भजन संहिता 1:1
पाठ
पहला भजन एक धन्यता की घोषणा से शुरू होता है, पर उसे तीन नकारों से गढ़ा गया है: वह मनुष्य धन्य है जो दुष्टों की सलाह के पीछे नहीं चलता, पापियों के रास्ते पर खड़ा नहीं होता, और ठट्ठा करनेवालों की मण्डली में बैठता नहीं। चलना, खड़ा होना, बैठना; गति धीमी होती जाती है, संगति गहरी होती जाती है। धन्यता की पहली परिभाषा यह नहीं कि आदमी क्या करता है, बल्कि यह कि वह किसके साथ अपना ठिकाना बनाता है।
मर्म
ध्यान दीजिए कि पूरे भजन-संग्रह का द्वार एक आशीष से खुलता है, आज्ञा से नहीं। "क्या ही धन्य है वह मनुष्य" कोई शर्त नहीं थोपता, वह एक जीवन की ओर उँगली उठाकर कहता है: देखो, यही सुख है। परमेश्वर यहाँ न्यायाधीश से पहले साक्षी हैं; वे उस जीवन को देखते और सराहते हैं जो उनकी संगति में बसा है। और यहीं मानव-स्वभाव का सच खुलता है: हम अपनी सोच खुद नहीं गढ़ते, हम उसे उधार लेते हैं। जिसकी योजना हम सुनते हैं, जिसके रास्ते पर हम रुकते हैं, जिसकी मेज़ पर हम बैठते हैं, वही धीरे-धीरे हमारी कल्पना का मालिक बन जाता है। पाप यहाँ पहले कर्म नहीं, पहले संगति है।
मुख्य सूत्र
यह पद अकेला खड़ा नहीं है। यहोशू को अपनी नियुक्ति के समय जो कहा गया था, कि व्यवस्था की पुस्तक उसके मुँह से न हटे और वह रात-दिन उस पर ध्यान करे, वही शब्द यहाँ भजन के दूसरे पद में लौट आते हैं। जो बात एक सेनापति के लिए कही गई थी, वह अब हर साधारण विश्वासी की बुलाहट बन जाती है। और तीसरे पद का बहती धाराओं के किनारे लगा वृक्ष यिर्मयाह की उस तस्वीर से गूँजता है जहाँ मनुष्य पर भरोसा रखनेवाला रेगिस्तान की झाड़ी है और यहोवा पर भरोसा रखनेवाला जल के किनारे का पेड़। यह सूत्र मसीह तक जाता है: पहाड़ी उपदेश भी "धन्य हैं" से शुरू होता है, पर वहाँ धन्यता दीन और शोक करनेवालों पर उतरती है। भजन जिस पूर्ण मनुष्य की ओर इशारा करता है, वह अंततः केवल एक ही निकला।
दर्पण
यह पद उन जगहों पर चुभता है जहाँ हमने संगति को "बस काम की बात" कहकर बचा लिया है। वह व्हाट्सएप ग्रुप जहाँ किसी की खिल्ली उड़ाना अपनापन जताने का तरीका बन गया है; दफ़्तर की वह टीम जहाँ हिसाब में थोड़ी चालाकी समझदारी कहलाती है; परिवार का वह कोना जहाँ किसी रिश्तेदार के बारे में बोलते समय आवाज़ नीची और ज़बान तेज़ हो जाती है। ठट्ठा करनेवालों की मण्डली शोर नहीं मचाती, वह आरामदेह होती है। और भजन कहता है: तुम वहाँ बैठ चुके हो। आज एक काम कीजिए: उस एक बातचीत या ग्रुप को नाम दीजिए जहाँ आप पिछले हफ़्ते किसी का मज़ाक बनाने में शामिल हुए थे, उसे कागज़ पर लिखिए, और उसी कागज़ पर परमेश्वर से एक वाक्य में माफ़ी माँगकर वह पन्ना फाड़ दीजिए।
प्रश्न
पर यहाँ एक असली तनाव है। यदि धन्य वही है जो पापियों के मार्ग में खड़ा नहीं होता, तो यीशु का क्या, जिन पर आरोप ही यह लगा कि वे चुंगी लेनेवालों और पापियों के साथ खाते-पीते हैं? क्या मसीह ने भजन एक का उल्लंघन किया? सस्ता उत्तर यह होगा कि "वे तो पवित्र थे, हम नहीं।" पर भजन शारीरिक दूरी की बात कर ही नहीं रहा; वह सलाह, मार्ग और मण्डली की बात कर रहा है, यानी उस जगह की जहाँ से हमारा सोचना और जीना तय होता है। यीशु पापियों के बीच बैठे, पर उनकी योजना पर कभी नहीं चले। फिर भी तनाव पूरी तरह घुलता नहीं, और शायद घुलना भी नहीं चाहिए: अलगाव और करुणा के बीच की रेखा हर बार नए सिरे से खींचनी पड़ती है, और हम अक्सर गलत तरफ़ गिरते हैं।
श्रोता-परिचय
जिन्होंने यह भजन पहली बार सुना, उनके लिए "मण्डली" कोई रूपक नहीं था। इस्राएल में बैठना अधिकार की मुद्रा थी; नगर के फाटक पर बुज़ुर्ग बैठकर न्याय करते थे। ठट्ठा करनेवालों की मण्डली में बैठने का अर्थ था उस पीठ पर जा बैठना जहाँ से फैसले सुनाए जाते हैं, और वहाँ से परमेश्वर की व्यवस्था पर हँसना। निर्वासन के बाद लौटे लोगों के लिए, जिनके पास न राजा था न सेना, यह पद बग़ावत जैसा था: धन्यता सत्ता से नहीं, संगति के चुनाव से तय होती है। एक किसान भी, जिसकी ज़मीन छिन चुकी हो, धन्य कहलाया जा सकता था।
केंद्रीय पात्र
पहले पद में परमेश्वर का नाम आता ही नहीं; वे छठे पद में आकर सब कुछ थाम लेते हैं, जहाँ लिखा है कि "यहोवा धर्मियों का मार्ग जानता है।" यह "जानना" जानकारी नहीं, लगाव है, वैसा ही जैसा पति-पत्नी या चरवाहे और भेड़ के बीच होता है। यानी वह मनुष्य जो दुष्टों की मण्डली से उठ आया है, वह खाली कमरे में नहीं बैठता; कोई उसे नाम से जानता है और उसके रास्ते पर साथ चलता है। परमेश्वर का स्वभाव यही है: वे पहले आशीष बोलते हैं, फिर मार्ग दिखाते हैं, और अंत में उस मार्ग पर चलनेवाले को अपनी पहचान से ढाँप लेते हैं। धन्यता अकेलेपन की कीमत नहीं, बेहतर संगति का नाम है।
चिंतन
पिछले महीने मेरी सोच सबसे ज़्यादा किसकी आवाज़ से गढ़ी गई: परमेश्वर के वचन से, या किसी ऐसी मण्डली से जहाँ मैं बस "बैठा" रहा?
यदि परमेश्वर मेरा मार्ग "जानते" हैं, तो मेरे जीवन का कौन-सा हिस्सा मैं उन्हें दिखाने से कतराता हूँ, और क्यों?
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