7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

3 यूहन्ना 1

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

यह चिट्ठी बहुत छोटी है। पूरी बाइबल में शायद सबसे छोटी चिट्ठियों में से एक। इसे प्रेरित यूहन्ना ने लिखा था, जब वे बूढ़े हो चुके थे। इसलिए वे खुद को "प्राचीन" कहते हैं। यह चिट्ठी उन्होंने अपने प्रिय दोस्त गयुस को भेजी।

यूहन्ना गयुस से बहुत प्यार करते हैं। वे लिखते हैं कि उनकी प्रार्थना है कि गयुस भला-चंगा रहे और हर बात में उन्नति करे, जैसे वह पहले से ही आत्मा में उन्नति कर रहा है। यह सुंदर है, क्योंकि यूहन्ना सिर्फ आत्मिक बातों की चिंता नहीं करते, बल्कि गयुस के शरीर की सेहत की भी।

कुछ भाई यूहन्ना के पास आए और बताया कि गयुस "सत्य पर चलता है"। इसका मतलब है: वह वैसे ही जीता है जैसे यीशु मसीह चाहते हैं। यह सुनकर यूहन्ना बहुत खुश हो जाते हैं। वे कहते हैं कि इससे बड़ी और कोई खुशी नहीं कि उनके "बच्चे" (यानी वे विश्वासी जिन्हें उन्होंने सिखाया है) सत्य पर चल रहे हैं।

फिर यूहन्ना एक खास बात की तारीफ करते हैं: गयुस मुसाफिर विश्वासियों का, यहाँ तक कि अजनबियों का भी, स्वागत करता है। उन दिनों प्रचारक भाई गाँव-गाँव जाकर यीशु के बारे में बताते थे। उनके पास होटल नहीं थे। वे अन्यजातियों से पैसे भी नहीं लेते थे। इसलिए उन्हें विश्वासियों के घरों में रहना पड़ता था। गयुस उन्हें प्यार से रखता, खिलाता, और आगे की यात्रा के लिए मदद देता।

लेकिन फिर एक दुखद बात आती है। कलीसिया में एक आदमी है, दियुत्रिफेस। वह "बड़ा बनना" चाहता है। वह यूहन्ना की भी नहीं सुनता, और यूहन्ना के बारे में बुरी बातें फैलाता है। इतना ही नहीं, वह उन प्रचारक भाइयों को भी अपने घर में नहीं आने देता, और जो लोग उनका स्वागत करना चाहते हैं, उन्हें भी मना करता है, और कलीसिया से निकाल देता है।

फिर यूहन्ना एक और आदमी का नाम लेते हैं: दिमेत्रियुस। वह अच्छा है, सब उसकी अच्छी गवाही देते हैं। शायद वही यह चिट्ठी गयुस तक ले जा रहा है।

अंत में यूहन्ना कहते हैं कि उन्हें बहुत कुछ लिखना था, पर वे स्याही और कलम से नहीं लिखेंगे। वे जल्दी ही खुद आकर आमने-सामने बात करेंगे। वे शांति की शुभकामना देते हैं, और सारे मित्रों की तरफ से नमस्कार कहलाते हैं।

इसका क्या मतलब है?

इस छोटी चिट्ठी में तीन लोग हैं। गयुस, जो अच्छा है। दियुत्रिफेस, जो बड़ा बनना चाहता है। और दिमेत्रियुस, जिसकी अच्छी गवाही है। यूहन्ना दिखाते हैं कि कलीसिया में हर तरह के लोग होते हैं, और यह हमेशा से ऐसा ही रहा है।

सबसे जरूरी बात यूहन्ना पद 11 में कहते हैं: "बुराई के नहीं, पर भलाई के अनुयायी हो।" जो भलाई करता है, वह परमेश्वर की तरफ से है। "सत्य पर चलना" का मतलब सिर्फ सही बातें मानना नहीं है। इसका मतलब है सही तरीके से जीना, दूसरों से प्यार करना, और मेहमानों की सेवा करना।

पूरी कहानी से जोड़

यीशु ने खुद कहा था, "मैं ही मार्ग, सत्य और जीवन हूँ।" इसलिए "सत्य पर चलना" असल में यीशु के पीछे-पीछे चलना है। और यीशु ने खुद क्या किया? उन्होंने अजनबियों का स्वागत किया, बीमारों को छुआ, भूखों को खिलाया। गयुस उसी रास्ते पर चल रहा है।

दियुत्रिफेस दूसरा रास्ता चुनता है, बड़ा बनने का रास्ता। पर यीशु ने कहा था कि जो पहला बनना चाहे, वह सब का सेवक बने। परमेश्वर की दुनिया उल्टी है, वहाँ सेवा करने वाला बड़ा होता है।

तुम्हारे लिए

सोचो, अगर यूहन्ना तुम्हारे बारे में चिट्ठी लिखते, तो क्या लिखते? क्या वे कहते कि तुम गयुस जैसे हो, कि दियुत्रिफेस जैसे?

गयुस जैसा होना बड़ी बात करके नहीं होता। यह छोटी-छोटी बातों में होता है। नए बच्चे का स्कूल में स्वागत करना। किसी अजनबी को दोस्त बनाना। घर में मेहमान आए तो खुशी से मदद करना। जो प्रचारक या पास्टर तुम्हारे यहाँ आते हैं, उनका आदर करना।

और दियुत्रिफेस से एक चीज़ सीखो, कि "बड़ा बनने" की चाह खतरनाक है। कभी-कभी हम भी दोस्तों में सबसे आगे, सबसे खास बनना चाहते हैं। तब हम दूसरों को छोटा दिखाने लगते हैं। पद 11 याद रखो, भलाई के पीछे चलो, बुराई के नहीं।

बात करो

अगर यूहन्ना आज तुम्हारी कलीसिया या तुम्हारे घर के बारे में एक छोटी चिट्ठी लिखते, तो उसमें क्या अच्छी और क्या मुश्किल बातें होतीं?

दियुत्रिफेस बड़ा बनना चाहता था। क्या तुम्हें कभी लगता है कि तुम भी बड़ा दिखना चाहते हो? ऐसा कब होता है?

मिलकर प्रार्थना

हे परमेश्वर, हमें गयुस जैसा दिल दीजिए, जो दूसरों का स्वागत करे और सत्य पर चले। हमें बड़ा बनने की चाह से बचाइए। हम यीशु के पीछे चलना चाहते हैं, जो सबसे बड़े होकर भी सबके सेवक बने। आमीन।

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3 यूहन्ना 1 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

3 यूहन्ना 1 किस विषय में है?
यह चिट्ठी बहुत छोटी है। पूरी बाइबल में शायद सबसे छोटी चिट्ठियों में से एक। इसे प्रेरित यूहन्ना ने लिखा था, जब वे बूढ़े हो चुके थे। इसलिए वे खुद को "प्राचीन" कहते हैं। यह चिट्ठी उन्होंने अपने प्रिय दोस्त गयुस को भेजी।
3 यूहन्ना 1 क्या कहता है?
लेकिन फिर एक दुखद बात आती है। कलीसिया में एक आदमी है, दियुत्रिफेस। वह "बड़ा बनना" चाहता है। वह यूहन्ना की भी नहीं सुनता, और यूहन्ना के बारे में बुरी बातें फैलाता है। इतना ही नहीं, वह उन प्रचारक भाइयों को भी अपने घर में नहीं आने देता, और जो लोग उनका स्वागत करना चाहते हैं, उन्हें भी मना करता है, और कलीसिया से निकाल देता है।
3 यूहन्ना 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
सबसे जरूरी बात यूहन्ना पद 11 में कहते हैं: "बुराई के नहीं, पर भलाई के अनुयायी हो।" जो भलाई करता है, वह परमेश्वर की तरफ से है। "सत्य पर चलना" का मतलब सिर्फ सही बातें मानना नहीं है। इसका मतलब है सही तरीके से जीना, दूसरों से प्यार करना, और मेहमानों की सेवा करना।
बच्चे 3 यूहन्ना 1 से क्या सीख सकते हैं?
गयुस जैसा होना बड़ी बात करके नहीं होता। यह छोटी-छोटी बातों में होता है। नए बच्चे का स्कूल में स्वागत करना। किसी अजनबी को दोस्त बनाना। घर में मेहमान आए तो खुशी से मदद करना। जो प्रचारक या पास्टर तुम्हारे यहाँ आते हैं, उनका आदर करना।
3 यूहन्ना 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
हे परमेश्वर, हमें गयुस जैसा दिल दीजिए, जो दूसरों का स्वागत करे और सत्य पर चले। हमें बड़ा बनने की चाह से बचाइए। हम यीशु के पीछे चलना चाहते हैं, जो सबसे बड़े होकर भी सबके सेवक बने। आमीन।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 6

गयुस ने जिन यात्रियों को अपने घर ठहराया, वे अजनबी थे। पर लौटकर उन्होंने कलीसिया के बीच कहा: "उन्होंने कलीसिया के सामने तेरे प्रेम की गवाही दी।" सोच, तेरे बारे में कौन ऐसी गवाही दे सकता है? और यूहन्ना यहीं नहीं रुकता, वह कहता है उन्हें आगे की यात्रा के लिए भी भेज, परमेश्वर के योग्य रीति से। प्रेम सिर्फ दरवाज़ा खोलना नहीं, आगे की राह का खर्च उठाना भी है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

मुझ प्राचीन की ओर से उस प्रिय गयुस के नाम, जिससे मैं सच्चा प्रेम रखता हूँ।" यूहन्ना अपना नाम तक नहीं लिखता, पर गयुस का नाम लिखता है। बूढ़ा प्रेरित एक साधारण विश्वासी को "प्रिय" कहकर पुकारता है। सोचो, क्या तुम्हारे जीवन में कोई ऐसा है जिसका नाम तुम परमेश्वर के सामने प्रेम से लेते हो? सच्चा प्रेम हमेशा किसी चेहरे का, किसी नाम का होता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

वहाँ के मित्रों के नाम ले लेकर नमस्कार कह देना।" यूहन्ना पूरी कलीसिया को एक झुंड की तरह नहीं देखता। हर एक का नाम है, और वह चाहता है कि नाम लेकर ही अभिवादन पहुँचे। सोच, तेरी मंडली में कितने चेहरे तू पहचानता है पर नाम नहीं जानता? प्रेम भीड़ से नहीं, नाम से शुरू होता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

यूहन्ना गयुस के लिए लिखता है, "हे प्रिय, मेरी यह प्रार्थना है, कि जैसे तू आत्मिक उन्नति कर रहा है, वैसे ही तू सब बातों में उन्नति करे, और स्वस्थ रहे।" गौर कर, यहाँ नापने का पैमाना आत्मा है, शरीर नहीं। गयुस की आत्मा इतनी स्वस्थ थी कि उसी के बराबर सेहत माँगना आशीष थी। तेरे लिए भी यही प्रार्थना हो, तो क्या माँगी जाएगी?

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