता है, उनके लिए यह छोटी पुस्तक असुविधाजनक रूप से हिसाब रखती है।
पहले सुननेवाले
कल्पना कीजिए कि यह किसे पढ़कर सुनाया गया। एदोम के लोगों को नहीं, बल्कि उन यहूदियों को जो 587 ईसा पूर्व के बाद जली हुई दीवारों के बीच रह गए थे, या बाबुल में बैठे थे। उनके लिए सबसे बड़ा दर्द बाबुल नहीं था, बाबुल तो शत्रु था ही। दर्द यह था कि रिश्तेदार तमाशा देखने आया था। आयत 7 उन्हें एक अजीब सी सांत्वना देती है: एदोम के अपने सहयोगी उसके साथ वही करेंगे, "वे तेरी रोटी खाते हैं, वे तेरे लिये फंदा लगाते हैं।" और आयत 20 में सारपत और सपारद जैसे दूर बिखरे नाम आते हैं, वे जगहें जहाँ बंधुए पड़े थे। संदेश साफ़ था: तुम भूले नहीं गए हो।
एक बारीकी
आयत 12 में तीन बार दोहराया गया वाक्य है, "तुझे उचित नहीं था।" इब्रानी में यहाँ एक ही छोटा शब्द बार-बार लौटता है, अल, यानी "मत"। शाब्दिक रूप से यह आदेश है: मत देख, मत आनन्द कर, मत घुस, मत खड़ा हो। लेकिन यह आदेश उस दिन के बाद दिया जा रहा है जो बीत चुका है। परमेश्वर एदोम को उस दृश्य में वापस खड़ा कर देते हैं और घटना को धीमा करके चलाते हैं, फ्रेम दर फ्रेम, ताकि वह हर पल पर अपना चेहरा देख सके। यह न्याय की सबसे गहरी सूरत है: सज़ा से पहले सच्चाई। हमें भी यही मिलेगा, और शायद यही सबसे अधिक डरावना और सबसे अधिक चंगा करनेवाला होगा।
चिंतन
किसकी विपत्ति के दिन आप "देखते रहे" हैं, और आपने उस देखने को क्या नाम दिया था?
आपकी अपनी "पहाड़ों की दरार" कौन सी है, वह सुरक्षा जिसके भरोसे आप मानते हैं कि कोई आपको नीचे नहीं उतार सकता?
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Obadiah 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Obadiah 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने ओबद्याह को दर्शन दिया और चुप नहीं रहे। आज भी आप अपने जन को समाचार सुनाते हैं और दूत भेजते हैं। धन्यवाद कि आपकी आवाज़ मेरे जीवन तक पहुँची, और आप हर अन्याय को देखते और उसका उत्तर देते हैं।
धन्यवाद, प्रभु, कि जो अपने को ऊँचा कर के तारों के बीच घोंसला बनाते हैं, वे भी आपके हाथ से बाहर नहीं। जब घमंडी सत्ताएँ अटल लगती हैं, तब हमारा मन शांत रहता है, क्योंकि न्याय आपका है और आपकी वाणी कभी खाली नहीं जाती। धन्यवाद कि हम डर में नहीं, आप पर भरोसा रखकर जी सकते हैं।
देख, मैं तुझे जातियों में छोटा कर दूँगा; तू बहुत तुच्छ ठहरेगा।" एदोम चट्टानों की ऊँचाई पर बैठा था, सुरक्षित और घमंडी। पर जो ऊँचाई हम खुद अपने लिए बनाते हैं, वह परमेश्वर के सामने एक पल में ढह जाती है। आज अपने मन से पूछ: मेरी सुरक्षा किस पर टिकी है, अपनी कमाई और नाम पर, या उसकी दया पर?
एदोम ने न तलवार उठाई, न फाटक तोड़ा। वह बस खड़ा देखता रहा, और परमेश्वर ने कहा, "उस दिन तू भी उनमें से एक था।" चुप रहना भी एक पक्ष चुनना है। जब तेरे भाई की बदनामी हो रही थी और तू मुँह फेरकर चला गया, तब तू निर्दोष नहीं था। सोच, आज किसके दर्द के सामने तू अलग खड़ा है?
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