बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 25

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

एक आदमी अपनी हथेलियाँ नहीं, अपना "मन" उठाता है: "हे यहोवा, मैं अपने मन को तेरी ओर उठाता हूँ।" उसके बाद जो निकलता है वह तीन धाराओं में बहता है, और तीनों बार-बार लौटकर आती हैं। पहली धारा है लज्जा का डर, क्योंकि शत्रु घेरे में हैं और उनकी संख्या "बढ़ गई है"। दूसरी है मार्ग की भूख, यह प्रार्थना कि परमेश्वर अपना पथ दिखाएँ और सिखाएँ। तीसरी है क्षमा की गुहार, विशेष रूप से "मेरी जवानी के पापों" की। अंत में भजनकार अपने अकेलेपन से बाहर निकलकर पूरे समुदाय के लिए बोलता है: "हे परमेश्वर इस्राएल को उसके सारे संकटों से छुड़ा ले।"

मर्म

प्राचीन पूर्व की दुनिया में इज़्ज़त और बेइज़्ज़ती जीवन-मरण का प्रश्न थी। गाँव की चौपाल पर, कुएँ के पास, फाटक के न्यायालय में आदमी की कीमत इस बात से तय होती थी कि लोग उसके बारे में क्या कहते हैं। जिसकी प्रार्थना अनसुनी रह जाती, उसका परमेश्वर भी छोटा साबित होता, और शत्रु का जयजयकार दोहरी चोट थी। इसलिए "मुझे लज्जित होने न दे" कोई भावुक विनती नहीं, बल्कि यह दावा है कि परमेश्वर अपनी वाचा के प्रति ईमानदार हैं। और यहीं भजन का दिल खुलता है: परमेश्वर पापियों से मुँह नहीं फेरते, वे "पापियों को अपना मार्ग दिखलाएँगे"। क्षमा योग्यता के आधार पर नहीं, "अपने नाम के निमित्त" मिलती है। परमेश्वर की प्रतिष्ठा ही डूबते आदमी की एकमात्र ज़मीन है।

सूत्र

यह भजन अक्षरमाला के क्रम में लिखा गया है, हिब्रू वर्णमाला के एक-एक अक्षर से शुरू होते पद, जैसे कोई बच्चा ककहरा सीखता है। यह संयोग नहीं। जो आदमी "अपना मार्ग मुझ को दिखा" कहकर गिड़गिड़ा रहा है, वह प्रार्थना को वर्णमाला की तरह सीख रहा है, शुरू से आख़िर तक। और जिस शिक्षक की उसे तलाश है, वह पद 10 में एक जोड़े के रूप में सामने आता है: यहोवा के सब मार्ग "करुणा और सच्चाई" हैं। यही दो शब्द वाचा की पुरानी भाषा से आते हैं, और यही दोनों बाद में देह धारण करके गलील की धूल में चलते हैं। यूहन्ना कहता है कि अनुग्रह और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुँची। भजनकार जिस पथ की भीख माँग रहा है, वह पथ अंततः एक व्यक्ति निकला।

दर्पण

"मेरी जवानी के पापों" पर रुकिए। हर वयस्क के पास एक ऐसी फ़ाइल है जिसे वह खोलना नहीं चाहता: वे साल जब हमने किसी को इस्तेमाल किया, पैसे को लेकर बेईमानी की, माता-पिता से झूठ बोला, या ऐसा कुछ किया जिसका नाम आज तक हमने ज़ोर से नहीं लिया। हम उसे दबाकर जीते हैं, और फिर हैरान होते हैं कि प्रार्थना में एक अजीब-सी झिझक क्यों रहती है। भजनकार दूसरी राह लेता है। वह फ़ाइल खोलकर परमेश्वर के सामने रख देता है और कहता है, इसे याद न कीजिए, बल्कि मुझे अपनी करुणा के अनुसार याद कीजिए। यह भूलने की माँग नहीं, नए सिरे से पहचाने जाने की माँग है। आज ही: जवानी के उस एक काम को कागज़ पर लिखिए, उसे परमेश्वर के सामने ऊँची आवाज़ में पढ़िए, फिर पद 7 पढ़कर कागज़ फाड़ दीजिए।

बारीकी

पद 14 में एक असाधारण शब्द है जिसे हिंदी "भेद" कहकर अनुवाद करती है। मूल हिब्रू शब्द सोद है, और यह किसी जादुई रहस्य का नहीं, बल्कि उस भीतरी बैठक का नाम है जहाँ राजा अपने चुने हुए सलाहकारों के साथ बंद दरवाज़े में बैठकर असली फ़ैसले लेता है। बाहर आँगन में भीड़ खड़ी रहती है, अंदर कुछ लोग योजना सुनते हैं। भजनकार कहता है कि परमेश्वर की उस भीतरी बैठक का पर्दा उन लोगों के लिए उठता है जो उनका भय मानते हैं। ध्यान दीजिए कि प्रवेश-पत्र बुद्धि या पद नहीं, नम्रता और भय है। जो अकेला और पीड़ित आदमी पद 16 में रो रहा है, वही राजा की मेज़ पर बुलाया गया है।

कठिन प्रश्न

पद 3 एक बड़ा दावा करता है: जो परमेश्वर की बाट जोहते हैं, उनमें से कोई लज्जित नहीं होगा। पर हम सब ऐसे लोगों को जानते हैं जिन्होंने वर्षों प्रतीक्षा की और फिर भी हार गए, बदनाम हुए, कैंसर से मरे, बच्चों को खोया। क्या भजनकार झूठ बोल रहा है? नहीं, पर वह भजन के अंत में अपने बचाव का ऐलान भी नहीं करता। पद 22 तक शत्रु वहीं खड़े हैं, दुःख घटा नहीं। वह सिर्फ़ इतना कहता है कि उसकी आँखें टिकी हुई हैं। शायद यही ईमानदार जवाब है: लज्जा से बचाव का वादा अभी पूरी तरह नकद नहीं मिलता, वह एक हस्ताक्षरित चेक है जिसकी तारीख परमेश्वर के हाथ में है। इस बीच प्रतीक्षा ही विश्वास का रूप है।

अंतर्पाठ

भजन 141 में वही मुद्रा लौटती है, आँखें प्रभु पर टिकी हैं, और वहाँ भी संदर्भ फंदे और जाल का है; इससे पता चलता है कि यह "टकटकी" इस्राएल की प्रार्थना-भाषा का एक स्थायी मुहावरा था, संकट में शरीर की एक सीखी हुई आदत। दूसरी ओर पौलुस इफिसियों की चिट्ठी में लिखता है कि परमेश्वर ने अपनी इच्छा का भेद हम पर प्रगट किया और हमारे मन की आँखें खोलीं। जो पद 14 में कुछ भय माननेवालों के लिए खुली भीतरी बैठक थी, वह मसीह में उन सब के लिए खोल दी गई जो उन पर भरोसा करते हैं। दरवाज़ा वही है, पर अब उस पर मसीह का नाम लिखा है।

चिंतन

आपकी "जवानी के पापों" की फ़ाइल में क्या है जिसे आपने अब तक परमेश्वर के सामने नाम लेकर नहीं रखा, और उसे रोके रखने में आपको किस चीज़ का डर है?

भजनकार अपनी निजी पीड़ा से निकलकर अंत में पूरे इस्राएल के लिए प्रार्थना करता है; आपकी प्रार्थना किस बिंदु पर "मेरे" से "हमारे" में बदलती है, और क्या वह मोड़ अभी बाक़ी है?

पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें

आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।

स्वीकारोक्ति

स्वीकारोक्ति

संत अगस्तीन

अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।

उद्देश्य भरा जीवन

उद्देश्य भरा जीवन

रिक वॉरेन

चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।

परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास

परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास

भाई लॉरेन्स

रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।

जंगल का छिपने का स्थान

जंगल का छिपने का स्थान

कोरी टेन बूम

नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।

जीसस कॉलिंग

जीसस कॉलिंग

सारा यंग

प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।

एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।

यह व्याख्या साझा करें

सुसमाचार फैलाने में मदद करें। यह व्याख्या किसी ऐसे व्यक्ति को भेजें जिसे इससे प्रोत्साहन मिल सके।

WhatsApp Email Facebook X / Twitter

Psalms 25 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 25 का क्या अर्थ है?
एक आदमी अपनी हथेलियाँ नहीं, अपना "मन" उठाता है: "हे यहोवा, मैं अपने मन को तेरी ओर उठाता हूँ।" उसके बाद जो निकलता है वह तीन धाराओं में बहता है, और तीनों बार-बार लौटकर आती हैं। पहली धारा है लज्जा का डर, क्योंकि शत्रु घेरे में हैं और उनकी संख्या "बढ़ गई है"। दूसरी है मार्ग की भूख, यह प्रार्थना कि परमेश्वर अपना पथ दिखाएँ और सिखाएँ। तीसरी है क्षमा की गुहार, विशेष रूप से "मेरी जवानी के पापों" की। अंत में भजनकार अपने अकेलेपन से बाहर निकलकर पूरे समुदाय के लिए बोलता है: "हे परमेश्वर इस्राएल को उसके सारे संकटों से छुड़ा ले।"
भजन संहिता 25 किस विषय में है?
यह भजन अक्षरमाला के क्रम में लिखा गया है, हिब्रू वर्णमाला के एक-एक अक्षर से शुरू होते पद, जैसे कोई बच्चा ककहरा सीखता है। यह संयोग नहीं। जो आदमी "अपना मार्ग मुझ को दिखा" कहकर गिड़गिड़ा रहा है, वह प्रार्थना को वर्णमाला की तरह सीख रहा है, शुरू से आख़िर तक। और जिस शिक्षक की उसे तलाश है, वह पद 10 में एक जोड़े के रूप में सामने आता है: यहोवा के सब मार्ग "करुणा और सच्चाई" हैं। यही दो शब्द वाचा की पुरानी भाषा से आते हैं, और यही दोनों बाद में देह धारण करके गलील की धूल में चलते हैं। यूहन्ना कहता है कि अनुग्रह और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुँची। भजनकार जिस पथ की भीख माँग रहा है, वह पथ अंततः एक व्यक्ति निकला।
भजन संहिता 25 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 14 में एक असाधारण शब्द है जिसे हिंदी "भेद" कहकर अनुवाद करती है। मूल हिब्रू शब्द सोद है, और यह किसी जादुई रहस्य का नहीं, बल्कि उस भीतरी बैठक का नाम है जहाँ राजा अपने चुने हुए सलाहकारों के साथ बंद दरवाज़े में बैठकर असली फ़ैसले लेता है। बाहर आँगन में भीड़ खड़ी रहती है, अंदर कुछ लोग योजना सुनते हैं। भजनकार कहता है कि परमेश्वर की उस भीतरी बैठक का पर्दा उन लोगों के लिए उठता है जो उनका भय मानते हैं। ध्यान दीजिए कि प्रवेश-पत्र बुद्धि या पद नहीं, नम्रता और भय है। जो अकेला और पीड़ित आदमी पद 16 में रो रहा है, वही राजा की मेज़ पर बुलाया गया है।
भजन संहिता 25 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन 141 में वही मुद्रा लौटती है, आँखें प्रभु पर टिकी हैं, और वहाँ भी संदर्भ फंदे और जाल का है; इससे पता चलता है कि यह "टकटकी" इस्राएल की प्रार्थना-भाषा का एक स्थायी मुहावरा था, संकट में शरीर की एक सीखी हुई आदत। दूसरी ओर पौलुस इफिसियों की चिट्ठी में लिखता है कि परमेश्वर ने अपनी इच्छा का भेद हम पर प्रगट किया और हमारे मन की आँखें खोलीं। जो पद 14 में कुछ भय माननेवालों के लिए खुली भीतरी बैठक थी, वह मसीह में उन सब के लिए खोल दी गई जो उन पर भरोसा करते हैं। दरवाज़ा वही है, पर अब उस पर मसीह का नाम लिखा है।
भजन संहिता 25 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
भजनकार अपनी निजी पीड़ा से निकलकर अंत में पूरे इस्राएल के लिए प्रार्थना करता है; आपकी प्रार्थना किस बिंदु पर "मेरे" से "हमारे" में बदलती है, और क्या वह मोड़ अभी बाक़ी है?

Psalms 25 में आपको क्या स्पर्श करता है?

इस अंश पर अभी तक कोई अंतर्दृष्टि साझा नहीं की गई है। पहले बनें और कुछ छोड़ें: एक अंतर्दृष्टि, प्रार्थना या धन्यवाद।

इस अंश को किसी और स्तर पर देखें

शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।

अध्ययन टूल में खोलें

अस्वीकरण: Faith.network बाइबल की व्याख्याएँ तैयार करने के लिए स्वचालित भाषा मॉडल का उपयोग करता है। हम धर्मशास्त्रीय दृष्टि से सही रहने का पूरा प्रयास करते हैं, फिर भी यह सॉफ़्टवेयर त्रुटि कर सकता है। इस साधन को अपने निजी बाइबल अध्ययन और कलीसिया के संगति जीवन का स्थान लेने वाला न समझें, बल्कि उनके सहायक के रूप में प्रयोग करें।

© 2026 Faith.Network. सर्वाधिकार सुरक्षित।

Faith.network एक सेवकाई है Faith.network · KvK 84972599 · connect@faith.network

हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव
कंपनी?