बाइबल व्याख्या

रोमियों 2:2

बाइबल

पाठ

पौलुस एक ऐसी बात कहते हैं जिस पर उनके पाठक तुरंत सिर हिलाकर सहमत हो जाते: "और हम जानते हैं कि ऐसे-ऐसे काम करनेवालों पर परमेश्वर की ओर से सच्चे दण्ड की आज्ञा होती है।" यह कोई नई शिक्षा नहीं, बल्कि साझा ज्ञान है, वह नींव जिस पर हर धर्मनिष्ठ यहूदी और हर नैतिक विचारवाला व्यक्ति खड़ा था। जो लोग पहले अध्याय के अंत में गिनाए गए काम करते हैं, उन पर परमेश्वर का न्याय आता है, और वह न्याय सच्चाई के अनुसार है, मनगढ़ंत नहीं, पक्षपाती नहीं, अफवाह पर आधारित नहीं। पौलुस इस सहमति को हथियार की तरह नहीं, बल्कि दर्पण की तरह उठाते हैं: जिस मानक से तुम दूसरों को तौलते हो, वही मानक तुम्हारे ऊपर भी लटका हुआ है। पद 1 में आरोप लगानेवाला निरुत्तर हो चुका है; पद 2 बताता है कि वह किसके सामने निरुत्तर है।

हृदय

"सच्चे दण्ड की आज्ञा" में जो शब्द छिपा है वह है सत्य, यूनानी में अलेथेइया, यानी वह न्याय जो चीज़ों को वैसा ही देखता है जैसी वे वास्तव में हैं। यहीं इस पद का धर्मशास्त्रीय भार है। हमारे सारे आरोप अधूरी जानकारी पर टिके होते हैं; हम दूसरे का काम देखते हैं पर उसका हृदय नहीं, अपना हृदय जानते हैं पर उसे अपने कामों से अलग करके बचा लेते हैं। परमेश्वर यह विभाजन नहीं करते। उनका न्याय इसलिए भयावह है क्योंकि वह पूरी तरह सही है, और इसीलिए वह भरोसेमंद भी है। एक ऐसे संसार में जहाँ हर अदालत में कुछ न कुछ टेढ़ा रह जाता है, यह घोषणा दोहरी है: चेतावनी और आशा साथ-साथ। सृष्टिकर्ता अपनी सृष्टि को अनदेखा नहीं करते, और पवित्रता कोई भावना नहीं, परमेश्वर के होने का स्वभाव है। जो इसे हल्का करता है, वह अनुग्रह को भी हल्का कर देता है, क्योंकि जिस न्याय की कोई गंभीरता नहीं, उससे बचाने वाला क्रूस भी अर्थहीन हो जाता है।

सूत्र

परमेश्वर का सच्चा न्याय बाइबल की कोई उपशाखा नहीं, वह पूरी कहानी का ढाँचा है। जलप्रलय से लेकर बाबुल तक, भविष्यद्वक्ताओं की चेतावनियों से लेकर निर्वासन तक, एक ही दावा दोहराया जाता है: परमेश्वर देखते हैं, और जो वे देखते हैं उसी के अनुसार निर्णय करते हैं। पौलुस इसी धारा में खड़े होकर बोलते हैं, पर वे इसे कहीं ले जा रहे हैं। चौदह पद आगे वे यही न्याय मसीह के हाथ में सौंप देते हैं: "जिस दिन परमेश्वर मेरे सुसमाचार के अनुसार यीशु मसीह के द्वारा मनुष्यों की गुप्त बातों का न्याय करेगा।" ध्यान दीजिए, यह "सुसमाचार के अनुसार" है। न्यायाधीश वही हैं जो क्रूस पर हमारे स्थान पर खड़े हुए। सत्य के अनुसार न्याय रद्द नहीं होता, वह अपनी पूरी गंभीरता के साथ मसीह पर उतर आता है। अनुग्रह न्याय का विकल्प नहीं, उसका वहन है।

दर्पण

यह पद उस क्षण को पकड़ता है जब आप किसी के बारे में सही बात कह रहे होते हैं। वह सहकर्मी सचमुच बेईमान है; वह रिश्तेदार सचमुच पैसों में टेढ़ा है; कलीसिया का वह अगुवा सचमुच अहंकारी है। आपका आकलन गलत नहीं। पौलुस उसे गलत ठहरा भी नहीं रहे। वे बस यह कह रहे हैं कि जिस तराज़ू को आपने इतने विश्वास से उठाया, वह तराज़ू आपके अपने जीवन पर भी लटका है, और उसे चलानेवाला पक्षपात नहीं करता। जिस पल आलोचना में एक गुप्त मिठास आने लगे, समझ लीजिए कि आप दर्पण को खिड़की समझ बैठे हैं। आज यह कीजिए: पिछले सप्ताह आपने जिस व्यक्ति के बारे में सबसे कड़ी बात कही, वह वाक्य कागज़ पर ज्यों का त्यों लिखिए, फिर उसमें से उसका नाम हटाकर अपना नाम रखिए, और उसे ज़ोर से पढ़कर परमेश्वर से पूछिए कि इसमें कितना सच है।

मुख्य पात्र

इस पद का केंद्रीय पात्र आरोप लगानेवाला मनुष्य नहीं, बल्कि परमेश्वर हैं, और पौलुस उनका जो चित्र खींचते हैं वह असाधारण है। यह ऐसा न्यायी नहीं जो क्रोध में फटा पड़ रहा हो। अगले ही पद में उनकी "भलाई, और सहनशीलता, और धीरजरूपी धन" का ज़िक्र आता है, और उससे भी आगे वे "किसी का पक्ष नहीं करता" कहे जाते हैं। यानी परमेश्वर का न्याय धीमा है, पर टेढ़ा नहीं; उनकी सहनशीलता ढील है, माफ़ी नहीं। वे उस न्यायाधीश की तरह नहीं जो सबूत के अभाव में छोड़ देता है, और न उस पिता की तरह जो आँख मूँद लेता है। वे जानते हैं, और फिर भी प्रतीक्षा करते हैं। यही प्रतीक्षा मन फिराव का निमंत्रण है, और यही प्रतीक्षा हठीले मन के लिए सबसे बड़ा ख़तरा भी।

बारीकी

"हम जानते हैं।" पौलुस यहाँ कोई तर्क नहीं देते, वे स्मरण कराते हैं। यह वह छोटा सा शब्द है जिससे पूरा जाल बुना जाता है। रोम की कलीसिया में बैठे यहूदी विश्वासी और नैतिकता पर गर्व करनेवाले यूनानी, दोनों इस वाक्य पर बिना झिझक सिर हिला देते। और ठीक यहीं पौलुस उन्हें पकड़ लेते हैं, क्योंकि जिस सत्य पर आप सहमति से सिर हिलाते हैं, वह सत्य आपको बाँध भी देता है। सही धर्मशास्त्र आपको बचाता नहीं, वह आपकी ज़िम्मेदारी बढ़ाता है। यह बात उन सबके लिए चुभनेवाली है जो बाइबल अध्ययन करवाते हैं, रविवार को सिखाते हैं, या केवल सही राय रखने से आश्वस्त हो जाते हैं। जानना और बच जाना एक चीज़ नहीं है। पौलुस आगे यही कहेंगे: "व्यवस्था के सुननेवाले धर्मी नहीं।"

प्रश्न

यदि परमेश्वर का न्याय सचमुच सत्य के अनुसार है, तो कोई कैसे बचेगा? क्योंकि सत्य के अनुसार देखा जाना ठीक वही है जिससे हम सबसे अधिक डरते हैं। हम अपने बारे में जो कहानी सुनाते हैं, उसमें हमेशा कुछ छूट जाता है, और परमेश्वर के सामने कुछ नहीं छूटता। पौलुस इस प्रश्न का उत्तर तुरंत नहीं देते; वे हमें दो अध्याय तक असहज छोड़ते हैं। और जब उत्तर आता है, तब भी वह न्याय को रद्द नहीं करता, केवल उसका स्थान बदलता है। पर एक गाँठ खुली रह जाती है: परमेश्वर ने वह न्याय स्वयं क्यों उठाया, जबकि वे पूरी तरह अधिकार में थे कि हमें उठाने देते? इसका कोई तार्किक कारण नहीं मिलता। वहाँ केवल प्रेम बचता है, और प्रेम कभी अनिवार्यता नहीं होता।

चिंतन

पिछली बार जब आपने किसी के बारे में कोई सही आलोचना की थी, उसमें आपका उद्देश्य सुधार था या अपनी स्थिति ऊँची करना?

यह जानकर कि परमेश्वर आपको पूरी सच्चाई से देखते हैं, आपके भीतर पहले डर जागता है या राहत, और यह उत्तर आपके बारे में क्या बताता है?

Romans में और गहराई से जानें

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Romans 8-16 For You

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The Message of Romans

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A modern classic on the letter that has changed history more than once.

Romans: An Introduction and Commentary

F.F. Bruce

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

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Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Romans 2:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

रोमियों 2:2 का क्या अर्थ है?
पौलुस एक ऐसी बात कहते हैं जिस पर उनके पाठक तुरंत सिर हिलाकर सहमत हो जाते: "और हम जानते हैं कि ऐसे-ऐसे काम करनेवालों पर परमेश्वर की ओर से सच्चे दण्ड की आज्ञा होती है।" यह कोई नई शिक्षा नहीं, बल्कि साझा ज्ञान है, वह नींव जिस पर हर धर्मनिष्ठ यहूदी और हर नैतिक विचारवाला व्यक्ति खड़ा था। जो लोग पहले अध्याय के अंत में गिनाए गए काम करते हैं, उन पर परमेश्वर का न्याय आता है, और वह न्याय सच्चाई के अनुसार है, मनगढ़ंत नहीं, पक्षपाती नहीं, अफवाह पर आधारित नहीं। पौलुस इस सहमति को हथियार की तरह नहीं, बल्कि दर्पण की तरह उठाते हैं: जिस मानक से तुम दूसरों को तौलते हो, वही मानक तुम्हारे ऊपर भी लटका हुआ है। पद 1 में आरोप लगानेवाला निरुत्तर हो चुका है; पद 2 बताता है कि वह किसके सामने निरुत्तर है।
रोमियों 2:2 किस विषय में है?
परमेश्वर का सच्चा न्याय बाइबल की कोई उपशाखा नहीं, वह पूरी कहानी का ढाँचा है। जलप्रलय से लेकर बाबुल तक, भविष्यद्वक्ताओं की चेतावनियों से लेकर निर्वासन तक, एक ही दावा दोहराया जाता है: परमेश्वर देखते हैं, और जो वे देखते हैं उसी के अनुसार निर्णय करते हैं। पौलुस इसी धारा में खड़े होकर बोलते हैं, पर वे इसे कहीं ले जा रहे हैं। चौदह पद आगे वे यही न्याय मसीह के हाथ में सौंप देते हैं: "जिस दिन परमेश्वर मेरे सुसमाचार के अनुसार यीशु मसीह के द्वारा मनुष्यों की गुप्त बातों का न्याय करेगा।" ध्यान दीजिए, यह "सुसमाचार के अनुसार" है। न्यायाधीश वही हैं जो क्रूस पर हमारे स्थान पर खड़े हुए। सत्य के अनुसार न्याय रद्द नहीं होता, वह अपनी पूरी गंभीरता के साथ मसीह पर उतर आता है। अनुग्रह न्याय का विकल्प नहीं, उसका वहन है।
रोमियों 2:2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस पद का केंद्रीय पात्र आरोप लगानेवाला मनुष्य नहीं, बल्कि परमेश्वर हैं, और पौलुस उनका जो चित्र खींचते हैं वह असाधारण है। यह ऐसा न्यायी नहीं जो क्रोध में फटा पड़ रहा हो। अगले ही पद में उनकी "भलाई, और सहनशीलता, और धीरजरूपी धन" का ज़िक्र आता है, और उससे भी आगे वे "किसी का पक्ष नहीं करता" कहे जाते हैं। यानी परमेश्वर का न्याय धीमा है, पर टेढ़ा नहीं; उनकी सहनशीलता ढील है, माफ़ी नहीं। वे उस न्यायाधीश की तरह नहीं जो सबूत के अभाव में छोड़ देता है, और न उस पिता की तरह जो आँख मूँद लेता है। वे जानते हैं, और फिर भी प्रतीक्षा करते हैं। यही प्रतीक्षा मन फिराव का निमंत्रण है, और यही प्रतीक्षा हठीले मन के लिए सबसे बड़ा ख़तरा भी।
रोमियों 2:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यदि परमेश्वर का न्याय सचमुच सत्य के अनुसार है, तो कोई कैसे बचेगा?
रोमियों 2:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यह जानकर कि परमेश्वर आपको पूरी सच्चाई से देखते हैं, आपके भीतर पहले डर जागता है या राहत, और यह उत्तर आपके बारे में क्या बताता है?
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Romans 2 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 18

पिता, मैं तेरी इच्छा जानता हूँ, सही और गलत में फर्क भी पहचानता हूँ, पर कई बार मेरा जीवन उस जानकारी से पीछे रह जाता है। मुझे सिर्फ समझने वाला नहीं, करने वाला बना। जो मैं सिर से मानता हूँ, वह मेरे कामों में भी दिखे।

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