7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

1 शमूएल 27

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

दाऊद बहुत थक गया था। बहुत दिनों से राजा शाऊल उसे मारने के लिए पीछे-पीछे घूम रहा था, और दाऊद हर बार किसी तरह बच निकला था। पर अब उसके मन में एक डर बैठ गया, वह सोचने लगा, "एक दिन शाऊल मुझे पकड़ ही लेगा।" इसलिए दाऊद ने एक निर्णय लिया, वह अपने छः सौ साथियों को लेकर पलिश्तियों के देश में, गत के राजा आकीश के पास चला गया। यह वही पलिश्ती लोग थे जिनसे इस्राएल हमेशा लड़ता रहता था, और गोलियत भी गत का ही था। फिर भी दाऊद को लगा कि वहाँ शाऊल से छिपना आसान होगा।

और सच में ऐसा ही हुआ। जब शाऊल को पता चला कि दाऊद गत भाग गया है, तो उसने उसकी खोज बंद कर दी। दाऊद ने आकीश से कहा कि उसे राजधानी की जगह कोई छोटा नगर दे दिया जाए, तो आकीश ने उसे सिकलग नाम का नगर दे दिया। वहाँ दाऊद लगभग सवा साल तक रहा।

अब कहानी में एक मुश्किल हिस्सा आता है। दाऊद अपने आदमियों के साथ जाकर कुछ पुरानी जातियों पर हमला करता था, जो बहुत पहले से उस इलाके में रहती थीं। वह उनके गाँवों को तहस-नहस कर देता और किसी स्त्री-पुरुष को जीवित नहीं छोड़ता था। फिर वह भेड़-बकरी, गाय-बैल और कपड़े लेकर आकीश के पास लौट आता। जब आकीश पूछता कि आज कहाँ हमला किया, तो दाऊद झूठ बोल देता, यह बताकर कि उसने इस्राएल के अपने ही लोगों पर हमला किया है। वह चाहता था कि कोई जीवित न बचे जो आकीश को सच बता दे। और आकीश ने दाऊद की बात मान ली, उसे लगा कि अब दाऊद को इस्राएली लोग कभी माफ़ नहीं करेंगे, इसलिए वह हमेशा उसका सेवक बना रहेगा।

इसका क्या मतलब है?

यह हिस्सा पढ़कर सवाल उठता है, क्या दाऊद ने जो किया वह ठीक था? बाइबल का यह अध्याय इस बारे में कुछ नहीं कहता, न तारीफ़ करता है, न डांटता है। यह बस बताता है कि क्या हुआ। और यही बात हमें याद दिलाती है कि दाऊद कोई चमकता हुआ हीरो नहीं था जो हमेशा सही काम करता था। वह एक असली इंसान था, जो डरा हुआ था, थका हुआ था, और जिसने झूठ बोला और ऐसे काम किए जिन्हें परमेश्वर पसंद नहीं करते। परमेश्वर का वचन इन बातों को छिपाता नहीं, वह सच बताता है जैसा हुआ, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो।

ध्यान देने की बात यह भी है कि इस पूरे अध्याय में परमेश्वर का नाम एक बार भी नहीं आता। दाऊद खुद सोचता है, खुद योजना बनाता है, खुद निर्णय लेता है। पहले के अध्यायों में दाऊद अक्सर परमेश्वर से पूछता था कि क्या करूँ, पर यहाँ वह ऐसा नहीं करता। शायद डर ने उसकी आँखों को इतना ढक दिया था कि वह परमेश्वर से पूछना भूल गया।

एक बड़ी कहानी से जुड़ाव

परमेश्वर ने दाऊद से वादा किया था कि वह उसे राजा बनाएंगे, यह एक प्रतिज्ञा थी, एक पक्का वचन। पर इस अध्याय में दाऊद उस वादे पर भरोसा करने की बजाय अपने ही तरीके से अपनी जान बचाने की कोशिश करता है। फिर भी परमेश्वर उसे छोड़ते नहीं। आगे की कहानी दिखाएगी कि परमेश्वर अपना वादा निभाते रहे, भले दाऊद गलत रास्तों पर चला गया हो। यही बात आगे चलकर यीशु मसीह में भी साफ़ दिखती है, परमेश्वर के वादे हमारी गलतियों पर नहीं टिके होते, वे परमेश्वर की सच्चाई पर टिके होते हैं।

तुम्हारे लिए

शायद तुम्हें भी कभी-कभी लगता हो कि हालात इतने कठिन हैं कि परमेश्वर से पूछने का समय ही नहीं है, बस खुद ही कुछ कर डालो। दाऊद की कहानी दिखाती है कि डर में हम अक्सर ऐसे रास्ते चुन लेते हैं जो बाद में उलझन खड़ी कर देते हैं। यह ठीक है कि डर लगे, पर उस डर को परमेश्वर के सामने लाना ज़रूरी है, न कि अकेले अपनी योजना बनाकर आगे बढ़ जाना।

बात करें

अगर तुम दाऊद की जगह होते, और शाऊल तुम्हारे पीछे पड़ा होता, तो तुम क्या करते?

क्यों लगता है कि दाऊद ने परमेश्वर से पूछे बिना ही अपना रास्ता चुन लिया?

एक साथ प्रार्थना

हे प्रभु, जब हम डर जाते हैं, तो हम भी कभी-कभी आपसे पूछे बिना अपने ही रास्ते चुन लेते हैं। कृपया हमें याद दिलाइए कि हम हर डर, हर उलझन आपके सामने ला सकते हैं। धन्यवाद कि आपकी प्रतिज्ञाएँ हमारी गलतियों से कभी नहीं टूटतीं। आमीन।

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1 शमूएल 27 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 शमूएल 27 किस विषय में है?
दाऊद बहुत थक गया था। बहुत दिनों से राजा शाऊल उसे मारने के लिए पीछे-पीछे घूम रहा था, और दाऊद हर बार किसी तरह बच निकला था। पर अब उसके मन में एक डर बैठ गया, वह सोचने लगा, "एक दिन शाऊल मुझे पकड़ ही लेगा।" इसलिए दाऊद ने एक निर्णय लिया, वह अपने छः सौ साथियों को लेकर पलिश्तियों के देश में, गत के राजा आकीश के पास चला गया। यह वही पलिश्ती लोग थे जिनसे इस्राएल हमेशा लड़ता रहता था, और गोलियत भी गत का ही था। फिर भी दाऊद को लगा कि वहाँ शाऊल से छिपना आसान होगा।
1 शमूएल 27 क्या कहता है?
अब कहानी में एक मुश्किल हिस्सा आता है। दाऊद अपने आदमियों के साथ जाकर कुछ पुरानी जातियों पर हमला करता था, जो बहुत पहले से उस इलाके में रहती थीं। वह उनके गाँवों को तहस-नहस कर देता और किसी स्त्री-पुरुष को जीवित नहीं छोड़ता था। फिर वह भेड़-बकरी, गाय-बैल और कपड़े लेकर आकीश के पास लौट आता। जब आकीश पूछता कि आज कहाँ हमला किया, तो दाऊद झूठ बोल देता, यह बताकर कि उसने इस्राएल के अपने ही लोगों पर हमला किया है। वह चाहता था कि कोई जीवित न बचे जो आकीश को सच बता दे। और आकीश ने दाऊद की बात मान ली, उसे लगा कि अब दाऊद को इस्राएली लोग कभी माफ़ नहीं करेंगे, इसलिए वह हमेशा उसका सेवक बना रहेगा।
1 शमूएल 27 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
ध्यान देने की बात यह भी है कि इस पूरे अध्याय में परमेश्वर का नाम एक बार भी नहीं आता। दाऊद खुद सोचता है, खुद योजना बनाता है, खुद निर्णय लेता है। पहले के अध्यायों में दाऊद अक्सर परमेश्वर से पूछता था कि क्या करूँ, पर यहाँ वह ऐसा नहीं करता। शायद डर ने उसकी आँखों को इतना ढक दिया था कि वह परमेश्वर से पूछना भूल गया।
बच्चे 1 शमूएल 27 से क्या सीख सकते हैं?
शायद तुम्हें भी कभी-कभी लगता हो कि हालात इतने कठिन हैं कि परमेश्वर से पूछने का समय ही नहीं है, बस खुद ही कुछ कर डालो। दाऊद की कहानी दिखाती है कि डर में हम अक्सर ऐसे रास्ते चुन लेते हैं जो बाद में उलझन खड़ी कर देते हैं। यह ठीक है कि डर लगे, पर उस डर को परमेश्वर के सामने लाना ज़रूरी है, न कि अकेले अपनी योजना बनाकर आगे बढ़ जाना।
1 शमूएल 27 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
क्यों लगता है कि दाऊद ने परमेश्वर से पूछे बिना ही अपना रास्ता चुन लिया?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

दाऊद "उठकर अपने छः सौ साथियों समेत गत के राजा आकीश के पास चला गया।" ध्यान दे, इस बार उसने याजक को नहीं बुलाया, एपोद नहीं माँगा, यहोवा से नहीं पूछा। डर और थकान यही करते हैं, वे चुपचाप प्रार्थना को हमारी सूची से हटा देते हैं। फिर भी परमेश्वर ने दाऊद को शत्रु के देश में भी नहीं छोड़ा। तेरी थकान उसकी वफ़ादारी से बड़ी नहीं है।

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