भजन संहिता 127:1
पाठ
भजन 127 की पहली पंक्ति दो चित्र सामने रखती है, और दोनों में एक ही शब्द बार-बार लौटता है: व्यर्थ। पहला चित्र घर बनाने वालों का है, राजमिस्त्री जो पत्थर पर पत्थर रखते हैं; दूसरा चित्र नगर की चारदीवारी पर खड़े पहरेदार का है, जो रात भर आँख खुली रखता है। कवि यह नहीं कहता कि बनाना गलत है या पहरा देना बेकार है। वह कहता है कि यदि परमेश्वर ही घर न बनाए, तो बनाने वालों का सारा परिश्रम खोखला है; और यदि परमेश्वर ही नगर की रक्षा न करें, तो रखवाले का जागना केवल नींद की हानि है। दोनों वाक्य एक ही ढाँचे में ढले हैं: पहले शर्त, फिर निष्कर्ष। और निष्कर्ष दोनों बार वही है, व्यर्थ।
मर्म
यह पद मेहनत के विरुद्ध नहीं, बल्कि मेहनत के भरोसे के विरुद्ध बोलता है। इब्रानी में जो शब्द यहाँ "व्यर्थ" के लिए आया है, वही शब्द सभोपदेशक की पूरी पुस्तक में गूँजता है, जहाँ कहा जाता है कि सूर्य के नीचे सब कुछ भाप की तरह हाथ से निकल जाता है। भजनकार वही बात एक ही पंक्ति में कह देता है, पर एक निर्णायक अंतर के साथ: सभोपदेशक सवाल पूछता है, भजन 127 उत्तर देता है, और उत्तर में एक नाम है, यहोवा। अर्थ श्रम की मात्रा से नहीं आता, बल्कि इससे कि परमेश्वर उस श्रम में शामिल हैं या नहीं। यही बात बाबेल के गुम्मट की कहानी में छिपी है, जहाँ लोग ईंट पर ईंट रखकर अपना नाम बड़ा करना चाहते थे और अंत में बिखर गए। परमेश्वर के बिना निर्माण केवल ऊँचा ढेर है, घर नहीं।
सूत्र
इब्रानी में "घर" शब्द दोहरा है: वह पत्थर की इमारत भी है और वंश भी, परिवार भी। और यही दोहरापन बाइबल की एक बड़ी कहानी खोलता है। दाऊद परमेश्वर के लिए एक भवन बनाना चाहता था, और नातान भविष्यद्वक्ता के द्वारा उत्तर आया कि नहीं, परमेश्वर दाऊद के लिए घर बनाएँगे, एक वंश जो बना रहेगा। यह भजन उसी उत्तर की प्रतिध्वनि है, बस संक्षेप में। सुलैमान ने मंदिर तो खड़ा किया, पर वह मंदिर एक दिन जल गया; जो घर टिका, वह वंश था जिससे मसीह आए। और यीशु ने ठीक इसी क्रिया को अपने ऊपर लिया जब उन्होंने कहा कि वे अपनी कलीसिया बनाएँगे। भजन 127 की शर्त मसीह में पूरी होती है: निर्माता परमेश्वर स्वयं हैं, और इसीलिए वह घर व्यर्थ नहीं।
दर्पण
यह पद उस जगह चुभता है जहाँ हम सबसे ज़्यादा गर्व करते हैं: हमारी मेहनत। आप सुबह सबसे पहले उठते हैं, ईमेल रात को आख़िरी बार देखते हैं, बच्चों की पढ़ाई के लिए जोड़ते हैं, घर की किश्त चुकाते हैं, कलीसिया का समूह अपने कंधे पर चलाते हैं। इसमें कुछ भी बुरा नहीं। पर एक बारीक रेखा है जहाँ परिश्रम प्रार्थना की जगह लेने लगता है, जहाँ आप जागते इसलिए हैं कि आपको लगता है सोते ही सब ढह जाएगा। भजनकार आपकी मेहनत नहीं छीनता, आपका बोझ छीनता है। अगले पद में वह और आगे जाता है: परमेश्वर अपने प्रियों को नींद देते हैं। आज एक काम कीजिए: एक पर्ची पर उस एक चीज़ का नाम लिखिए जिसकी रखवाली आप रात में जागकर कर रहे हैं, और उसके ऊपर एक वाक्य में प्रार्थना कीजिए कि परमेश्वर उसके पहरेदार बनें। फिर वह पर्ची तकिये के पास रखकर सो जाइए।
प्रश्न
यदि परमेश्वर ही बनाते हैं, तो राजमिस्त्री क्यों? यह पद आलस्य का बहाना बनना बहुत आसान है, और इतिहास में बना भी है। पर ध्यान दीजिए, कवि बनाने वालों और पहरेदारों को काम छोड़ने को नहीं कहता; वह केवल उनके श्रम का स्रोत बदलता है। असली काँटा कहीं और है: ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्होंने प्रार्थना के साथ बनाया और फिर भी घर गिरा, व्यापार डूबा, बच्चा बिगड़ा। क्या वे परमेश्वर की सूची से बाहर थे? यह भजन उसका उत्तर नहीं देता, और हमें भी जल्दबाज़ी में उत्तर नहीं गढ़ना चाहिए। वह केवल इतना कहता है कि जो टिकता है वह परमेश्वर का बनाया हुआ है। कब और किस रूप में टिकता है, यह रहस्य उन्हीं के हाथ में रहता है।
संदर्भ
यह भजन "यात्रा का गीत" है, उन पंद्रह गीतों में से एक जो तीर्थयात्री यरूशलेम की ओर चढ़ते हुए गाते थे। शीर्षक इसे सुलैमान से जोड़ता है, उस राजा से जिसने मंदिर और महल दोनों बनाए और फिर भी जिसका राज्य उसके मरते ही बँट गया। पर जिस समय यह गीत गाया जाता रहा, उसमें एक और दृश्य जुड़ गया: निर्वासन से लौटे लोग, टूटी दीवारों के बीच, दिन में गारा और रात में पहरा। वे जानते थे कि दीवार भी गिर सकती है और पहरेदार भी सो सकता है। इसी अनुभव की धरती पर यह पंक्ति खड़ी है, कोई आरामकुर्सी का दर्शन नहीं, बल्कि मलबे के बीच कही गई बात।
श्रोता
पहले सुनने वालों के लिए "घर" बीमा, पेंशन और अदालत, तीनों एक साथ था। बच्चे बुढ़ापे की सुरक्षा थे, और नगर का फाटक वह जगह थी जहाँ मुकदमे निपटते थे, जैसा इसी भजन के अंतिम पद में दिखता है। इसलिए जब कवि कहता है कि घर बनाना व्यर्थ हो सकता है, तो वह उनकी पूरी सुरक्षा-व्यवस्था पर हाथ रखता है। और जब वह आगे कहता है कि बच्चे यहोवा के दिए हुए भाग हैं, तो वह उपलब्धि को उपहार में बदल देता है। तीर्थयात्री ऊपर चढ़ते हुए यरूशलेम की दीवारें देखते थे और गाते थे कि इन दीवारों का असली पहरेदार पत्थर नहीं, परमेश्वर हैं। यह गर्व की नहीं, राहत की पंक्ति थी।
चिंतन
आप अपने जीवन में इस समय क्या "बना" रहे हैं, और ईमानदारी से कहें तो उसका भार किसके कंधे पर टिका है?
यदि परमेश्वर अपने प्रियों को नींद देते हैं, तो आपकी नींद की कमी आपके विश्वास के बारे में क्या कह रही है?
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Psalms 127:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 127:1 का क्या अर्थ है?
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Psalms 127 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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