6 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

2 इतिहास 6

प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

समझाइए

सुलैमान ने यरूशलेम में एक भवन बनाया है, जिसे हम मंदिर कहते हैं। यह कोई साधारण इमारत नहीं थी। यह वह जगह थी जहाँ परमेश्वर अपनी प्रजा इस्राएल के बीच अपना नाम रखना चाहते थे। जब भवन बनकर तैयार हुआ, तो सुलैमान पूरी सभा के सामने खड़े हुए और सबसे पहले परमेश्वर की प्रशंसा की। उन्होंने याद दिलाया कि परमेश्वर ने उनके पिता दाऊद से एक वचन दिया था, एक वादा, कि दाऊद का पुत्र यह भवन बनाएगा। और अब वह वादा पूरा हो गया था।

फिर सुलैमान पीतल की एक ऊँची चौकी पर खड़े हुए, सबके देखते हुए घुटने टेके, और अपने हाथ आकाश की ओर फैलाकर प्रार्थना करने लगे। यह प्रार्थना बहुत लंबी है, लेकिन इसका एक दिल छूने वाला मोड़ है। सुलैमान खुद पूछते हैं, "क्या परमेश्वर सचमुच मनुष्यों के संग पृथ्वी पर वास करेंगे? स्वर्ग में भी वे नहीं समाते, फिर इस भवन में कैसे समाएँगे?" यह बहुत बड़ी बात है। सुलैमान जानते थे कि परमेश्वर इतने बड़े हैं कि कोई इमारत उन्हें समा नहीं सकती। फिर भी वे विनती करते हैं कि परमेश्वर की आँखें और कान इस स्थान की ओर खुले रहें, ताकि जब लोग यहाँ से प्रार्थना करें, स्वर्ग से उनकी सुनी जाए।

इसके बाद सुलैमान हर तरह की परिस्थिति के लिए प्रार्थना करते हैं। जब कोई पाप करे और शपथ खाए, जब प्रजा युद्ध में हार जाए, जब बारिश रुक जाए, जब अकाल या बीमारी आए, जब कोई परदेशी दूर से आकर प्रार्थना करे, और यहाँ तक कि जब लोग बँधुआई में, यानी बंदी बनाकर दूसरे देश में ले जाए जाएँ। हर बार सुलैमान एक ही बात कहते हैं, कि परमेश्वर स्वर्ग से सुन लें और क्षमा करें।

इसका क्या मतलब है?

यह प्रार्थना इस बात को दिखाती है कि सुलैमान परमेश्वर को कितनी अच्छी तरह जानते थे। वे जानते थे कि इस्राएल के लोग पूरी तरह से सही नहीं रहेंगे। सुलैमान खुद कहते हैं, "निष्पाप तो कोई मनुष्य नहीं है।" यानी कोई भी बिना पाप के नहीं है, यहाँ तक कि सबसे अच्छे लोग भी गलती करेंगे। इसलिए सुलैमान पहले से ही परमेश्वर से विनती कर रहे हैं कि जब लोग गिरें, जब वे गलत रास्ते पर चलें और फिर पछताएँ, तब परमेश्वर उन्हें क्षमा करें।

यह प्रार्थना डर से नहीं, भरोसे से भरी है। सुलैमान जानते थे कि परमेश्वर करुणामय हैं, दयालु हैं, और अपनी वाचा निभाते हैं। वाचा का मतलब है एक पक्का वादा, जो दोनों पक्षों को बांधता है। परमेश्वर ने दाऊद से वाचा बाँधी थी, और अब सुलैमान उस वाचा के भरोसे पर प्रार्थना कर रहे हैं।

बड़ी कहानी से जुड़ाव

यह मंदिर इस बात का चिन्ह था कि परमेश्वर अपनी प्रजा के पास रहना चाहते हैं। पर सुलैमान का सवाल अब भी हमारे मन में गूँजता है, क्या परमेश्वर सचमुच हमारे बीच रह सकते हैं? बहुत बाद में, जब यीशु मसीह इस पृथ्वी पर आए, तो वही हुआ जो इस मंदिर में संभव नहीं था। परमेश्वर स्वयं मनुष्य बनकर हमारे बीच रहने लगे। और यीशु ने अपने बारे में कहा कि वे ही वह स्थान हैं जहाँ परमेश्वर और मनुष्य मिलते हैं। अब हमें प्रार्थना के लिए किसी भवन की ओर मुँह करने की जरूरत नहीं, क्योंकि यीशु के द्वारा हम सीधे परमेश्वर के पास आ सकते हैं।

तुम्हारे लिए

जब तुमसे कोई गलती हो जाए, जब तुम झूठ बोल दो या किसी से बुरा व्यवहार कर बैठो, तो याद रखना कि सुलैमान ने पहले ही परमेश्वर से ऐसी घड़ियों के लिए विनती कर ली थी। परमेश्वर क्षमा करने के लिए तैयार रहते हैं, बशर्ते तुम सच्चे मन से उनकी ओर फिरो। यह सोचकर देखो, तुम्हें प्रार्थना करने के लिए किसी खास इमारत की जरूरत नहीं, क्योंकि परमेश्वर हर जगह तुम्हारी सुनते हैं।

बातचीत के लिए

सुलैमान कहते हैं कि परमेश्वर स्वर्ग में भी नहीं समाते। फिर भी वे चाहते थे कि परमेश्वर मंदिर में खास तरीके से मौजूद रहें। क्या तुम्हें लगता है कि यह बात समझना मुश्किल है, और क्यों?

सुलैमान हर तरह की मुसीबत के बारे में पहले से प्रार्थना करते हैं, जैसे अकाल, युद्ध, बीमारी। क्या तुम कभी ऐसी किसी बात के लिए पहले से प्रार्थना करते हो, जो अभी हुई भी नहीं है?

साथ में प्रार्थना

हे प्रभु परमेश्वर, आप इतने महान हैं कि पूरा आकाश भी आपको समा नहीं सकता, फिर भी आप हमारी छोटी सी प्रार्थना सुनने के लिए झुकते हैं। धन्यवाद कि यीशु मसीह के द्वारा हम बिना डरे आपके पास आ सकते हैं। जब हम गलती करें, तो हमें याद दिलाइए कि आपकी ओर फिरना कभी व्यर्थ नहीं जाता। आमीन।

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2 इतिहास 6 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

2 इतिहास 6 किस विषय में है?
सुलैमान ने यरूशलेम में एक भवन बनाया है, जिसे हम मंदिर कहते हैं। यह कोई साधारण इमारत नहीं थी। यह वह जगह थी जहाँ परमेश्वर अपनी प्रजा इस्राएल के बीच अपना नाम रखना चाहते थे। जब भवन बनकर तैयार हुआ, तो सुलैमान पूरी सभा के सामने खड़े हुए और सबसे पहले परमेश्वर की प्रशंसा की। उन्होंने याद दिलाया कि परमेश्वर ने उनके पिता दाऊद से एक वचन दिया था, एक वादा, कि दाऊद का पुत्र यह भवन बनाएगा। और अब वह वादा पूरा हो गया था।
2 इतिहास 6 क्या कहता है?
इसके बाद सुलैमान हर तरह की परिस्थिति के लिए प्रार्थना करते हैं। जब कोई पाप करे और शपथ खाए, जब प्रजा युद्ध में हार जाए, जब बारिश रुक जाए, जब अकाल या बीमारी आए, जब कोई परदेशी दूर से आकर प्रार्थना करे, और यहाँ तक कि जब लोग बँधुआई में, यानी बंदी बनाकर दूसरे देश में ले जाए जाएँ। हर बार सुलैमान एक ही बात कहते हैं, कि परमेश्वर स्वर्ग से सुन लें और क्षमा करें।
2 इतिहास 6 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह प्रार्थना डर से नहीं, भरोसे से भरी है। सुलैमान जानते थे कि परमेश्वर करुणामय हैं, दयालु हैं, और अपनी वाचा निभाते हैं। वाचा का मतलब है एक पक्का वादा, जो दोनों पक्षों को बांधता है। परमेश्वर ने दाऊद से वाचा बाँधी थी, और अब सुलैमान उस वाचा के भरोसे पर प्रार्थना कर रहे हैं।
बच्चे 2 इतिहास 6 से क्या सीख सकते हैं?
जब तुमसे कोई गलती हो जाए, जब तुम झूठ बोल दो या किसी से बुरा व्यवहार कर बैठो, तो याद रखना कि सुलैमान ने पहले ही परमेश्वर से ऐसी घड़ियों के लिए विनती कर ली थी। परमेश्वर क्षमा करने के लिए तैयार रहते हैं, बशर्ते तुम सच्चे मन से उनकी ओर फिरो। यह सोचकर देखो, तुम्हें प्रार्थना करने के लिए किसी खास इमारत की जरूरत नहीं, क्योंकि परमेश्वर हर जगह तुम्हारी सुनते हैं।
2 इतिहास 6 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
सुलैमान हर तरह की मुसीबत के बारे में पहले से प्रार्थना करते हैं, जैसे अकाल, युद्ध, बीमारी। क्या तुम कभी ऐसी किसी बात के लिए पहले से प्रार्थना करते हो, जो अभी हुई भी नहीं है?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

सुलैमान ने पीतल का मंच इसलिए बनवाया कि सब उसे देख सकें, और फिर उसी ऊँचाई पर चढ़कर उसने घुटने टेक दिए। "उसी पर वह खड़ा हुआ; और सारी इस्राएली सभा के सामने घुटने टेककर स्वर्ग की ओर हाथ फैलाए हुए।" राजा ने ऊँचाई का इस्तेमाल झुकने के लिए किया। तुझे जो जगह, जो पद, जो नाम मिला है, क्या वह भी तेरे झुकने को दिखाने के काम आता है? या तू उस पर सिर्फ खड़ा रहता है?

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