1 कुरिन्थियों 13
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
पौलुस यह पत्र कुरिन्थुस की कलीसिया को लिख रहे हैं, जहाँ लोग यह बताने में लगे थे कि किसके पास कौन सा बड़ा वरदान है, कोई भविष्यद्वाणी करता था, कोई अनोखी भाषाओं में बोलता था। पौलुस कहते हैं, यह सब अच्छा है, पर अगर प्रेम न हो, तो कुछ भी नहीं है। वे कहते हैं कि अगर मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की भाषाएँ बोलूँ, पर प्रेम न रखूँ, तो मैं बस ठनठनाता हुआ पीतल हूँ, यानी शोर करने वाली एक खाली चीज़, जिसमें कोई गहराई नहीं।
फिर वे प्रेम का वर्णन करते हैं, पर यह कोई भावना नहीं है जिसका वर्णन हो रहा है, यह बताया जा रहा है कि प्रेम कैसा व्यवहार करता है। प्रेम धीरजवन्त है, कृपालु है, डाह नहीं करता, अपनी बड़ाई नहीं करता। प्रेम अपनी भलाई नहीं चाहता, झुँझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता। यह एक लंबी सूची है, और ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि यह हर बार बताता है कि प्रेम क्या नहीं करता, इससे ज़्यादा कि प्रेम क्या करता है। शायद इसलिए क्योंकि हम पहले से जानते हैं कि प्रेम न होने पर क्या होता है, ईर्ष्या, गुस्सा, बड़बड़ाना।
आखिर में पौलुस कहते हैं कि भविष्यद्वाणियाँ, भाषाएँ, ज्ञान, यह सब एक दिन खत्म हो जाएगा, क्योंकि यह सब अधूरा है। वे अपने बचपन की बात करते हैं, जब वह बालक थे तो बालकों जैसे बोलते थे, पर सयाना होने पर बालकों की बातें छोड़ दीं। अभी हम परमेश्वर को दर्पण में धुँधला देख पाते हैं, पर एक दिन आमने सामने देखेंगे। और अंत में तीन चीज़ें रह जाती हैं, विश्वास, आशा, प्रेम, और इनमें सबसे बड़ा प्रेम है।
इसका अर्थ क्या है?
यह पाठ हमें एक कठिन सच बताता है, कोई भी वरदान, चाहे वह कितना भी बड़ा दिखे, अपने आप में कुछ नहीं है। तुम शायद बहुत अच्छे गा सकते हो, बहुत तेज़ दौड़ सकते हो, बहुत सारी बाइबिल की आयतें याद कर सकते हो, पर अगर उसके पीछे प्रेम न हो, तो पौलुस कहते हैं यह सब खोखला शोर जैसा है। यह सुनने में कठोर लगता है, पर यह इसलिए कहा गया है क्योंकि प्रेम कोई सजावट नहीं है जो बाकी सब चीज़ों के ऊपर लगाई जाती है। प्रेम वह जड़ है जिससे बाकी सब कुछ उगना चाहिए।
पौलुस यह भी ईमानदारी से मानते हैं कि अभी हमारा ज्ञान अधूरा है। हम परमेश्वर को दर्पण में धुँधला देखते हैं, साफ नहीं। यह कोई शर्म की बात नहीं, यह सच्चाई है कि अभी हम पूरी तरह नहीं समझ सकते। एक दिन, जब सर्वसिद्ध आएगा, तब सब कुछ साफ हो जाएगा।
बड़ी कहानी से जोड़
यह पाठ यीशु मसीह की तरफ इशारा करता है, हालाँकि उनका नाम यहाँ नहीं लिखा। सोचो, प्रेम धीरजवन्त है, कृपालु है, अपनी भलाई नहीं चाहता, यह वर्णन किसी और से पहले यीशु से पूरी तरह मेल खाता है। वे धीरजवन्त रहे जब लोगों ने उनका मज़ाक बनाया, उन्होंने अपनी भलाई नहीं चाही जब उन्होंने क्रूस पर अपना जीवन दे दिया। पौलुस यहाँ प्रेम की जो तस्वीर खींच रहे हैं, वह असल में यीशु का चेहरा है।
और यह प्रेम अभी भी रहता है, जब सब कुछ खत्म हो जाएगा, भविष्यद्वाणियाँ, भाषाएँ, ज्ञान, तब भी प्रेम रहेगा। यह परमेश्वर का वादा है कि उनका प्रेम कभी टलता नहीं, वह हमेशा रहता है, पहले भी, आज भी, और उस दिन भी जब हम परमेश्वर को आमने सामने देखेंगे।
तुम्हारे लिए
तुम शायद स्कूल में बहुत अच्छे हो, या खेल में, या तुम्हारे पास बहुत सारे दोस्त हैं। यह सब अच्छी बातें हैं। पर पौलुस पूछता है, इसके पीछे क्या है? क्या तुम अपने दोस्त की बात इसलिए सुनते हो क्योंकि तुम्हें उससे प्यार है, या सिर्फ इसलिए कि वह तुम्हें कुछ देगा? क्या तुम धीरज रखते हो जब कोई तुमसे गलती करता है, या तुरंत बुरा मान जाते हो?
यह कठिन है, और पौलुस भी नहीं कहते कि यह आसान है। पर वे यह भी नहीं कहते कि तुम्हें अकेले यह सब करना है। जिस प्रेम की वे बात करते हैं, वह पहले परमेश्वर ने हमें दिखाया, यीशु मसीह में। जब तुम उस प्रेम को पहचानने लगते हो, तब धीरे धीरे वैसा प्रेम तुम्हारे अंदर भी बढ़ने लगता है।
बात करने के लिए
अगर प्रेम कोई भावना नहीं बल्कि एक तरीका है जिससे हम व्यवहार करते हैं, तो आज तुम किसी एक व्यक्ति के साथ कैसे धीरजवन्त बन सकते हो?
पौलुस कहते हैं कि अभी हमारा ज्ञान अधूरा है और हम परमेश्वर को धुँधला देखते हैं। तुम्हारे मन में परमेश्वर के बारे में कौन सा सवाल है जिसका जवाब अभी तुम्हें नहीं मिला?
साथ में प्रार्थना
प्रभु यीशु, धन्यवाद कि आपने हमें दिखाया कि सच्चा प्रेम कैसा दिखता है, धीरजवन्त, कृपालु, सच्चा। हमें माफ़ करें जब हम जल्दी झुँझलाते हैं या अपनी ही भलाई चाहते हैं। हमारे अंदर वह प्रेम बढ़ाइए जो आपने पहले हमसे किया। आमीन।
1 कुरिन्थियों 13 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
1 कुरिन्थियों 13 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 13 क्या कहता है?
1 कुरिन्थियों 13 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे 1 कुरिन्थियों 13 से क्या सीख सकते हैं?
1 कुरिन्थियों 13 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
वह सब बातें सह लेता है, सब बातों पर विश्वास करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है।" पौलुस यह उस कलीसिया को लिख रहा था जो आपस में बँटी हुई थी, जहाँ हर कोई अपनी वरदान गिना रहा था। प्रेम का काम ढक लेना है, उघाड़ना नहीं। सोचो, जिस इंसान की कमज़ोरी तुम सबसे अच्छी तरह जानते हो, क्या तुम उसे ढकते हो या दूसरों को बताते हो?
परन्तु जब सिद्ध आएगा, तब अधूरा मिट जाएगा।"
तेरी अधूरी समझ, अधूरी प्रार्थनाएँ, अधूरे जवाब, ये मिटेंगे इसलिए नहीं कि वे बेकार थे, बल्कि इसलिए कि पूरा आ जाएगा। जैसे दीया सूरज उगने पर बुझा दिया जाता है, वह नाकाम नहीं हुआ, उसका काम पूरा हुआ। आज जो धुँधला दिखता है, उसे कसकर मत पकड़। जो आने वाला है, उसका इंतज़ार कर।
वह अधर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है।" ध्यान दे, यहाँ बात करने की नहीं, भीतर खुश होने की है। जब उस व्यक्ति के बारे में कोई बुरी खबर आती है जिससे तेरा मन खटका हुआ है, और भीतर कहीं एक चुपचाप संतोष जागता है, वहीं प्रेम की परीक्षा होती है। कुरिन्थ की कलीसिया दूसरों के गिरने की चर्चा में मज़ा लेती थी। तू किस खबर से हल्का महसूस करता है?
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