बाइबल व्याख्या

फिलिप्पियों 1

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

रोम की किसी कोठरी से, ज़ंजीरों में, पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया को लिखता है। वह उनके लिए धन्यवाद और प्रार्थना से शुरू करता है, फिर बताता है कि उसकी कैद ने सुसमाचार को रोका नहीं बल्कि आगे बढ़ाया, यहाँ तक कि उसके विरोधी भी जब गलत नीयत से मसीह का प्रचार करते हैं तो वह आनन्दित होता है। अंत में वह जीने और मरने के बीच अपनी उलझन खोलकर रख देता है, और कलीसिया से कहता है कि वे एक मन होकर, विरोधियों से बिना डरे, सुसमाचार के योग्य जीवन जिएँ।

मूल बात

पद 18 का वाक्य चुभता है: "चाहे बहाने से, चाहे सच्चाई से, मसीह की कथा सुनाई जाती है, और मैं इससे आनन्दित हूँ।" पौलुस अपनी प्रतिष्ठा को दाँव पर लगा हुआ नहीं देखता, क्योंकि दाँव पर वह है ही नहीं। यही इस अध्याय का धार्मिक केंद्र है: परमेश्वर का काम मनुष्य की नीयत से बड़ा है, और उसका पूरा होना मनुष्य की क्षमता पर टिका नहीं। पद 6 इसे साफ़ कहता है, "जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा।" शुरुआत उनकी नहीं थी; अंत भी उनका नहीं होगा। अनुग्रह का अर्थ यही है कि हमारी पकड़ ढीली पड़ जाए तो भी हम गिरते नहीं, क्योंकि पकड़ने वाला कोई और है।

मुख्य सूत्र

"मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है" (पद 21) कोई कवित्व नहीं, बल्कि पूरे बाइबल-कथानक का सिरा है। पुराने नियम में जीवन भूमि, संतान और लंबी आयु से नापा जाता था, और मृत्यु सबसे गहरा नुकसान थी। मसीह के जी उठने के बाद यह गणित पलट गया। पौलुस अपनी देह को अब लाभ-हानि की चीज़ नहीं, मसीह की महिमा का मंच मानता है: "मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है… चाहे मैं जीवित रहूँ या मर जाऊँ" (पद 20)। यह वही रास्ता है जिस पर मसीह पहले चले, और अगले अध्याय में पौलुस उसी को गीत बनाकर गाएगा। दुख अब शाप का चिह्न नहीं, अनुग्रह का दान है (पद 29)।

दर्पण

अब ईमानदारी से: जब आपके साथ का कोई व्यक्ति आपसे बेहतर सिखाता है, आपसे ज़्यादा सराहा जाता है, और उसकी नीयत आपको साफ़ भी नहीं लगती, तो क्या आपके भीतर आनन्द उठता है? या एक ठंडी, सभ्य नाराज़गी? पौलुस जेल में है और उसके प्रतिद्वंद्वी बाहर मंच पर हैं, फिर भी वह लिखता है, "आनन्दित रहूँगा भी।" यह वाक्य हमारी सेवकाई के पीछे छिपी भूख को उजागर कर देता है: हम मसीह का प्रचार चाहते हैं, पर अपने नाम के साथ। और पद 21 दूसरी परत खोलता है। अगर जीना मसीह है, तो नौकरी छूटने, शरीर के बीमार पड़ने, बच्चों के रास्ता बदल लेने पर भी कुछ नहीं छूटता। पर अगर जीना असल में सुरक्षा, इज़्ज़त और आराम है, तो हर नुकसान मौत जैसा लगेगा। यह पद आपको बताता है कि आप वास्तव में किसके सहारे जी रहे हैं।

प्रश्न

पद 25 अटपटा है: "मैं जानता हूँ कि मैं जीवित रहूँगा।" पौलुस को यह कैसे मालूम? और अगर यह भविष्यवाणी थी, तो परंपरा कहती है कि वह अंततः रोम में मारा गया। सबसे ईमानदार उत्तर यह है कि पौलुस यहाँ भविष्य की जानकारी नहीं दे रहा, बल्कि एक चरवाहे का भरोसा बोल रहा है: उसे लगता है कि परमेश्वर उसे इन लोगों के लिए अभी बचाए रखेंगे। वह गलत भी हो सकता था। और यही राहत की बात है, क्योंकि पद 19 में जिस "उद्धार" की वह बात करता है, वह जेल से रिहाई से बड़ा है। जो व्यक्ति यह मान चुका है कि मरना भी लाभ है, उसकी भविष्यवाणी गलत निकल जाए तो भी उसका भरोसा नहीं टूटता। हमारी प्रार्थनाओं में यह अंतर अक्सर धुँधला रहता है।

श्रोताओं का चेहरा

फिलिप्पी रोमी सैनिकों की बसाई हुई उपनिवेश-नगरी थी, जहाँ रोमी नागरिकता गर्व की चीज़ थी और कैसर के प्रति निष्ठा सार्वजनिक धर्म। इस शहर के विश्वासियों ने पद 13 में "कैसर के राजभवन" का ज़िक्र सुना होगा और सिहर उठे होंगे: सम्राट के अपने घर तक मसीह की खबर पहुँच गई। और पद 27 में जिस शब्द को हिन्दी "चाल-चलन" कहती है, वह मूल में नागरिक होने का शब्द है। पौलुस उनसे कह रहा है: तुम्हारा असली नगर-राज्य कहीं और है, वैसे ही जिओ। जिन लोगों पर पड़ोसियों का सामाजिक दबाव था, जिनका व्यापार और सुरक्षा रोम की व्यवस्था से जुड़ी थी, उनके लिए यह कोई भावुक बात नहीं थी। यह जोखिम था।

अंतर्पाठ

पद 29 पर रुकिए: विश्वास और दुख, दोनों दान हैं। यही बात लूका की पुस्तक में प्रेरितों के अनुभव से मिलती है, जहाँ पिटाई के बाद वे इसलिए आनन्दित होते हैं कि वे मसीह के नाम के लिए अपमान सहने के योग्य गिने गए। दोनों जगह दुख को दुर्घटना नहीं, बुलाहट का हिस्सा माना गया है। दूसरी ओर, पद 6 का "पूरा करेगा" उसी भरोसे की गूँज है जो रोमियों 8 में सुनाई देती है, जहाँ परमेश्वर जिन्हें बुलाते हैं उन्हें अंत तक ले जाते हैं। इन दोनों को साथ रखिए, तो चित्र पूरा होता है: वह जो आपको पकड़े हुए हैं, आपको कष्ट से बचाने का नहीं, बल्कि कष्ट के पार ले जाने का वादा करते हैं।

चिंतन

आपकी सेवकाई में ऐसा कौन है जिसकी सफलता पर आप सच्चा आनन्द नहीं मना पाते, और वह आपके भीतर की किस भूख को उजागर करता है?

अगर आज आपसे वह छिन जाए जिससे आपकी सुरक्षा जुड़ी है, तो "जीवित रहना मसीह है" कहना आपके मुँह में कितना सच्चा लगेगा?

Philippians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Philippians

Alec Motyer

Joy in every circumstance, traced through Paul's warmest letter.

Paul For Everyone: The Prison Letters

N.T. Wright

Ephesians, Philippians, Colossians and Philemon in short daily readings.

Philippians: An Introduction and Commentary

Ralph Martin

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Philippians

Frank Thielman

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Philippians 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

फिलिप्पियों 1 का क्या अर्थ है?
रोम की किसी कोठरी से, ज़ंजीरों में, पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया को लिखता है। वह उनके लिए धन्यवाद और प्रार्थना से शुरू करता है, फिर बताता है कि उसकी कैद ने सुसमाचार को रोका नहीं बल्कि आगे बढ़ाया, यहाँ तक कि उसके विरोधी भी जब गलत नीयत से मसीह का प्रचार करते हैं तो वह आनन्दित होता है। अंत में वह जीने और मरने के बीच अपनी उलझन खोलकर रख देता है, और कलीसिया से कहता है कि वे एक मन होकर, विरोधियों से बिना डरे, सुसमाचार के योग्य जीवन जिएँ।
फिलिप्पियों 1 किस विषय में है?
"मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है" (पद 21) कोई कवित्व नहीं, बल्कि पूरे बाइबल-कथानक का सिरा है। पुराने नियम में जीवन भूमि, संतान और लंबी आयु से नापा जाता था, और मृत्यु सबसे गहरा नुकसान थी। मसीह के जी उठने के बाद यह गणित पलट गया। पौलुस अपनी देह को अब लाभ-हानि की चीज़ नहीं, मसीह की महिमा का मंच मानता है: "मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है.
फिलिप्पियों 1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 25 अटपटा है: "मैं जानता हूँ कि मैं जीवित रहूँगा।" पौलुस को यह कैसे मालूम? और अगर यह भविष्यवाणी थी, तो परंपरा कहती है कि वह अंततः रोम में मारा गया। सबसे ईमानदार उत्तर यह है कि पौलुस यहाँ भविष्य की जानकारी नहीं दे रहा, बल्कि एक चरवाहे का भरोसा बोल रहा है: उसे लगता है कि परमेश्वर उसे इन लोगों के लिए अभी बचाए रखेंगे। वह गलत भी हो सकता था। और यही राहत की बात है, क्योंकि पद 19 में जिस "उद्धार" की वह बात करता है, वह जेल से रिहाई से बड़ा है। जो व्यक्ति यह मान चुका है कि मरना भी लाभ है, उसकी भविष्यवाणी गलत निकल जाए तो भी उसका भरोसा नहीं टूटता। हमारी प्रार्थनाओं में यह अंतर अक्सर धुँधला रहता है।
फिलिप्पियों 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पद 29 पर रुकिए: विश्वास और दुख, दोनों दान हैं। यही बात लूका की पुस्तक में प्रेरितों के अनुभव से मिलती है, जहाँ पिटाई के बाद वे इसलिए आनन्दित होते हैं कि वे मसीह के नाम के लिए अपमान सहने के योग्य गिने गए। दोनों जगह दुख को दुर्घटना नहीं, बुलाहट का हिस्सा माना गया है। दूसरी ओर, पद 6 का "पूरा करेगा" उसी भरोसे की गूँज है जो रोमियों 8 में सुनाई देती है, जहाँ परमेश्वर जिन्हें बुलाते हैं उन्हें अंत तक ले जाते हैं। इन दोनों को साथ रखिए, तो चित्र पूरा होता है: वह जो आपको पकड़े हुए हैं, आपको कष्ट से बचाने का नहीं, बल्कि कष्ट के पार ले जाने का वादा करते हैं।
फिलिप्पियों 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर आज आपसे वह छिन जाए जिससे आपकी सुरक्षा जुड़ी है, तो "जीवित रहना मसीह है" कहना आपके मुँह में कितना सच्चा लगेगा?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Philippians 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

पौलुस की प्रार्थना यह नहीं थी कि तुम बुरे और भले में फर्क कर सको, वह तो साफ है। वह चाहता था कि तुम "उत्तम से उत्तम बातों को प्रिय जानो।" सबसे कठिन चुनाव अच्छे और बुरे के बीच नहीं, दो अच्छी चीज़ों के बीच होता है। और यह समझ किताबों से नहीं, बढ़ते हुए प्रेम से आती है। आज तुम्हारा समय किस अच्छी चीज़ पर लग रहा है, जो सबसे उत्तम चीज़ को खा रही है?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 14

धन्यवाद प्रभु, कि पौलुस के बन्धन भी आपके हाथ में बेकार नहीं गए, बल्कि उनसे भाइयों ने हियाव बाँधा और निडर होकर आपका वचन सुनाया। धन्यवाद कि आज भी मेरी कठिनाइयों को देखकर किसी और का विश्वास मज़बूत हो सकता है, और आप ही साहस देनेवाले हैं।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 19

पिता, जब हालात बंद दरवाज़े जैसे लगते हैं, तब भी मैं जानता हूँ कि तू काम कर रहा है। जो लोग मेरे लिए प्रार्थना करते हैं, उनके लिए धन्यवाद। अपनी आत्मा से मुझे थामे रख, ताकि मैं डरने के बजाय तुझ पर भरोसा रखूँ।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 15

पिता, मेरे मन के छिपे इरादों को तू जानता है। कई बार मेरी सेवा में भी होड़ और जलन घुल जाती है। मुझे साफ मन दे, ताकि मैं अपना नाम नहीं, तेरे मसीह का नाम ऊँचा करूँ। और जब कोई और तेरी बात फैलाए, तो मैं भी दिल से खुश हो सकूँ।

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