भजन संहिता 91:10
पाठ
तंबू की चौखट पर विपत्ति ठिठक जाती है और भीतर नहीं आती, यही इस पद का चित्र है। भजनकार पहले पद 9 में कहता है कि तूने परमप्रधान को अपना धाम मान लिया है, और उसी से यह निष्कर्ष निकलता है: "इसलिए कोई विपत्ति तुझ पर न पड़ेगी, न कोई दुःख तेरे डेरे के निकट आएगा।" ध्यान दें, यह एक स्वतंत्र वादा नहीं है, बल्कि एक परिणाम है, जो "इसलिए" शब्द से पिछली बात के साथ जुड़ा हुआ है। जो परमेश्वर में बसता है, उसके निवास तक अनिष्ट पहुँचने का रास्ता नहीं पाता। भाषा घर की है, युद्ध के मैदान की नहीं: डेरा, आड़, पंख, शरण।
मूल
यहाँ "डेरा" शब्द अनजाने में नहीं आया। जो इस्राएली इस भजन को गाते थे, उनके कानों में मिस्र की वह रात गूँजती थी जब मारने वाला घर-घर से गुज़रा और लहू से चिह्नित दरवाज़ों को छोड़ गया। निर्गमन 12 की वही संरचना यहाँ दोहराई गई है: बाहर महामारी, भीतर सुरक्षा, और बचाव किसी दीवार की मोटाई से नहीं बल्कि परमेश्वर के चिह्न से। इसलिए पद 10 का मूल दावा भूगोल का नहीं, संबंध का है। सुरक्षा किसी सुरक्षित स्थान में नहीं, बल्कि एक सुरक्षित व्यक्ति में मिलती है, और वह व्यक्ति परमेश्वर हैं। यहीं इस भजन की गहरी चुनौती छिपी है, क्योंकि अय्यूब के डेरे तो उजड़ गए थे, और वह परमेश्वर से दूर रहने वाला मनुष्य न था। यह तनाव भजन मिटाता नहीं; वह इसे पद 15 में मोड़ देता है, जहाँ परमेश्वर कहते हैं कि "संकट में मैं उसके संग रहूँगा"। अर्थात् संकट आएगा, परन्तु अकेलेपन में नहीं।
सूत्र
इस भजन का सबसे चौंकाने वाला उपयोग शैतान के मुँह में मिलता है। जंगल में परीक्षा के समय वह ठीक इसी भजन के अगले पद उठाता है, "वे तुझको हाथों हाथ उठा लेंगे", और यीशु मसीह से कहता है कि इसे आज़मा कर देखिए। यीशु ने वादे को नकारा नहीं, परन्तु उसे प्रमाण की मशीन बनाने से इनकार किया। और यही मसीह पद 10 को पूरा करने का तरीका बदल देता है। जिसने परमेश्वर में सचमुच वास किया, उसके पास सिर रखने का डेरा भी न रहा, और अंत में विपत्ति उसके निकट आई ही नहीं, उसे भेद कर गई। मसीह ने वह असुरक्षा ओढ़ ली जिससे भजन बचाने का वादा करता है, ताकि जो उनमें हैं उनके लिए यह वादा सिर्फ़ इस जीवन की सीमा तक न रहे।
दर्पण
यह पद उस जगह पर उँगली रखता है जहाँ हमारा भरोसा और हमारा बीमा घुल-मिल जाते हैं। हम कहते हैं परमेश्वर मेरा शरणस्थान है, और भीतर से हिसाब लगाते हैं कि नौकरी कितनी पक्की है, रिपोर्ट कब आएगी, बच्चा देर से क्यों लौटा। दुःख के "डेरे के निकट न आने" की भाषा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारा डेरा असल में कहाँ गड़ा है: बैंक खाते में, प्रतिष्ठा में, स्वास्थ्य में, या परमप्रधान में। पद 9 पहले "मान लेना" कहता है, फिर पद 10 सुरक्षा कहता है; क्रम पलटा नहीं जा सकता। आज एक काम कीजिए: अपने घर के दरवाज़े पर खड़े होकर, हाथ चौखट पर रखकर, ज़ोर से कहिए, "हे यहोवा, तू मेरा शरणस्थान ठहरा है", और इस घर के हर सदस्य का नाम लेकर परमेश्वर को सौंप दीजिए।
संदर्भ
भजन 91 महामारी, तीर और बहेलिये के जाल की दुनिया से आता है, जहाँ मृत्यु दूर की खबर नहीं बल्कि पड़ोस की घटना थी। प्राचीन पूर्व में लोग रात के भय और दोपहर की मरी को आत्मिक शक्तियों से जोड़ते थे, और घर-घर में ताबीज़, मंत्र और देवताओं के नाम लिखी पट्टियाँ टाँगी जाती थीं। इस भजन में एक भी ताबीज़ नहीं है, केवल एक नाम है। यह उस समय की धार्मिक अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार था: सुरक्षा खरीदी नहीं जाती, वह उस परमेश्वर के साथ रहने से मिलती है जिसका नाम जाना गया है। "डेरा" शब्द भी याद दिलाता है कि इस्राएल का इतिहास चलते-फिरते तंबुओं का इतिहास था, जहाँ दीवारें नहीं, केवल परमेश्वर की उपस्थिति सुरक्षा थी।
प्रश्न
तो जब विश्वासी का घर उजड़ता है, तब क्या यह पद झूठा पड़ जाता है? ईमानदारी से: कोई भी व्याख्या इस चुभन को पूरी तरह नहीं निकाल सकती। भजन को महज़ आत्मिक रूपक बना देना उसकी ठोस भाषा के साथ अन्याय है, और उसे बीमा पॉलिसी बना देना कब्रिस्तानों के सामने टिकता नहीं। पौलुस रोमियों 8 में इसी तनाव को बिना मीठा किए रखता है: वह तलवार, अकाल और खतरे को गिनता है, और फिर भी कहता है कि कोई चीज़ मसीह के प्रेम से अलग नहीं कर सकती; अलग करना, न कि पहुँचना, वहाँ मुख्य शब्द है। पद 16 का "उद्धार का दर्शन" संकेत देता है कि इस वादे का अंतिम हिसाब उस दिन खुलेगा, इस दोपहर नहीं। यह राहत है, परन्तु सस्ती नहीं।
श्रोता
पहले गाने वालों ने इसमें व्यक्तिगत सुरक्षा से बड़ा कुछ सुना। बंदी बनाकर ले जाए गए, लौट आए, टूटी दीवारों के बीच जीने वाले लोगों के लिए यह भजन एक स्वीकारोक्ति थी कि हमारा ठिकाना मंदिर की मोटी दीवारों में नहीं, उन परमेश्वर में है जो साथ चलते हैं। उनके कानों में "तेरे निकट हजार गिरेंगे" कोई काल्पनिक आँकड़ा नहीं था; उन्होंने युद्ध और महामारी में सचमुच गिनतियाँ देखी थीं। और वे यह भजन एक साथ, समुदाय में गाते थे, जिससे "तुझ पर" का अर्थ अकेले व्यक्ति की छूट नहीं, बल्कि परमेश्वर के लोगों के बीच रहने वाले की सुरक्षा बनता था। वह अंतर आज भी मायने रखता है: यह वादा उसके लिए है जो परमेश्वर के डेरे में बसता है, न कि उसके लिए जो अपने डेरे में परमेश्वर को मेहमान रखता है।
चिंतन
आपका डेरा असल में कहाँ गड़ा है, और पिछले महीने के किस फ़ैसले से यह पता चलता है?
जब विपत्ति सचमुच आपके निकट आई, तब आपने पद 15 के "संकट में मैं उसके संग रहूँगा" को कहाँ पहचाना?
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