फिलिप्पियों 3:15
पाठ
पौलुस ने अभी-अभी कहा था कि वह "सिद्ध हो चुका" नहीं है (पद 12), और अब वही शब्द दोबारा उठाता है: "अतः हम में से जितने सिद्ध हैं, यही विचार रखें।" यानी जो लोग परिपक्व हैं, वे ठीक यही सोच अपनाएँ, वही दौड़नेवाले की सोच जो मानती है कि अभी मंज़िल पीछे नहीं छूटी। और फिर एक चौंकानेवाला वाक्य: अगर किसी बात में तुम्हारी सोच अलग है, तो पौलुस बहस नहीं छेड़ता, धमकी नहीं देता, बल्कि कहता है कि परमेश्वर स्वयं वह बात तुम पर प्रगट कर देंगे। तर्क की जगह प्रकाशन, दबाव की जगह धैर्य।
मूल बात
यहाँ परिपक्वता की परिभाषा ही पलट जाती है। मसीही परिपक्वता का अर्थ यह नहीं कि आप पहुँच गए, बल्कि यह कि आप जानते हैं कि आप अभी नहीं पहुँचे, और इसीलिए दौड़ते हैं। जो व्यक्ति सोचता है कि वह पूरा हो चुका, वही असल में सबसे कच्चा है। दूसरी बात और भी गहरी है: पौलुस मतभेद को अपने हाथ में नहीं लेता। वह यह नहीं कहता कि "मैं तुम्हें समझा दूँगा", बल्कि "परमेश्वर उसे भी तुम पर प्रगट कर देगा।" सत्य की समझ अंततः तर्कशक्ति की उपज नहीं, प्रकाशन की देन है, ठीक वैसे ही जैसे दमिश्क के मार्ग पर पौलुस की अपनी आँखें किसी बहस से नहीं, बल्कि मसीह के सामने आने से खुलीं। यही अनुग्रह कलीसिया के भीतर धैर्य पैदा करता है।
सूत्र
यह छोटा-सा वाक्य परमेश्वर की बड़ी कहानी की चाल से मेल खाता है। इब्राहीम एक देश की ओर चला जिसे उसने कभी अपने हाथ में नहीं पाया। इस्राएल मिस्र से निकला और चालीस साल तक "अभी नहीं पहुँचे" की स्थिति में जीया, रोज़ का मन्ना, रोज़ का भरोसा। परमेश्वर अपने लोगों को हमेशा रास्ते पर रखते हैं, मंज़िल पर बैठा नहीं देते। पौलुस इसी पैटर्न में खड़ा है, और वह मंज़िल बताता भी है: पद 21 में वह लिखता है कि मसीह "हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा।" यानी सिद्धता कोई आत्मिक उपलब्धि नहीं, बल्कि वह दिन है जब मसीह लौटेंगे। तब तक हर परिपक्व विश्वासी चलता हुआ आदमी है, पहुँचा हुआ नहीं।
दर्पण
मतभेद कहाँ चुभता है? उस भाई के साथ जो आपकी कलीसिया की समिति में हर बात पर उल्टा बोलता है। उस बेटी के साथ जिसने बपतिस्मे के बारे में आपसे अलग राय बना ली। उस सहकर्मी के साथ जो मसीही तो है, पर पैसे और राजनीति पर आपके ठीक विपरीत खड़ा है। हमारी पहली प्रवृत्ति होती है दबाव डालना, तर्क से जीतना, या चुपचाप उसे कम परिपक्व मान लेना। पौलुस यह विकल्प हमारे हाथ से ले लेता है। वह कहता है, परमेश्वर उसे भी उस पर प्रगट कर देंगे। इसका मतलब आलस नहीं, बल्कि यह भरोसा कि सत्य को खोलने का काम अंततः आपका नहीं है। आज ही एक काम कीजिए: जिस व्यक्ति से आप किसी विश्वास की बात पर असहमत हैं, उसका नाम कागज़ पर लिखिए और एक वाक्य में प्रार्थना कीजिए कि परमेश्वर उस बात को उस पर, और मुझ पर भी, प्रगट करें।
अंतर्पाठ
पौलुस "सिद्ध" शब्द को कुरिन्थ की कलीसिया में भी इसी तीखेपन से इस्तेमाल करता है। वहाँ जो लोग खुद को आत्मिक समझते थे, उन्हें वह दूध पीनेवाले बच्चे कहता है, और सबूत के तौर पर उनके झगड़े गिनाता है (1 कुरिन्थियों 3)। यानी परिपक्वता की पहचान ज्ञान की मात्रा नहीं, बल्कि झगड़े के प्रति रवैया है, ठीक वही बात जो यहाँ फिलिप्पियों में दोहराई जा रही है। दूसरा गूँजता हुआ पन्ना है रोमियों 14, जहाँ खाने-पीने और दिनों को लेकर मतभेद रखनेवाले विश्वासियों से पौलुस कहता है कि हर कोई अपने मन में पूरी तरह निश्चय कर ले और दूसरे को तुच्छ न जाने। और यीशु का वचन इसके नीचे बुनियाद की तरह पड़ा है: पवित्र आत्मा ही सब सत्य का मार्ग दिखाएँगे (यूहन्ना 16)। पौलुस कोई नई उदारता नहीं गढ़ रहा, वह आत्मा के काम पर भरोसा कर रहा है। साथ ही एक तनाव बना रहता है: यही पौलुस पद 2 में "कुत्तों से चौकस रहो" कहकर विरोधियों को कोई छूट नहीं देता। धैर्य मतभेद के लिए है, क्रूस के बैरियों के लिए नहीं।
मुख्य पात्र
यह वही आदमी है जो कभी कलीसिया का सतानेवाला था (पद 6), जो असहमति को जेल और कोड़ों से सुलझाता था। उसी आदमी की कलम से अब निकलता है: परमेश्वर उसे भी तुम पर प्रगट कर देगा। यह परिवर्तन किसी नरम स्वभाव का नतीजा नहीं, बल्कि इस अनुभव का है कि उसकी अपनी आँखें भी किसी के समझाने से नहीं, मसीह के सामने आने से खुली थीं। पौलुस भावनाहीन भी नहीं है, कुछ पदों बाद वह "रो-रोकर" लिखता है। यही उसका आत्मिक भूदृश्य है: दृढ़ता और आँसू एक साथ, आग्रह और धैर्य एक साथ। वह न तो सब कुछ ढीला छोड़ता है, न सब कुछ अपनी मुट्ठी में रखता है।
बारीकी
"प्रगट कर देगा" के पीछे जो यूनानी शब्द है, अपोकालूप्तो, उसका अर्थ है परदा हटाना, ढका हुआ खोल देना। यह वही शब्द-परिवार है जिससे "प्रकाशितवाक्य" बनता है। पौलुस यह नहीं कहता कि परमेश्वर तुम्हें समझा देंगे या मना लेंगे, बल्कि यह कि वे परदा उठा देंगे। इसका मतलब है कि आपके भाई की अधूरी समझ कोई ज़िद नहीं, एक ढका हुआ हिस्सा है, और उसे खोलने का अधिकार किसी इंसान के पास नहीं। यह शब्द कलीसिया की बहसों से हड़बड़ी निकाल देता है। परदा अपने समय पर उठेगा, और तब तक, जैसा अगला पद कहता है, "जहाँ तक हम पहुँचे हैं, उसी के अनुसार चलें।"
चिंतन
आप किस बात पर आश्वस्त हैं कि आप सही हैं, और क्या आप उस पर परमेश्वर से नए सिरे से परदा उठाने की प्रार्थना कर सकते हैं?
जिन लोगों से आप विश्वास की किसी बात पर असहमत हैं, उनके साथ आपका व्यवहार तर्क से चलता है या धैर्य से?
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फिलिप्पियों 3:15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Philippians 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस यह नहीं कहता कि "मैं मसीह को पा लूँ," वह कहता है "मसीह में पाया जाऊँ।" फर्क बड़ा है। एक में मेहनत है, दूसरे में समर्पण।
सोच कि जिस दिन परमेश्वर तुझे देखेगा, तू कहाँ खड़ा मिलेगा? अपने अच्छे कामों की सूची पर, या मसीह में छिपा हुआ? पौलुस ने अपनी सारी धार्मिकता छोड़ दी, क्योंकि वह जानता था कि उसका ढेर बहुत छोटा है।
उत्साह के विषय में कलीसिया का सतानेवाला" पौलुस अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि गिनवा रहा है, और वही उसकी सबसे बड़ी भूल थी। उसका जोश सच्चा था, पर दिशा गलत। वह परमेश्वर के लिए लड़ते हुए परमेश्वर के लोगों को घायल कर रहा था। सोचिए, आपका जोश किसकी ओर बह रहा है? मसीह की ओर, या बस अपने सही होने को साबित करने की ओर?
कुत्तों से चौकस रहो, उन बुरे काम करनेवालों से चौकस रहो।" पौलुस तीन बार चेतावनी दोहराता है, क्योंकि जो लोग मसीह के साथ कुछ और जोड़ने आते हैं, वे कभी कठोर नहीं दिखते। उनकी बात मीठी और धार्मिक लगती है। आज भी कोई कहता है, यीशु काफ़ी हैं, पर इतना और कर लो तब पक्का होगा। तुम्हारे मन में वह कौन सी शर्त है जो चुपचाप अनुग्रह के ऊपर बैठ गई है?
हे भाइयो, तुम सब मिलकर मेरी सी चाल चलो" ऐसा कहने का साहस पौलुस को कहाँ से मिला? ठीक पिछली आयतों में उसने माना था कि वह अभी पहुँचा नहीं, बस दौड़ रहा है। यानी वह अपनी सिद्धता नहीं, अपनी दिशा दिखा रहा था। सोचो, क्या कोई तुम्हारे पीछे चलकर मसीह तक पहुँच सकता है? तुम्हारी चाल किसी की राह बन रही है, चाहे तुम जानो या न जानो।
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