भजन संहिता 50:15
पाठ
बैलों और बकरों की लम्बी सूची के बाद, जिनकी परमेश्वर को कोई भूख नहीं, अचानक एक आज्ञा आती है जो किसी वेदी पर नहीं, बल्कि मनुष्य के सबसे टूटे हुए क्षण में पूरी होती है: "और संकट के दिन मुझे पुकार; मैं तुझे छुड़ाऊँगा, और तू मेरी महिमा करने पाएगा।" पद 14 में धन्यवाद के बलिदान और मन्नत पूरी करने की बात हुई थी; पद 15 उसी वाक्य को आगे बढ़ाता है। यानी परमेश्वर जो माँगते हैं वह यह है: मुसीबत में उन्हें पुकारो, उनसे छुटकारा पाओ, और फिर उस छुटकारे की कहानी सुनाकर उनकी महिमा करो। तीन क्रियाएँ, एक ही रस्सी में गुँथी हुई।
मर्म
ध्यान दीजिए कि यहाँ भूमिकाएँ कितनी असमान हैं, और यही इस पद का धर्मशास्त्रीय हृदय है। मनुष्य के हिस्से में केवल पुकारना आता है, खाली हाथ, बिना किसी सौदे के। छुड़ाना पूरी तरह परमेश्वर का काम है। और महिमा भी मनुष्य की उपलब्धि नहीं, बल्कि छुटकारे का स्वाभाविक फल है, इसलिए पाठ कहता है "महिमा करने पाएगा", मानो यह एक अनुमति हो, एक उपहार। यह पूरे भजन का तर्क उलट देता है: जो लोग सोचते थे कि वे पशु चढ़ाकर परमेश्वर को कुछ दे रहे हैं, उन्हें बताया जाता है कि सच्ची आराधना तब शुरू होती है जब आप स्वीकार करते हैं कि आपके पास देने को कुछ नहीं, केवल ज़रूरत है। अनुग्रह यहाँ नया नियम का आविष्कार नहीं; वह पहले से ही वेदी के बीचोंबीच खड़ा है।
सूत्र
यह पद एक वादा है जिसका पूरा वज़न तब तक नहीं खुलता जब तक कोई इसे पूरी तरह जी न ले। गतसमनी में एक मनुष्य घुटनों पर गिरकर उसी को पुकारता है जो मृत्यु से छुड़ा सकता है, और इब्रानियों का लेखक कहता है कि उसकी सुनी गई। पर छुटकारा वैसा नहीं आया जैसा कोई उम्मीद करता: वह संकट के भीतर से होकर आया, कब्र के पार। यीशु मसीह ने इस पद के तीनों क्रियाओं को अपने शरीर में उतारा, पुकारा, छुड़ाए गए, और पिता की महिमा की। और उन्होंने ऐसा हमारी जगह किया। इसलिए भजन 50 का यह वचन अब किसी इस्राएली उपासक का निजी अनुबंध नहीं रह जाता; यह उस व्यक्ति का मार्ग बन जाता है जिसने पशुओं की जगह अपने आप को चढ़ा दिया, और जिसके बाद से हर पुकार उसी खुले हुए द्वार से होकर जाती है।
दर्पण
हममें से अधिकांश संकट में पुकारते नहीं, हम पहले उसे सुलझाने की कोशिश करते हैं। रिपोर्ट आने से पहले इंटरनेट पर लक्षण खोजते हैं, नौकरी जाने की आहट पर संपर्क खंगालते हैं, बेटे के भटकने पर तर्क और डाँट आज़माते हैं, और प्रार्थना वह जगह है जहाँ हम तब पहुँचते हैं जब बाकी सब चुक गया। यह पद उस क्रम को उलट देता है। और उससे भी कठिन है तीसरा हिस्सा। हम छुटकारा पाकर चुप हो जाते हैं, क्योंकि कहानी सुनाने का मतलब है यह मानना कि हम बेबस थे। यह हमारी उस छवि को तोड़ता है जिसे हम दफ़्तर में, परिवार में, मंडली में बड़े जतन से सँभालते हैं। आज शाम ढलने से पहले किसी एक व्यक्ति को, आमने-सामने या फोन पर, एक वाक्य में बताइए कि परमेश्वर ने आपको किस संकट से छुड़ाया।
कठिन प्रश्न
पर जब छुटकारा नहीं आता तो? वह पत्नी जिसने रातों पुकारा और फिर भी कब्र तक गई, वह पिता जिसकी नौकरी कभी लौटी नहीं। क्या यह वादा झूठा है? इस पद को मशीन की तरह पढ़ना इसे तोड़ देता है, क्योंकि जो मनुष्य इसे सबसे शुद्ध रूप में जी गया, उसे क्रूस से नीचे नहीं उतारा गया। यहाँ ईमानदारी यही है कि परमेश्वर ने छुड़ाने का समय, तरीका और आकार अपने हाथ में रखा है, और उन्होंने हमें उसका नक्शा नहीं दिया। जो उन्होंने दिया वह यह है: पुकार अनसुनी नहीं जाती, और अंतिम शब्द मृत्यु का नहीं है। यह उत्तर दर्द को कम नहीं करता। यह केवल बताता है कि अँधेरा खाली नहीं है।
अंतर्पाठ
भजन 50 का यह अनुग्रह अकेला नहीं खड़ा। इसी भजन के अंत में, पद 23 में, वही धागा लौटता है: धन्यवाद का बलिदान चढ़ानेवाला परमेश्वर की महिमा करता है और उसे परमेश्वर का उद्धार दिखाया जाता है। पशु नहीं, धन्यवाद; और धन्यवाद का प्रतिफल फिर उद्धार ही है, एक घेरा जो अनुग्रह से शुरू होकर अनुग्रह पर बंद होता है। इब्रानियों 13 इसी छवि को मसीह के बाद के समय में रखता है: अब हमारा बलिदान स्तुति का है, उनके नाम को स्वीकार करनेवाले होंठों का फल। ध्यान दीजिए कि कुछ रद्द नहीं हुआ, केवल पूरा हुआ। वेदी बुझी नहीं, वह मुँह तक पहुँच गई।
एक छोटा विवरण
"संकट" के पीछे खड़ा इब्रानी शब्द है त्सारा, जिसकी जड़ का अर्थ है तंगी, सिकुड़न, वह जगह जहाँ दीवारें पास आ जाती हैं और साँस छोटी हो जाती है। और जिस शब्द का अनुवाद "छुड़ाऊँगा" हुआ है, उसमें बाहर खींच लाने का भाव है, तंग से खुले में। यानी परमेश्वर यह नहीं कहते कि वे आपकी समस्या का प्रबंधन कर देंगे; वे कहते हैं कि वे आपको जगह देंगे। यही वह छवि है जो बाइबल में बार-बार लौटती है, मिस्र की तंग गुलामी से चौड़े देश तक, और कब्र की सबसे संकरी जगह से पुनरुत्थान की सुबह तक। मसीह उस तंगी में उतरे ताकि हमारे लिए खुली जगह बन सके।
चिंतन प्रश्न
संकट में आपका पहला कदम क्या होता है, और वह आदत आपके बारे में क्या बताती है?
पिछले छह महीनों में परमेश्वर ने आपको जिस तंगी से बाहर निकाला, उसकी कहानी अब तक किसने नहीं सुनी, और क्यों नहीं?
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Psalms 50:15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 50:15 का क्या अर्थ है?
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Psalms 50 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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