भजन संहिता 143
पाठ
एक आदमी अदालत की भाषा में बोलना शुरू करता है और फिर तुरंत अदालत बंद करने की विनती करता है: "अपने दास से मुकद्दमा न चला! क्योंकि कोई प्राणी तेरी दृष्टि में निर्दोष नहीं ठहर सकता।" वह घिरा हुआ है, शत्रु ने उसे "मिट्टी में मिलाया" है, और वह अपने को उन मरे हुओं के बीच पड़ा पाता है जिन्हें बहुत दिन बीत चुके। उसकी आत्मा भीतर से व्याकुल है। इस अंधेरे में वह दो काम करता है: पुराने दिनों को याद करता है, और सूखी भूमि की तरह हाथ फैलाता है। फिर उसकी प्रार्थना माँगों की एक कतार बन जाती है, पर ध्यान दीजिए किस तरह की माँगें: प्रातःकाल करुणा की बात सुना, मार्ग बता, इच्छा पूरी करना सिखा, जिला, छुड़ा, और अंत में, शत्रुओं का नाश कर।
मूल बात
इस भजन का धर्मशास्त्रीय केंद्र दूसरे पद में छिपा है और वह हमारी उम्मीद से उलटा है। भजनकार परमेश्वर की धार्मिकता की दुहाई देता है ("तू जो सच्चा और धर्मी है, इसलिए मेरी सुन ले") और उसी साँस में कहता है कि उसी धार्मिकता के सामने वह टिक नहीं सकता। यानी वह परमेश्वर के न्याय से भागकर परमेश्वर की ओर ही भागता है। यहाँ धार्मिकता केवल दंड देने वाली सत्ता नहीं, वह परमेश्वर की अपनी वाचा के प्रति वफादारी है; इसी वजह से वह मुक्ति का आधार बन सकती है। और इसका सीधा नैतिक परिणाम है: जो आदमी जानता है कि वह स्वयं निर्दोष नहीं ठहरता, वह अपने शत्रुओं के विरुद्ध अपने हाथ से हिसाब नहीं चुका सकता। वह अनुरोध करता है, "मुझ को यह सिखा, कि मैं तेरी इच्छा कैसे पूरी करूँ", क्योंकि क्षमा पाया हुआ आदमी अब अपना मालिक नहीं रहा, वह दास है।
सामान्य सूत्र
पद 2 की वह पंक्ति, कि परमेश्वर की दृष्टि में कोई प्राणी निर्दोष नहीं ठहरता, इस्राएल की प्रार्थना में से निकलकर सीधे नए नियम के केंद्र में जा बैठती है। पौलुस गलातियों 2:16 में इसी को उठाता है और उस पर पूरा सुसमाचार खड़ा करता है: व्यवस्था के कामों से कोई मनुष्य धर्मी नहीं ठहरता। यानी भजनकार जिस अदालत को बंद करवाना चाहता है, मसीह उसमें खड़े होते हैं और वह फ़ैसला अपने ऊपर ले लेते हैं। और पद 10 की विनती, "तेरी भली आत्मा मुझ को धर्म के मार्ग में ले चले", रोमियों 8 में खुलकर सामने आती है: जो पवित्र आत्मा से चलाए जाते हैं, वही परमेश्वर की संतान हैं। पुराने नियम में यह एक तड़प है, नए नियम में यह एक दी हुई वास्तविकता। धागा एक ही है: बचाव भी परमेश्वर की ओर से, और चलने की ताक़त भी।
आईना
यह भजन उस जगह पर उँगली रखता है जहाँ हम सबसे कम छुआ जाना चाहते हैं: उस सहकर्मी पर जिसने मीटिंग में आपकी पीठ में छुरा घोंपा, उस रिश्तेदार पर जिसने ज़मीन या पैसे के मामले में आपको ठग लिया, उस व्यक्ति पर जिसका नाम सुनते ही आपके पेट में गाँठ बन जाती है। भजनकार यह नहीं कहता कि आप उदार बन जाइए। वह इससे कठिन बात कहता है: पहले खुद को उसी अदालत में खड़ा कीजिए जिसमें आप उसे खड़ा देखना चाहते हैं। और फिर, अपनी योजना बनाने से पहले, पूछिए, "जिस मार्ग पर मुझे चलना है, वह मुझ को बता दे।" ध्यान दीजिए, वह मार्गदर्शन तब माँगता है जब वह क्रोध और थकान से भरा है; यही वह क्षण है जब हम आमतौर पर सलाह नहीं, समर्थन ढूँढ़ते हैं।
आज ही एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिससे आपका मन उलझा है, और उसके नीचे अपने हाथ से पद 10 की पंक्ति लिखकर उसे ज़ोर से बोलिए: "मुझ को यह सिखा, कि मैं तेरी इच्छा कैसे पूरी करूँ।"
प्रसंग
यह दाऊद का भजन है, और इसकी भाषा किसी मंदिर की शांत कोठरी की नहीं, भागते हुए आदमी की है। "मुकद्दमा न चला" कोई काव्यात्मक अलंकार नहीं; प्राचीन इस्राएल में मुक़दमे नगर के फाटक पर, और अकसर सुबह-सुबह, निपटाए जाते थे। इसीलिए पद 8 की "प्रातःकाल" वाली विनती इतनी सटीक है: वह उस घड़ी करुणा का फ़ैसला माँग रहा है जिस घड़ी न्यायाधीश बैठते थे। "दास" भी नम्रता का शब्द भर नहीं; यह वाचा के भीतर का दर्जा है, राजा के अधीन खड़े उस व्यक्ति का, जिसकी रक्षा करना उसके स्वामी की इज़्ज़त का सवाल है। इसीलिए वह "अपने नाम के निमित्त" कहकर पुकारता है। और शत्रु का उसे "मिट्टी में मिलाना" उस समाज की सच्चाई है जहाँ ताक़तवर के सामने कमज़ोर के पास कोई अपील नहीं थी।
कठिन प्रश्न
पद 12 को हल्का करके पढ़ना बेईमानी होगी। वह कहता है, "करुणा करके मेरे शत्रुओं का सत्यानाश कर।" करुणा और सत्यानाश एक ही साँस में? यह हमें खटकता है, और खटकना चाहिए, क्योंकि यीशु ने शत्रुओं से प्रेम करने को कहा। पर देखिए इस प्रार्थना ने क्या किया: उसने तलवार भजनकार के हाथ से लेकर परमेश्वर के हाथ में रख दी। वह बदला ले नहीं रहा, वह बदला सौंप रहा है। यह गुस्से को पवित्र नहीं ठहराता, यह गुस्से को सही पते पर भेजता है। फिर भी असुविधा पूरी तरह मिटती नहीं, और शायद मिटनी भी नहीं चाहिए। हम इतना जानते हैं कि जिस न्यायी के सामने वह अपने शत्रु को सौंपता है, उसी के सामने वह पद 2 में खुद भी नहीं ठहर पाता।
पहले सुननेवाले
जिन लोगों ने यह भजन पहले गाया, वे ऐसे लोग थे जिनके पास वकील नहीं था। किसान, विधवाएँ, बंधुआई में गए हुए परिवार, जिनके ऊपर कोई ज़मींदार, कोई विदेशी अफ़सर, कोई बड़ा भाई बैठा था। "मैं तेरी ही आड़ में आ छिपा हूँ" उनके लिए रूपक कम, हक़ीक़त ज़्यादा थी: मंदिर वह जगह थी जहाँ भागा हुआ आदमी शरण ले सकता था। और "सूखी भूमि के समान मैं तेरा प्यासा हूँ" उन कानों में पड़ता था जिन्होंने सचमुच सूखा देखा था, जिनके लिए बारिश न आना मौत का दूसरा नाम था। वे इस भजन में अपनी ही आवाज़ पहचानते थे, इस फ़र्क के साथ कि यह आवाज़ हार नहीं मानती, वह माँगती रहती है, और अंत तक खुद को "तेरा दास" कहती है।
मनन के प्रश्न
आप जिस व्यक्ति के बारे में सबसे ज़्यादा शिकायत करते हैं, क्या आपने कभी उसके लिए पद 12 वाली ईमानदारी से प्रार्थना की है, या आपने बस दूसरों से उसकी शिकायत की है?
"जिस मार्ग पर मुझे चलना है, वह मुझ को बता दे" कहने से पहले आमतौर पर आप अपना निर्णय कितना पक्का कर चुके होते हैं?
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Psalms 143 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 143 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 143 किस विषय में है?
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भजन संहिता 143 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Psalms 143 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
मैं अपने हाथ तेरी ओर फैलाए हुए हूँ; सूखी भूमि के समान मेरा मन तेरा प्यासा है।" ध्यान दे, दाऊद के फैले हाथ खाली हैं। शत्रु पीछे है, मन थका है, और उसके पास देने को कुछ नहीं, सिर्फ प्यास है। सूखी ज़मीन अपने लिए बारिश नहीं बना सकती, वह बस खुली पड़ी रहती है। तेरी खाली हथेलियाँ शर्म की बात नहीं, वही तेरी प्रार्थना हैं।
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