रोमियों 12
पाठ
रोमियों के पत्र में ग्यारह अध्याय तक पौलुस ने परमेश्वर की दया का नक्शा खींचा है, और अब बारहवें अध्याय में वह अचानक मुड़कर पाठक की आँखों में देखता है: "इसलिए हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर विनती करता हूँ।" वेदी पर चढ़ाया जाने वाला पशु मरता था; यहाँ वह जीवित रहता है। पौलुस कहता है, अपने शरीरों को जीवित बलिदान करके चढ़ाओ, संसार के साँचे में मत ढलो, बुद्धि के नये होने से चाल-चलन बदलता जाए। फिर वह एक देह की तस्वीर खोलता है जिसमें भिन्न-भिन्न वरदान हैं, और अंत में छोटे-छोटे वाक्यों की झड़ी लगा देता है: निष्कपट प्रेम, सतानेवालों को आशीष, रोनेवालों के साथ रोना, बदला न लेना, और भलाई से बुराई को जीत लेना।
मूल मर्म
ध्यान दीजिए, पौलुस आज्ञा नहीं देता, "विनती करता" है, और विनती का आधार नैतिक दबाव नहीं बल्कि "परमेश्वर की दया" है। यही इस अध्याय की धुरी है: आराधना कोई ऐसी चीज़ नहीं जो हम परमेश्वर को राज़ी करने के लिए करते हैं, बल्कि वह प्रतिक्रिया है जो पहले से मिली दया से फूटती है। और वह आराधना मंदिर में नहीं, शरीर में होती है। जो हाथ काम करते हैं, जो ज़ुबान बोलती है, जो पैसा खर्च होता है, जो थकान सहन की जाती है, यही "आत्मिक सेवा" है। इसलिए दूसरे पद का "इस संसार के सदृश्य न बनो" कोई सांस्कृतिक परहेज़ नहीं, बल्कि एक गहरी बात है: संसार हमें बिना पूछे अपने साँचे में ढालता रहता है, और छुटकारा बाहरी नियमों से नहीं, भीतर से नई की गई बुद्धि से आता है, जो धीरे-धीरे पहचानना सीखती है कि परमेश्वर की इच्छा क्या है।
सूत्र जो सब जोड़ता है
लैव्यव्यवस्था की वेदी के सामने खड़े होकर सोचिए: पुजारी का चाकू, पशु की काँपती देह, धुएँ की गंध। सदियों तक इस्राएल ने यही सीखा कि परमेश्वर के पास खाली हाथ नहीं जाया जाता। फिर मसीह आए और अपने आप को एक ही बार चढ़ा दिया, और वेदी खाली हो गई। अब पौलुस उसी खाली वेदी की ओर इशारा करके कहता है: चढ़ो, पर मरने के लिए नहीं, जीने के लिए। "जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान।" यही पूरी बाइबल का सूत्र है: परमेश्वर पहले छुड़ाते हैं, फिर माँगते हैं। मिस्र से निकाले जाने के बाद ही सीनै पर व्यवस्था मिली। ग्यारह अध्याय दया के बाद ही "इसलिए" आता है। और अध्याय का अंतिम वाक्य, "भलाई से बुराई को जीत लो", क्रूस का ही संक्षेप है, जहाँ बुराई को बुराई से नहीं, आत्मदान से हराया गया।
दर्पण
सोचिए उस सहकर्मी के बारे में जिसने बैठक में आपका श्रेय चुरा लिया, और आपने बदला नहीं लिया, पर मन में एक फाइल बनाकर रख ली, कि मौका मिलेगा तो हिसाब बराबर होगा। पौलुस की कैंची इसी फाइल पर चलती है। "बुराई के बदले किसी से बुराई न करो" केवल हाथ रोकने की बात नहीं; आगे वह कहता है, भूखे को खाना खिला, प्यासे को पानी पिला। यानी शत्रु के जीवन में सक्रिय भलाई। और पद सोलह और भी चुभता है: "अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न हो।" हममें से कितने अपनी समझदारी को ही अपनी सुरक्षा मानते हैं। आज एक काम कीजिए: कागज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसने आपको चोट पहुँचाई है, और उसके नाम के आगे धीरे से, ज़ोर से बोलकर प्रार्थना कीजिए, "परमेश्वर, इन्हें आशीष दीजिए।"
पहले श्रोता
रोम की गलियों में यह पत्र किसी बड़े गिरजाघर में नहीं, किराए के छोटे कमरों में पढ़ा गया, जहाँ बीस-पच्चीस लोग खड़े-बैठे सुन रहे थे: कुछ यहूदी जो सम्राट क्लौदियुस के निकाले जाने के बाद लौटे थे और अपना घर किसी और के कब्ज़े में पा चुके थे, कुछ गैर-यहूदी जो इस बीच कलीसिया के मालिक बन बैठे थे, और कुछ दास जिनकी पीठ पर कोड़ों के निशान थे। ऐसे कमरे में "परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो" कोई मीठा वाक्य नहीं था, वह सामाजिक क्रांति थी। रोमी संस्कृति में सम्मान सीमित वस्तु थी, जिसे छीनकर बढ़ाया जाता था। और "अपने सतानेवालों को आशीष दो" उस शहर में लिखा गया जहाँ कुछ ही वर्षों बाद विश्वासियों को जलाकर बागों में रोशनी की जाएगी।
मुख्य पात्र
इस अध्याय के केंद्र में हम नहीं, परमेश्वर हैं, और उनका चेहरा दो बार दिखता है। पहली बार पद एक में, दया के रूप में, इतनी उदार कि पौलुस को आदेश देने की ज़रूरत नहीं पड़ती, केवल याद दिलाना काफी है। दूसरी बार पद उन्नीस में, कहीं अधिक कड़े स्वर में: "बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।" ये दोनों अलग परमेश्वर नहीं हैं। हमें बदला लेने से इसलिए नहीं रोका जाता कि हमारे साथ जो हुआ वह मामूली था, बल्कि इसलिए कि वह इतना गंभीर है कि उसका निपटारा हमारे टेढ़े हाथों में सुरक्षित नहीं। न्याय टलता नहीं, केवल सही अदालत में जाता है। और यही जानकर हम शत्रु को पानी पिला सकते हैं, बिना यह महसूस किए कि हम अन्याय पर पर्दा डाल रहे हैं।
शास्त्र की गूँज
क्रूस पर लटके यीशु ने अपने मारनेवालों के लिए क्षमा की प्रार्थना की; पौलुस का "आशीष दो, श्राप न दो" उसी प्रार्थना की गूँज है, केवल अब वह उन लोगों के मुँह में रखी गई है जो उसी क्रूस से बचाए गए हैं। दूसरी गूँज कुरिन्थियों की पहली पत्री के बारहवें अध्याय से आती है, जहाँ पौलुस उसी देह के चित्र को खींचता है, पर वहाँ वह टूटी हुई कलीसिया को जोड़ने के लिए है; यहाँ रोम में वह अभिमान को तोड़ने के लिए है, ताकि कोई "उससे बढ़कर अपने आपको न समझे।" एक ही चित्र, दो अलग घाव, एक ही दवा: तुम अकेले पूरे नहीं हो, तुम "एक दूसरे के अंग" हो।
चिंतन के प्रश्न
संसार ने पिछले साल चुपचाप आपको किस साँचे में ढाला है, और आपने कब आखिरी बार उस पर सवाल उठाया था?
आपके भीतर कौन सा "हिसाब" अब भी खुला पड़ा है, जिसे परमेश्वर के हाथ में सौंपने से आप डरते हैं, और क्यों?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मुझे अपने बारे में सच्ची समझ दे। न इतना बड़ा समझूँ कि दूसरों को छोटा कर दूँ, न इतना कम कि तेरा दिया हुआ भूल जाऊँ। जो विश्वास तूने मुझे सौंपा है, उसी नाप से चलना सिखा, संयम और नम्रता के साथ।
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