फिलिप्पियों 2:5
पाठ
पौलुस एक लंबे वाक्य के बीच में अचानक रुककर पूरी बात को एक ही कसौटी पर टिका देता है: "जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।" इससे पहले की पंक्तियों में वह फिलिप्पी की कलीसिया से कह चुका है कि वे एक मन, एक प्रेम और एक मनसा रखें, स्वार्थ और मिथ्यागर्व से कुछ न करें, और दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझें। अब वह बताता है कि यह सब किसी नैतिक आदर्श से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति से निकलता है। आपसी व्यवहार की जड़ मसीह की अपनी सोच में है, और अगली पंक्तियों में वह उसी सोच को गाकर दिखाएगा: परमेश्वर के स्वरूप से लेकर क्रूस तक, और क्रूस से लेकर उस नाम तक जो सब नामों में श्रेष्ठ है।
मूल बात
यहाँ जो शब्द "स्वभाव" अनुवाद हुआ है, वह मूल यूनानी में फ्रोनेओ है, यानी सोचने का ढंग, मन का झुकाव, वह दिशा जिधर हमारा भीतरी रुख अपने आप मुड़ जाता है। पौलुस कोई व्यवहार-सूची नहीं दे रहा; वह मन की दिशा बदलने की बात कर रहा है। और यहीं पर यह वचन पूरे बाइबल-कथानक से टकराता है। उत्पत्ति की तीसरी अध्याय में साँप का प्रस्ताव यही था कि परमेश्वर के तुल्य होना एक पाने योग्य वस्तु है, और मनुष्य ने उसे पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया। मसीह, जो वास्तव में परमेश्वर के स्वरूप में थे, उन्होंने उसे "अपने वश में रखने की वस्तु न समझा"। आदम ने जो छीनना चाहा, मसीह ने उसे छोड़ दिया। उद्धार इसी उलटे रुख से आता है, और विश्वासियों का जीवन उसी उलटे रुख की नकल है।
सूत्र
जिस नाम के आगे "स्वर्ग में और पृथ्वी पर और जो पृथ्वी के नीचे है" सब घुटने टेकते हैं, वह शब्द पौलुस ने खुद नहीं गढ़े। यशायाह 45 में परमेश्वर स्वयं कहते हैं कि हर घुटना उनके सामने झुकेगा और हर जीभ शपथ खाएगी, और वहाँ साफ लिखा है कि यह सम्मान किसी और को नहीं दिया जाएगा। पौलुस वही पंक्ति उठाकर यीशु पर रख देता है, और उसे "परमेश्वर पिता की महिमा के लिये" कहकर बंद करता है। यानी सेवक का रास्ता परमेश्वर की महिमा से भटकाव नहीं, बल्कि उसका असली चेहरा है। पुराने नियम का पीड़ित सेवक, जो अपने आपको मृत्यु तक उँडेल देता है, और सिंहासन पर बैठा प्रभु, एक ही व्यक्ति निकलते हैं। यही सूत्र है जिस पर पूरा उद्धार-इतिहास कसा हुआ है।
दर्पण
यह पद वहाँ चुभता है जहाँ हम सबसे अधिक हिसाब लगाते हैं। दफ्तर की उस बैठक में जहाँ आपने काम किया और श्रेय किसी और को मिला। घर में, जहाँ आप मन ही मन गिनते रहते हैं कि इस हफ्ते किसने कितना किया। कलीसिया की उस समिति में, जहाँ असहमति का असली मुद्दा सिद्धांत नहीं, बल्कि यह है कि किसकी बात अंत में मानी जाएगी। पौलुस इन सब पर एक ही सवाल रखता है: आपका मन किस दिशा में अपने आप मुड़ता है, पकड़ने की ओर या छोड़ने की ओर? मसीह के पास छोड़ने को सब कुछ था, और उन्होंने छोड़ा। आज ही एक काम कीजिए: उस व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसके सामने आप पिछले कुछ दिनों से सही साबित होना चाहते हैं, और उसके नीचे लिखिए कि इस मामले में उसका कौन-सा हित आपके हित से बड़ा है।
संदर्भ
फिलिप्पी कोई साधारण शहर नहीं था, वह रोमी उपनिवेश था, जहाँ सेवानिवृत्त सैनिक बसाए गए थे और रोमी नागरिकता गर्व की चीज़ थी। वहाँ की हवा में पद, सम्मान और श्रेणी का गहरा बोध था; आदमी की कीमत इस बात से तय होती थी कि वह सार्वजनिक रूप से कहाँ खड़ा है। उसी शहर की कलीसिया को पौलुस लिखता है, और खुद वह जेल में है, जंजीरों में, बिना किसी सम्मान के। ऊपर से वह चिट्ठी में बार-बार आनन्द की बात करता है और कहता है कि उसके विश्वास के बलिदान पर अपना लहू बहाना भी उसे स्वीकार है। एक कैदी सम्मान-प्रधान नगर को लिख रहा है कि असली ऊँचाई नीचे जाने से मिलती है। यह बात तब उतनी ही अटपटी थी जितनी आज है।
प्रश्न
अगर यीशु का स्वभाव इतना अनोखा है कि वह परमेश्वर के स्वरूप से शुरू होता है, तो हमसे वैसा ही स्वभाव रखने को कहना क्या उचित है? हम परमेश्वर के तुल्य कभी थे ही नहीं; हमारे पास छोड़ने को वह है ही नहीं जो उनके पास था। यह आज्ञा कहीं कुचल देने वाली तो नहीं? पौलुस इस तनाव को मिटाता नहीं, पर वह इसे अकेला भी नहीं छोड़ता। कुछ ही पंक्तियों बाद वह लिखता है कि "डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ", और तुरंत जोड़ता है कि परमेश्वर ही हमारे मन में इच्छा और काम दोनों का प्रभाव डालते हैं। आदेश बना रहता है, भार बना रहता है, पर उसे उठाने वाली शक्ति हमारे भीतर से नहीं आती। यह रहस्य सुलझता नहीं, सहा जाता है।
मुख्य पात्र
इन पंक्तियों का केंद्र मसीह हैं, और जो चित्र उभरता है वह चौंकाने वाला है: ऐसा कोई जिसके पास सब कुछ था और जिसने अपने अधिकार को ढाल की तरह नहीं, बल्कि देने की वस्तु की तरह देखा। "अपने आपको ऐसा शून्य कर दिया" में कोई मजबूरी नहीं, कोई हार नहीं; यह एक निर्णय है, और वह निर्णय बार-बार दोहराया जाता है, दास के रूप तक, मनुष्य की समानता तक, आज्ञाकारिता तक, क्रूस तक। हर कदम नीचे की ओर, और हर कदम स्वेच्छा से। इससे परमेश्वर के बारे में जो पता चलता है वह यह है कि उनकी महानता अपने को बचाने में नहीं, अपने को देने में दिखती है। और इंसान के बारे में यह कि हमारी सबसे गहरी बीमारी पकड़ने की आदत है, जिसका इलाज केवल एक ही मन से होता है, उनके मन से।
चिंतन
पिछले सप्ताह में कौन-सा निर्णय आपने इसलिए लिया क्योंकि उसमें आपका स्थान सुरक्षित रहता था, और मसीह का मन उस जगह क्या करता?
यशायाह का वह वचन, जिसमें हर घुटना परमेश्वर के आगे झुकता है, यीशु पर लागू होता है। यह आपकी प्रार्थना के लहजे को कैसे बदलता है?
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Philippians 2:5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
फिलिप्पियों 2:5 का क्या अर्थ है?
फिलिप्पियों 2:5 किस विषय में है?
फिलिप्पियों 2:5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
फिलिप्पियों 2:5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फिलिप्पियों 2:5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Philippians 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरी योजनाएँ मेरे हाथ में नहीं हैं, यह मैं जानता हूँ। फिर भी पौलुस की तरह मैं तुझ पर भरोसा रखना चाहता हूँ कि जो आगे है, वह तेरे हाथ में सुरक्षित है। जिनसे मिलने की आशा दिल में है, उन मुलाक़ातों को तू अपने समय पर पूरा कर। मुझे इंतज़ार में भी शांत रहना सिखा।
विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।" पौलुस यह जेल से लिख रहा है, और मसीह के झुकने की बात कहने से पहले कह रहा है। ध्यान दे, वह कहता है "समझो", यानी यह मन की बात है, दिखावे की नहीं। आज जिस व्यक्ति से तुलना करके तुम जलते हो, उसी को मन ही मन अपने से अच्छा समझकर देखो। क्या तुम्हारा दिल इसके लिए तैयार है?
इपफ्रुदीतुस बीमार पड़ा, मरते मरते बचा, और खाली हाथ लौटा नहीं, पर शायद लोग सोचते कि वह जल्दी लौट आया। पौलुस पहले ही कह देता है, "इसलिए तुम प्रभु में उससे बहुत आनन्द के साथ भेंट करना, और ऐसों का आदर किया करो।"
जो चुपचाप तेरे लिए घिसते रहे, क्या तूने कभी उन्हें आनन्द से अपनाया? या बस उनसे काम लिया और आगे बढ़ गया?
इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है।" ध्यान दो, यह "इस कारण" कहाँ से आता है। क्रूस से। नीचे उतरने से। जिस रास्ते को दुनिया हार कहती है, परमेश्वर उसी को ऊँचा उठाता है।
तो जहाँ तुम आज झुक रहे हो, और किसी को दिख भी नहीं रहा, वहाँ परमेश्वर की नज़र है। वह भूलता नहीं।
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