बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 82

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

एक अदालत का दृश्य, पर कटघरे में इंसान नहीं, न्यायाधीश खड़े हैं। "परमेश्वर दिव्य सभा में खड़ा है: वह ईश्वरों के बीच में न्याय करता है।" जिन्हें अधिकार सौंपा गया था, उन्हीं से हिसाब माँगा जा रहा है: कब तक तुम टेढ़ा न्याय करोगे और दुष्टों का पक्ष लोगे? फिर आदेश आता है, चार क्रियाओं में, तेज़ और बिना शर्त: कंगाल और अनाथों का न्याय चुकाओ, दीन-दरिद्र का विचार धर्म से करो, निर्धन को बचा लो, दुष्टों के हाथ से उन्हें छुड़ाओ। जवाब में सन्नाटा है, क्योंकि ये न्यायी "अंधेरे में चलते फिरते" हैं और पृथ्वी की नींव हिल रही है। अंत में भजनकार स्वयं परमेश्वर को पुकारता है: आप उठिए, आप ही पृथ्वी का न्याय कीजिए।

मर्म

यह भजन कहता है कि अन्याय कोई सामाजिक समस्या भर नहीं, वह ब्रह्मांड की नींव में पड़ी दरार है। "पृथ्वी की पूरी नींव हिल जाती है" का अर्थ यही है: जब अदालतें, मालिक, पिता, पादरी और प्रधान पक्षपात करते हैं, तो केवल कुछ लोग दुखी नहीं होते, सृष्टि की बुनियाद चरमराती है। परमेश्वर ने अधिकार बाँटा है, और बाँटा हुआ अधिकार उधार है, मालिकाना नहीं। इसीलिए सबसे ऊँची उपाधि, "तुम ईश्वर हो," उसी साँस में सबसे कठोर चेतावनी बन जाती है, "तो भी तुम मनुष्यों के समान मरोगे।" ध्यान दीजिए, परमेश्वर की धार्मिकता यहाँ निष्पक्षता नहीं, पक्षधरता है: वे कमज़ोर की ओर झुकते हैं, क्योंकि जिसके पास ताक़त नहीं, उसके पास वकील भी नहीं। और अंत में एकमात्र सच्चा न्यायी स्वयं मैदान में उतरने को पुकारा जाता है।

सूत्र

इस भजन का अंतिम वाक्य एक याचिका है: "हे परमेश्वर उठ, पृथ्वी का न्याय कर।" पुराने नियम का बड़ा हिस्सा इसी पुकार पर टिका है, और उसका उत्तर अपेक्षा से बिलकुल उल्टा आता है। यीशु ने इसी भजन की पंक्ति उद्धृत की जब लोगों ने उन पर पत्थर उठाए (यूहन्ना 10:34); वे उस अदालत में खड़े थे जहाँ धर्म के ठेकेदार टेढ़ा न्याय कर रहे थे। परमेश्वर उठे, पर न्यायाधीश के आसन पर नहीं, कटघरे में। जो सचमुच "परमप्रधान के पुत्र" थे, वे सचमुच "मनुष्यों के समान" मरे, उन्हीं कंगालों की जगह लेकर जिन्हें यह भजन छुड़ाने को कहता है। जो पक्षधरता भजन 82 माँगता है, क्रूस उसे अंतिम रूप देता है: परमेश्वर कमज़ोर की ओर इतना झुके कि स्वयं कमज़ोर हो गए।

दर्पण

यह भजन भ्रष्ट जजों पर नहीं, आप पर उँगली रखता है, क्योंकि अधिकार केवल अदालत में नहीं बँटा होता। जब दफ़्तर में दो लोगों के बीच फ़ैसला करना हो और एक का चाचा प्रबंधन में हो, तब न्याय चुकाना महँगा पड़ता है। जब घर में वह बच्चा सुना जाता है जो ऊँचा बोलता है, और वह चुप रह जाता है जो रोता नहीं, तब टेढ़ा न्याय रसोई तक पहुँच चुका है। जब किरायेदार, नौकरानी, मज़दूर या नया साथी किसी शिकायत के साथ आए और आप सोचें, "झंझट कौन मोल ले," तब आपने दुष्टों का पक्ष लिया है, चुप रहकर। आज, दस मिनट में: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसकी बात आपने पिछले महीने इसलिए दबा दी क्योंकि वह कमज़ोर पक्ष था, और आज ही उसे फ़ोन करके कहिए कि आप उसका मामला दोबारा सुनना चाहते हैं।

बारीकी

पद 5 पर रुकिए: "वे न तो कुछ समझते और न कुछ जानते हैं, परन्तु अंधेरे में चलते फिरते रहते हैं।" यह नैतिक आरोप नहीं, निदान है। भ्रष्ट न्यायी को भजनकार दुष्ट से पहले अंधा कहता है। पक्षपात करते-करते आदमी देखने की क्षमता खो देता है; वह सचमुच मान लेता है कि ताक़तवर ही सही बोल रहा है, कि गरीब का दुख बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है, कि व्यवस्था मोटे तौर पर ठीक ही चल रही है। यही अन्याय की सबसे डरावनी बात है: वह विवेक को मिटाता नहीं, बदल देता है। इसलिए आत्म-परीक्षा यहाँ काफ़ी नहीं। जो अंधेरे में चल रहा है, उसे बाहर से रोशनी चाहिए, किसी ऐसे व्यक्ति की आवाज़ जिसके पास आपके ऊपर कोई ताक़त नहीं।

मुख्य पात्र

ध्यान दीजिए, परमेश्वर यहाँ बैठते नहीं, "खड़ा है।" प्राचीन अदालत में न्यायाधीश बैठता था और अभियोक्ता खड़ा होता था। परमेश्वर उस सभा में खड़े हैं जहाँ वे ही सबसे ऊपर हैं, मानो अपने ही नियुक्त अधिकारियों पर मुक़दमा चलाने के लिए उठ खड़े हुए हों। यह क्रोध ठंडा नहीं है। इसके पीछे लगाव है: अनाथ और दीन-दरिद्र उनके अपने हैं, और जो उन्हें लूटता है वह परमेश्वर की जेब काटता है। साथ ही यहाँ एक अजीब उदारता है, कि वे अपना अधिकार बाँटते हैं और सौंपे हुए लोगों को "ईश्वर" तक कह देते हैं। परमेश्वर जोखिम उठाकर भरोसा करते हैं, और फिर हिसाब माँगते हैं। दोनों एक ही चरित्र के दो पहलू हैं।

पृष्ठभूमि

आसाप के इस भजन की पृष्ठभूमि वह संसार है जहाँ हर राष्ट्र के अपने देवता माने जाते थे और राजा उन देवताओं का प्रतिनिधि। भजन उस पूरी कल्पना को उलट देता है: जिन्हें भी ऊपर बैठाया गया है, स्वर्गिक शक्तियाँ हों या मानव शासक, वे सब एक ही सभा में जवाबदेह हैं और सबको मरना है। इस्राएल में न्याय नगर के फाटक पर होता था, खुले में, बुज़ुर्गों के सामने। वहाँ विधवा और अनाथ की स्थिति सबसे कमज़ोर थी, क्योंकि उनके पास न ज़मीन थी, न कोई पुरुष वकील, न रिश्वत। "दुष्टों का पक्ष" लेना वहाँ कोई गुप्त पाप नहीं था, वह सार्वजनिक, स्वीकृत रिवाज़ था। भजन इसी सामान्य बन चुके अन्याय को स्वर्ग की अदालत में घसीट लाता है।

चिंतन

पिछले महीने आपने जो फ़ैसले लिए, उनमें से किस एक में आपने अनजाने में "दुष्टों का पक्ष" लिया, केवल इसलिए कि दूसरा पक्ष चुप था?

आपके जीवन में वह कौन है जिसके पास आपके ऊपर कोई ताक़त नहीं, और जिसे आप सच बोलने की खुली अनुमति दे सकते हैं?

Psalms में और गहराई से जानें

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Psalms 73-150

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Psalms 82 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 82 का क्या अर्थ है?
एक अदालत का दृश्य, पर कटघरे में इंसान नहीं, न्यायाधीश खड़े हैं। "परमेश्वर दिव्य सभा में खड़ा है: वह ईश्वरों के बीच में न्याय करता है।" जिन्हें अधिकार सौंपा गया था, उन्हीं से हिसाब माँगा जा रहा है: कब तक तुम टेढ़ा न्याय करोगे और दुष्टों का पक्ष लोगे? फिर आदेश आता है, चार क्रियाओं में, तेज़ और बिना शर्त: कंगाल और अनाथों का न्याय चुकाओ, दीन-दरिद्र का विचार धर्म से करो, निर्धन को बचा लो, दुष्टों के हाथ से उन्हें छुड़ाओ। जवाब में सन्नाटा है, क्योंकि ये न्यायी "अंधेरे में चलते फिरते" हैं और पृथ्वी की नींव हिल रही है। अंत में भजनकार स्वयं परमेश्वर को पुकारता है: आप उठिए, आप ही पृथ्वी का न्याय कीजिए।
भजन संहिता 82 किस विषय में है?
इस भजन का अंतिम वाक्य एक याचिका है: "हे परमेश्वर उठ, पृथ्वी का न्याय कर।" पुराने नियम का बड़ा हिस्सा इसी पुकार पर टिका है, और उसका उत्तर अपेक्षा से बिलकुल उल्टा आता है। यीशु ने इसी भजन की पंक्ति उद्धृत की जब लोगों ने उन पर पत्थर उठाए (यूहन्ना 10:34); वे उस अदालत में खड़े थे जहाँ धर्म के ठेकेदार टेढ़ा न्याय कर रहे थे। परमेश्वर उठे, पर न्यायाधीश के आसन पर नहीं, कटघरे में। जो सचमुच "परमप्रधान के पुत्र" थे, वे सचमुच "मनुष्यों के समान" मरे, उन्हीं कंगालों की जगह लेकर जिन्हें यह भजन छुड़ाने को कहता है। जो पक्षधरता भजन 82 माँगता है, क्रूस उसे अंतिम रूप देता है: परमेश्वर कमज़ोर की ओर इतना झुके कि स्वयं कमज़ोर हो गए।
भजन संहिता 82 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 5 पर रुकिए: "वे न तो कुछ समझते और न कुछ जानते हैं, परन्तु अंधेरे में चलते फिरते रहते हैं।" यह नैतिक आरोप नहीं, निदान है। भ्रष्ट न्यायी को भजनकार दुष्ट से पहले अंधा कहता है। पक्षपात करते-करते आदमी देखने की क्षमता खो देता है; वह सचमुच मान लेता है कि ताक़तवर ही सही बोल रहा है, कि गरीब का दुख बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है, कि व्यवस्था मोटे तौर पर ठीक ही चल रही है। यही अन्याय की सबसे डरावनी बात है: वह विवेक को मिटाता नहीं, बदल देता है। इसलिए आत्म-परीक्षा यहाँ काफ़ी नहीं। जो अंधेरे में चल रहा है, उसे बाहर से रोशनी चाहिए, किसी ऐसे व्यक्ति की आवाज़ जिसके पास आपके ऊपर कोई ताक़त नहीं।
भजन संहिता 82 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
आसाप के इस भजन की पृष्ठभूमि वह संसार है जहाँ हर राष्ट्र के अपने देवता माने जाते थे और राजा उन देवताओं का प्रतिनिधि। भजन उस पूरी कल्पना को उलट देता है: जिन्हें भी ऊपर बैठाया गया है, स्वर्गिक शक्तियाँ हों या मानव शासक, वे सब एक ही सभा में जवाबदेह हैं और सबको मरना है। इस्राएल में न्याय नगर के फाटक पर होता था, खुले में, बुज़ुर्गों के सामने। वहाँ विधवा और अनाथ की स्थिति सबसे कमज़ोर थी, क्योंकि उनके पास न ज़मीन थी, न कोई पुरुष वकील, न रिश्वत। "दुष्टों का पक्ष" लेना वहाँ कोई गुप्त पाप नहीं था, वह सार्वजनिक, स्वीकृत रिवाज़ था। भजन इसी सामान्य बन चुके अन्याय को स्वर्ग की अदालत में घसीट लाता है।
भजन संहिता 82 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन में वह कौन है जिसके पास आपके ऊपर कोई ताक़त नहीं, और जिसे आप सच बोलने की खुली अनुमति दे सकते हैं?

Psalms 82 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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