फिलिप्पियों 2
पाठ
पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया से एक बात माँगता है: एक मन, एक प्रेम, और स्वार्थ के बदले दीनता, जिसमें हर कोई दूसरे को अपने से अच्छा समझे। इस माँग के नीचे वह एक स्तुतिगीत रख देता है जो मसीह के परमेश्वर के स्वरूप से उतरकर क्रूस तक जाने और वहाँ से सब नामों से श्रेष्ठ नाम तक ऊँचे उठाए जाने का वर्णन करता है। बाकी अध्याय इसी गीत का व्यावहारिक विस्तार है: डरते और काँपते हुए उद्धार का कार्य पूरा करना, कुड़कुड़ाए बिना जीना, और दो जीवित उदाहरण, तीमुथियुस और इपफ्रुदीतुस, जिन्होंने अपने प्राण दूसरों के लिए जोखिम में डाले।
मूल बात
"अपने आपको ऐसा शून्य कर दिया" (पद 7) में जो यूनानी शब्द है, केनोओ, अर्थात खाली कर देना, उसने सदियों तक धर्मशास्त्रियों को उलझाया है। मसीह ने क्या छोड़ा? पाठ यह नहीं कहता कि उन्होंने परमेश्वरत्व छोड़ दिया; वह कहता है कि उन्होंने परमेश्वर के तुल्य होने को "अपने वश में रखने की वस्तु" नहीं समझा। यही निर्णायक मोड़ है। हमारे लिए सत्ता का अर्थ है पकड़ बनाए रखना; परमेश्वर के लिए सत्ता का अर्थ है स्वयं को दे देना। इसका मतलब यह है कि क्रूस परमेश्वर के स्वभाव का अपवाद नहीं, उसका सबसे स्पष्ट प्रकाशन है। जो परमेश्वर हम आदम के बाद से अपनी कल्पना में गढ़ते आए हैं, एक बड़ा शासक जिसे संतुष्ट करना है, वह इस गीत में टूट जाता है। अनुग्रह कोई विभागीय नीति नहीं; वह परमेश्वर का ही चरित्र है।
जोड़ने वाला सूत्र
पद 10 और 11 यशायाह 45 से लिए गए हैं, जहाँ परमेश्वर स्वयं शपथ खाते हैं कि हर घुटना उनके आगे झुकेगा और हर जीभ अंगीकार करेगी। पौलुस उस वचन को यीशु पर लगा देता है, और साथ ही जोड़ता है कि यह "परमेश्वर पिता की महिमा के लिये" होता है। एक यहूदी के लिए यह भूकंप था: इस्राएल का एकमात्र प्रभु अपनी महिमा किसी के साथ बाँटता नहीं, फिर भी यहाँ बाँटी जा रही है, बिना बँटवारे के। और यह वही मार्ग है जो पूरे बाइबल में चलता है: आदम ने परमेश्वर के तुल्य होना छीनना चाहा और मरा; मसीह ने उसे छीना नहीं, स्वयं को दीन किया, और जीवन का द्वार खोल दिया। इस्राएल का बुलावा "दास" होने का था, और वह दास अब एक व्यक्ति में पूरा हो जाता है।
दर्पण
पद 3 वह जगह है जहाँ यह पाठ खरोंचता है। "एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो" का अर्थ भावना नहीं, निर्णय है: वह क्षण जब बैठक में आपकी बात नहीं मानी जाती और आप चुप रह जाते हैं क्योंकि दूसरे का प्रस्ताव सच में बेहतर है। वह क्षण जब घर में आपने सही होते हुए भी माफी पहले माँग ली। पौलुस पद 21 में एक निर्दयी वाक्य लिखता है: "सब अपने स्वार्थ की खोज में रहते हैं, न कि यीशु मसीह की।" यह अविश्वासियों के बारे में नहीं, उसके साथी सेवकों के बारे में है। कलीसिया में सेवा भी अहंकार का सुंदर वेश हो सकती है। और पद 14, "बिना कुड़कुड़ाए", हमारी सबसे प्रिय आदत पर हाथ रखता है: वह धीमी, नैतिक दिखने वाली शिकायत जो हमें अपनी नजर में सही ठहराती है और समुदाय को भीतर से खोखला कर देती है।
संदर्भ
पौलुस यह पत्र बंदी अवस्था में लिखता है, संभवतः रोम में, और उसे नहीं पता कि उसका मुकदमा कैसे समाप्त होगा; पद 17 में वह अपने लहू बहाने की बात खुली आँखों से करता है। फिलिप्पी एक रोमी उपनिवेश था, सेवानिवृत्त सैनिकों का शहर, जहाँ नागरिकता, पद और सम्मान की सीढ़ी सबसे बड़ा मूल्य था। ऐसे शहर में यह गीत सुनाना कि प्रभु सीढ़ी से नीचे उतरे, और दास का स्वरूप धारण किया, सांस्कृतिक रूप से लगभग अशोभनीय था। क्रूस वहाँ किसी धार्मिक प्रतीक का नाम नहीं था, बल्कि गुलामों और विद्रोहियों के लिए सुरक्षित रखी गई सबसे अपमानजनक मृत्यु का। पौलुस जान-बूझकर वहीं तक जाता है: "मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी।"
कठिन प्रश्न
पद 12 और 13 आपस में टकराते दिखते हैं। पहले: "डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ।" फिर: "क्योंकि परमेश्वर ही है, जिसने… तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है।" तो कौन काम कर रहा है? पौलुस इस तनाव को हल नहीं करता, और यह ध्यान देने योग्य है कि वह "क्योंकि" लिखता है, "फिर भी" नहीं। परमेश्वर का कार्य हमारे परिश्रम की जगह नहीं लेता; वह उसका आधार है। जो लोग कहते हैं कि अनुग्रह प्रयास को मार देता है, उन्हें यह पद पढ़ना चाहिए। और जो लोग सोचते हैं कि पवित्रता उनकी अपनी उपलब्धि है, उन्हें भी। "डरते और काँपते" का अर्थ आत्म-संदेह नहीं, बल्कि यह चेतना है कि परमेश्वर स्वयं आपके निर्णयों में काम कर रहे हैं। रहस्य बना रहता है, और वह रहस्य आराम देता है, आलस्य नहीं।
पहले सुननेवाले
फिलिप्पी के लोग जानते थे कि यह गीत केवल सिद्धांत नहीं था। इपफ्रुदीतुस उनका ही भेजा हुआ दूत था, जो पौलुस तक उनकी भेंट पहुँचाने में मरने के निकट पहुँच गया; पद 30 कहता है कि उसने "अपने प्राणों पर जोखिम उठाकर" यह किया। जब वे पद 8 सुनते थे कि मसीह ने अपने आपको दीन किया, तो उनके सामने एक चेहरा था। और वे "जगत में जलते दीपकों के समान" वाली बात व्यंग्य के रूप में नहीं, वरन जोखिम के रूप में सुनते थे: एक छोटा समूह, एक सैन्य नगर में, जिसका प्रभु राज्य-द्रोही की मौत मरा। उनके लिए "यीशु मसीह ही प्रभु है" कहना कैसर के बारे में एक चुप्पी थी, और यह चुप्पी महँगी पड़ सकती थी।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सा अधिकार या पद है जिसे आप "अपने वश में रखने की वस्तु" समझते हैं, और मसीह उसे कैसे देखते?
आपकी शिकायत करने की आदत में असल में कौन सा डर छिपा है?
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Philippians 2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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फिलिप्पियों 2 का क्या अर्थ है?
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फिलिप्पियों 2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फिलिप्पियों 2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Philippians 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, इपफ्रुदीतुस मरने पर था, पर आपने उस पर दया की और पौलुस को "शोक पर शोक" से बचा लिया। धन्यवाद कि आज भी आप बीमारों को उठाते हैं और हमारे अपनों को हमें लौटा देते हैं। हर स्वस्थ होती साँस आपकी करुणा का चिह्न है।
पौलुस जंजीरों में है, फिर भी उसकी चिंता अपनी नहीं: "मुझे प्रभु यीशु में आशा है कि मैं तीमुथियुस को तुम्हारे पास शीघ्र भेजूँगा, ताकि तुम्हारी दशा सुनकर मुझे शान्ति मिले।" कैदखाने में बैठा आदमी दूसरों का हाल जानकर शांत होता है। सोचो, तुम्हारे मन की शांति किस बात पर टिकी है? अपनी सुविधा पर, या इस पर कि तुम्हारे अपने मसीह में मजबूत खड़े हैं?
पिता, मेरी योजनाएँ मेरे हाथ में नहीं हैं, यह मैं जानता हूँ। फिर भी पौलुस की तरह मैं तुझ पर भरोसा रखना चाहता हूँ कि जो आगे है, वह तेरे हाथ में सुरक्षित है। जिनसे मिलने की आशा दिल में है, उन मुलाक़ातों को तू अपने समय पर पूरा कर। मुझे इंतज़ार में भी शांत रहना सिखा।
विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।" पौलुस यह जेल से लिख रहा है, और मसीह के झुकने की बात कहने से पहले कह रहा है। ध्यान दे, वह कहता है "समझो", यानी यह मन की बात है, दिखावे की नहीं। आज जिस व्यक्ति से तुलना करके तुम जलते हो, उसी को मन ही मन अपने से अच्छा समझकर देखो। क्या तुम्हारा दिल इसके लिए तैयार है?
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