फिलिप्पियों 3:2
पाठ
पौलुस ने अभी अभी लिखा है, "प्रभु में आनन्दित रहो", और अगली ही साँस में उसका स्वर बदल जाता है। तीन बार वह वही चेतावनी हथौड़े की तरह चलाता है: "कुत्तों से चौकस रहो, उन बुरे काम करनेवालों से चौकस रहो, उन काट-कूट करनेवालों से चौकस रहो।" तीनों नाम अलग-अलग गुटों के नहीं, एक ही गिरोह के हैं: वे शिक्षक जो फिलिप्पी के गैर-यहूदी विश्वासियों को समझा रहे थे कि मसीह पर भरोसा तो ठीक है, पर पूरे होने के लिए खतना भी चाहिए। पौलुस उन्हें थोड़ा आगे बढ़े हुए भाई नहीं कहता; वह उन्हें खतरा कहता है। और तुरंत अगले वाक्य में वह पासा पलट देता है: "यथार्थ खतनावाले तो हम ही हैं जो परमेश्वर के आत्मा की अगुआई से उपासना करते हैं।"
मूल बात
इन तीन गालियों की पूरी मार तब समझ आती है जब आप देखें कि पौलुस किसके शब्द किसके सिर पर लौटा रहा है। "कुत्ते" वह नाम था जो यहूदी परंपरा में अशुद्ध, बाहर खड़े अन्यजातियों के लिए चलता था; यीशु के मुँह से भी वह शब्द सुनाई देता है जब कनानी स्त्री से कहा जाता है, "बच्चों की रोटी लेकर कुत्तों के आगे डालना अच्छा नहीं" (मत्ती 15:26), और वह स्त्री विश्वास से उसी शब्द को उलट देती है। पौलुस अब वही ठप्पा उन पर लगाता है जो ठप्पे लगाते थे। इसी तरह "काट-कूट" शब्द में यूनानी में खतने (पेरितोमे) की जगह कतातोमे रखा गया है, यानी चीरफाड़, वैसी ही जैसी बाल के नबियों ने कार्मेल पर अपने शरीर पर की थी (1 राजा 18:28)। परमेश्वर की वाचा का चिन्ह, जब उसे मसीह से काटकर योग्यता का साधन बना दिया जाए, तो वह मूर्तिपूजक कर्मकांड से अधिक कुछ नहीं रह जाता। यही इस पद का धर्मशास्त्रीय हृदय है: कृपा में कुछ जोड़ना उसे बढ़ाना नहीं, उसे रद्द करना है।
सूत्र
खतना कोई मामूली रिवाज नहीं था। वह अब्राहम के साथ बाँधी गई वाचा का शरीर पर लिखा हुआ हस्ताक्षर था, पीढ़ियों तक इस्राएल की पहचान। इसीलिए पौलुस का हमला इतना चौंकाता है। पर वह वाचा के विरुद्ध नहीं बोल रहा; वह कह रहा है कि वाचा अपनी मंज़िल पर पहुँच चुकी है। मूसा और भविष्यद्वक्ता पहले से पुकार रहे थे कि परमेश्वर एक दिन हृदय का खतना करेंगे, कि चिन्ह अपने अर्थ में समा जाएगा। पद 3 में पौलुस ठीक यही घोषणा करता है: "यथार्थ खतनावाले तो हम ही हैं… और शरीर पर भरोसा नहीं रखते।" जो चीज़ मसीह की ओर इशारा करने के लिए दी गई थी, उसे मसीह के बराबर खड़ा कर देना उसका सबसे बड़ा अपमान है। छाया असली शरीर के आने पर भी टिकी रहने की ज़िद करे, तो वह अंधकार बन जाती है।
दर्पण
हममें से अधिकांश किसी को खतने के लिए बाध्य नहीं कर रहे। पर हर एक के पास एक छोटी सूची है जो हम चुपचाप मसीह के साथ जोड़े रखते हैं: कितने साल से कलीसिया में हैं, बच्चों की परवरिश कितनी ठीक निकली, दशमांश की नियमितता, सुबह की प्रार्थना का सिलसिला, यह कि हमने वह पाप कभी नहीं किया जो पड़ोसी ने किया। ये चीज़ें बुरी नहीं; पौलुस की सूची तो और भी शानदार थी, "व्यवस्था की धार्मिकता के विषय में यदि कहो तो निर्दोष था।" खतरा तब है जब वे भरोसे की जगह ले लें, क्योंकि तब हम दूसरों को भी उसी तराजू पर तौलने लगते हैं। आज एक काम कीजिए: कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसके बल पर आप भीतर ही भीतर परमेश्वर के सामने खुद को स्वीकार्य मानते हैं, फिर उस पर काट का निशान लगाकर ऊपर लिखिए, "मसीह यीशु।"
प्रश्न
क्या मसीही व्यक्ति को इस तरह बोलने की छूट है? "कुत्ते" एक गाली है, और पौलुस उसे उन लोगों पर फेंकता है जो शायद ईमानदारी से यही मानते थे कि वे लोगों को परमेश्वर के करीब ला रहे हैं। यह वही पौलुस है जो कुछ पंक्तियों बाद "रो-रोकर" इन्हीं विरोधियों की बात करता है। कठोरता और आँसू एक ही आदमी में। मैं इसे मुलायम नहीं करूँगा: यहाँ प्रेम का अर्थ नरम स्वर नहीं, बल्कि झुंड के आगे खड़े होकर चिल्लाना है। पर यह भी सच है कि यह अधिकार हर बहस में हमें अपने आप नहीं मिल जाता। पौलुस सुसमाचार की जड़ पर हो रहे हमले के विरुद्ध बोल रहा है, अपनी पसंद की परंपरा के बचाव में नहीं। फर्क पहचानना हमारा काम है, और उसमें गलती करना आसान है।
मुख्य पात्र
यह पद पौलुस की आत्मकथा का सबसे तीखा कोना है, क्योंकि जिन्हें वह कोस रहा है वे उसका अपना पुराना चेहरा हैं। "इब्रानियों का इब्रानी", "फरीसी", "कलीसिया का सतानेवाला": वह जानता है कि ऐसी धार्मिकता भीतर से कैसी लगती है, कितनी ठोस और सुरक्षित। इसलिए उसका गुस्सा तिरस्कार नहीं, पहचान है। जो आदमी कभी उसी सीढ़ी पर चढ़ता रहा और जिसे दमिश्क की सड़क पर नीचे गिरा दिया गया, वह दूसरों को उसी सीढ़ी पर चढ़ते देखकर चुप नहीं रह सकता। उसकी भावनात्मक ज़मीन दो चीज़ों से बनी है: अपनी योग्यताओं को "कूड़ा" कह देने की मुक्ति, और यह डर कि उसके आत्मिक बच्चे फिर से उसी कैद में लौट जाएँगे।
पृष्ठभूमि
फिलिप्पी एक रोमी उपनिवेश था, सेवानिवृत्त सैनिकों का शहर, जहाँ रोमी नागरिकता ही सबसे बड़ी पहचान थी। यहूदी आबादी इतनी कम थी कि प्रेरितों के काम के अनुसार आराधनालय तक नहीं, नदी किनारे प्रार्थना की जगह थी। इस माहौल में एक नई कलीसिया के गैर-यहूदी विश्वासी असुरक्षित महसूस करते: उनकी कोई प्राचीन वंशावली नहीं, कोई ठोस चिन्ह नहीं। और तब कोई आकर कहे कि खतना करा लो, तो तुम भी अब्राहम की गिनती में आ जाओगे, तो यह प्रस्ताव आकर्षक लगता है। पौलुस स्वयं कैद में है, पत्र दूर से लिखा जा रहा है, और वह जानता है कि वह मौके पर पहुँचकर बचाव नहीं कर सकता। इसलिए तीन बार वही चेतावनी: यह चिट्ठी उसकी आवाज़ का स्थानापन्न है।
चिंतन
आपकी अपनी "लाभ की सूची" में क्या लिखा है, और उसे "कूड़ा" कहने में सबसे ज़्यादा किस बात का दर्द होगा?
जिन मान्यताओं की आप पूरी ताकत से रक्षा करते हैं, उनमें से कौन सी वाकई सुसमाचार की जड़ है और कौन सी सिर्फ आपकी परिचित परंपरा?
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Philippians 3:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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फिलिप्पियों 3:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Philippians 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस यह नहीं कहता कि "मैं मसीह को पा लूँ," वह कहता है "मसीह में पाया जाऊँ।" फर्क बड़ा है। एक में मेहनत है, दूसरे में समर्पण।
सोच कि जिस दिन परमेश्वर तुझे देखेगा, तू कहाँ खड़ा मिलेगा? अपने अच्छे कामों की सूची पर, या मसीह में छिपा हुआ? पौलुस ने अपनी सारी धार्मिकता छोड़ दी, क्योंकि वह जानता था कि उसका ढेर बहुत छोटा है।
उत्साह के विषय में कलीसिया का सतानेवाला" पौलुस अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि गिनवा रहा है, और वही उसकी सबसे बड़ी भूल थी। उसका जोश सच्चा था, पर दिशा गलत। वह परमेश्वर के लिए लड़ते हुए परमेश्वर के लोगों को घायल कर रहा था। सोचिए, आपका जोश किसकी ओर बह रहा है? मसीह की ओर, या बस अपने सही होने को साबित करने की ओर?
कुत्तों से चौकस रहो, उन बुरे काम करनेवालों से चौकस रहो।" पौलुस तीन बार चेतावनी दोहराता है, क्योंकि जो लोग मसीह के साथ कुछ और जोड़ने आते हैं, वे कभी कठोर नहीं दिखते। उनकी बात मीठी और धार्मिक लगती है। आज भी कोई कहता है, यीशु काफ़ी हैं, पर इतना और कर लो तब पक्का होगा। तुम्हारे मन में वह कौन सी शर्त है जो चुपचाप अनुग्रह के ऊपर बैठ गई है?
हे भाइयो, तुम सब मिलकर मेरी सी चाल चलो" ऐसा कहने का साहस पौलुस को कहाँ से मिला? ठीक पिछली आयतों में उसने माना था कि वह अभी पहुँचा नहीं, बस दौड़ रहा है। यानी वह अपनी सिद्धता नहीं, अपनी दिशा दिखा रहा था। सोचो, क्या कोई तुम्हारे पीछे चलकर मसीह तक पहुँच सकता है? तुम्हारी चाल किसी की राह बन रही है, चाहे तुम जानो या न जानो।
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