रोमियों 3
पाठ
पौलुस पहले एक आपत्ति उठाते हैं जो उनके यहूदी पाठकों के मन में ज़रूर उठी होगी: यदि सब बराबर दोषी हैं, तो "यहूदी की क्या बड़ाई, या खतने का क्या लाभ?" उत्तर दोहरा है, हाँ, बहुत कुछ, क्योंकि "परमेश्वर के वचन उनको सौंपे गए", और फिर भी कुछ नहीं, क्योंकि पुराने नियम की गवाहियों की एक लंबी शृंखला गले, जीभ, होठों, पाँवों और आँखों तक पूरे मनुष्य को दोषी ठहराती है: "कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं।" व्यवस्था का काम यही है कि "हर एक मुँह बन्द किया जाए"। फिर अध्याय के बीचोंबीच एक मोड़ आता है, "पर अब", और वहाँ से पौलुस मसीह यीशु में मिलने वाले उस छुटकारे की बात करते हैं जो सेंत-मेंत है, अनुग्रह से है, और विश्वास के द्वारा ग्रहण किया जाता है।
मर्म
इस अध्याय का धड़कता हुआ हृदय पद 26 में है: परमेश्वर "आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्वास करे, उसका भी धर्मी ठहरानेवाला हो।" यह वाक्य सुनने में सरल लगता है, पर इसमें वह तनाव है जिसने पूरे पुराने नियम को खींचकर रखा था। यदि परमेश्वर न्यायी हैं, तो पाप को अनदेखा कैसे करेंगे? और यदि पाप को सचमुच तौलेंगे, तो कौन बचेगा? पौलुस कहते हैं कि क्रूस पर दोनों बातें एक साथ हुईं: परमेश्वर ने अपनी पवित्रता से समझौता किए बिना दोषी को निर्दोष ठहराया, क्योंकि दोष किसी और ने उठाया। यही कारण है कि पद 27 में घमंड की "जगह ही नहीं" रहती। हमारा धर्मी ठहरना हमारी नैतिक उपलब्धि का प्रमाणपत्र नहीं, किसी और के लहू पर लिखी हुई रसीद है।
सूत्र
पद 21 का "पर अब" पौलुस के लिए महज़ समय का शब्द नहीं है, यह इतिहास का जोड़ है। परमेश्वर की धार्मिकता "बिना व्यवस्था" प्रकट हुई, पर व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता उसकी गवाही देते हैं। यानी क्रूस कोई आपात योजना नहीं थी जो तब बनी जब इस्राएल असफल हुआ; वह वही था जिसकी ओर बलिदान, मंदिर, प्रायश्चित का दिन और नबियों की दुखती हुई आशाएँ उँगली उठाती रही थीं। इसीलिए पौलुस पद 29-30 में अन्यजातियों को भीतर खींच लेते हैं: "एक ही परमेश्वर है।" अब्राहम से किया गया वादा कि उसके द्वारा पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँगे, यहाँ पूरा होता है, पर उस रास्ते से नहीं जिसकी अपेक्षा थी। खतना नहीं, वंश नहीं, विश्वास। और विश्वास का विषय कोई विचार नहीं, एक व्यक्ति है।
दर्पण
हममें से अधिकतर लोग नास्तिक नहीं, हिसाब रखने वाले होते हैं। दफ़्तर में हम अपने काम से अपनी कीमत तय करते हैं; घर में हम चुपचाप गिनते हैं कि हमने कितना दिया और बदले में कितना मिला; कलीसिया में हम उस भाई से स्वयं को थोड़ा बेहतर मानते हैं जो नियमित नहीं आता। यह अध्याय उस पूरे बहीखाते को बंद कर देता है। "हर एक मुँह बन्द किया जाए" का अर्थ है कि आपकी सफ़ाई, आपका स्पष्टीकरण, आपकी तुलना, सब चुप। यह अपमानजनक लगता है, जब तक आप यह न समझें कि जिस क्षण बहीखाता बंद होता है, उसी क्षण डर भी बंद होता है। जो कुछ भी सेंत-मेंत मिला है, उसे खोने का भय नहीं रहता।
आज ही एक काग़ज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिससे आप भीतर ही भीतर स्वयं को बेहतर समझते हैं, और उसके नीचे लिखिए: "कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं।" फिर वह काग़ज़ फाड़ दीजिए।
बारीकी
पद 25 का शब्द "प्रायश्चित" ग्रीक में हिलास्तेरियोन है, और यह वही शब्द है जो यूनानी पुराने नियम में वाचा के संदूक के ढक्कन के लिए इस्तेमाल होता था, वह सोने का आवरण जिस पर महायाजक साल में एक बार लहू छिड़कता था। पौलुस कह रहे हैं: परमेश्वर ने यीशु को वह स्थान ठहराया। परदे के पीछे का सबसे गुप्त बिंदु अब खुले में, गुलगुता की पहाड़ी पर है। और ध्यान दीजिए कि क्रिया का कर्ता कौन है: "उसे परमेश्वर ने… ठहराया।" यह मनुष्य द्वारा क्रोधित देवता को शांत करने की कहानी नहीं है। परमेश्वर स्वयं वह प्रबंध करते हैं जिसकी हमें ज़रूरत थी और जिसे हम कभी जुटा नहीं सकते थे।
प्रश्न
पद 25 एक बेचैन करने वाली बात कहती है: वे पाप जो "पहले किए गए" थे, उन पर परमेश्वर ने "अपनी सहनशीलता से ध्यान नहीं दिया"। तो क्या सदियों तक परमेश्वर ने पाप को टाल रखा था? क्या बकरों और बैलों का लहू केवल उधार चुकाने की मोहलत था? पौलुस इसका सुखद उत्तर नहीं देते। वे बस इतना कहते हैं कि क्रूस पर परमेश्वर की धार्मिकता प्रकट हुई, मानो उन पर यह आरोप लग सकता था कि वे ढीले हैं, और क्रूस उस आरोप का उत्तर है। इसमें एक अनसुलझी गहराई रह जाती है: परमेश्वर ने इतना लंबा इंतज़ार क्यों किया? उन पीढ़ियों का क्या जो वादे की छाया में जिए और मरे? पाठ हमें वहाँ तक ले जाता है और रुक जाता है। कभी-कभी विश्वास का अर्थ यही है कि जहाँ पाठ रुकता है, वहाँ हम भी रुक जाएँ।
संदर्भ
पौलुस यह पत्र लगभग 57 ईस्वी में लिखते हैं, संभवतः कुरिन्थ से, एक ऐसी कलीसिया को जिसे उन्होंने स्थापित नहीं किया था। रोम की मंडली में गहरा तनाव था: सम्राट क्लौदियुस ने कुछ वर्ष पहले यहूदियों को रोम से निकाल दिया था, और जब वे लौटे तो पाया कि कलीसिया अब मुख्यतः अन्यजातीय हो चुकी है। कौन असली उत्तराधिकारी है? किसकी परंपरा चलेगी? इसी बारूद पर पौलुस अध्याय 3 लिखते हैं। उनकी शैली भी ध्यान देने योग्य है: वे एक काल्पनिक विरोधी से बहस करते हैं, प्रश्न उठाते हैं और "कदापि नहीं!" से काटते हैं, जो उस युग की परिचित वाद-शैली थी। यह ठंडा धर्मशास्त्र नहीं, एक जीवित कमरे में बोला गया तर्क है, जहाँ दोनों पक्ष सुन रहे थे।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सी बात है जिसे आप चुपचाप परमेश्वर के सामने अपनी योग्यता के रूप में पेश करते हैं, और पद 27 उससे क्या कहता है?
यदि परमेश्वर "आप ही धर्मी" हैं और साथ ही आपको "धर्मी ठहरानेवाले" भी, तो यह आपके उस अपराधबोध को कैसे बदलता है जिसे आप वर्षों से ढो रहे हैं?
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Romans 3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
रोमियों 3 का क्या अर्थ है?
रोमियों 3 किस विषय में है?
रोमियों 3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
रोमियों 3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, कभी कभी मैं अपनी पहचान, अपनी परंपरा और अपने बाहरी कामों पर भरोसा करने लगता हूँ। मुझे याद दिला कि असली लाभ तेरे वचन और तेरी सच्चाई में है। मेरा मन तेरे सामने खुला रहे, और मैं दिखावे से नहीं, तुझसे जुड़कर जीऊँ।
क्योंकि एक ही परमेश्वर है जो खतना किए हुओं को विश्वास से और बिना खतना किए हुओं को भी विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराएगा।" पौलुस ने दो दरवाज़े नहीं बनाए। एक ही परमेश्वर, एक ही रास्ता। तो फिर तू किसे अपने से नीचे समझ रहा है? जिस कृपा से तू बचा है, उसी कृपा से वह भी बचेगा जिसे तू दूर रखता है।
पौलुस ने पाप की पूरी सूची गिनाई, गला, जीभ, होंठ, मुँह, पाँव, और अंत में आँखों पर आकर रुक गया: "उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं।" जड़ यहीं है। जब परमेश्वर हमारी नज़र से हट जाता है, तब बाकी सब बिगड़ना शुरू होता है। आज खुद से पूछो, मेरी आँखें दिनभर किसे देखती हैं?
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