यहेजकेल 41
प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
एक आदमी यहेजकेल को एक बड़े, शानदार भवन के पास ले गया। यह परमेश्वर का मन्दिर था। उस आदमी के हाथ में एक नापने वाला बाँस था। उसने हर दीवार, हर द्वार, हर कमरा बहुत ध्यान से नापा। खम्भे छः हाथ चौड़े थे। द्वार दस हाथ चौड़ा था। मन्दिर चालीस हाथ लम्बा और बीस हाथ चौड़ा था।
फिर वे एक भीतरी कमरे में गए। वह आदमी रुका और बोला, "यह तो परमपवित्र स्थान है।" यहेजकेल का दिल धड़क उठा होगा। यह वह जगह थी जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति रहती थी। कोई भी वहाँ ऐसे ही नहीं चला जा सकता था।
मन्दिर के चारों ओर छोटे-छोटे कमरे बने थे, तीन मंजिलों में। जैसे-जैसे ऊपर जाओ, कमरे थोड़े चौड़े होते गए। लोग सीढ़ियों से एक मंजिल से दूसरी मंजिल चढ़ सकते थे। दीवारें मोटी और मजबूत थीं, जैसे किसी किले की दीवारें।
फिर एक आश्चर्यजनक बात हुई। दीवारों पर करूब खुदे हुए थे। करूब स्वर्गदूतों जैसे प्राणी हैं, जो परमेश्वर के पास रहते हैं। हर करूब के दो मुख थे, एक मनुष्य का और एक जवान सिंह का। उनके बीच-बीच में खजूर के पेड़ खुदे हुए थे। सोचो, पूरी दीवार पर, फर्श से छत तक, ये खूबसूरत आकृतियाँ बनी थीं। द्वारों के किवाड़ों पर भी यही करूब और खजूर के पेड़ खुदे थे।
एक लकड़ी की मेज भी थी, तीन हाथ ऊँची। उस आदमी ने कहा, "यह तो यहोवा के सम्मुख की मेज है।" यह परमेश्वर के सामने रखी एक खास मेज थी।
इसका क्या अर्थ है?
क्या तुमने कभी सोचा है, कोई इतनी मेहनत से एक घर क्यों नापेगा? क्योंकि यह घर साधारण नहीं था। यह परमेश्वर का घर था। हर नाप, हर नक्काशी दिखाती थी: परमेश्वर कोई मामूली राजा नहीं हैं। वे पवित्र हैं, महान हैं, और उनके घर में हर चीज़ ध्यान से, प्रेम से बनाई गई थी।
करूबों की तस्वीरें डर पैदा नहीं करती थीं, बल्कि यह याद दिलाती थीं कि स्वर्ग का एक हिस्सा यहाँ धरती पर उतर आया है। परमेश्वर अपने लोगों के बीच रहना चाहते थे, पर उनकी पवित्रता के कारण सब कुछ व्यवस्थित और सावधानी से होना ज़रूरी था।
सांझा सूत्र
यह मन्दिर एक तस्वीर थी, एक बड़ी बात की ओर इशारा। बाद में यीशु मसीह आए, और उन्होंने कहा कि उनका शरीर ही असली मन्दिर है। अब हमें पत्थर और लकड़ी के भवन में जाने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर हमारे पास आ गए हैं। जो लोग यीशु मसीह पर भरोसा करते हैं, पवित्र आत्मा अब उनके ही दिल में रहते हैं। हम खुद परमेश्वर का मन्दिर बन जाते हैं, कोई नक्काशीदार करूब नहीं, पर असली जीते-जागते लोग जिनमें परमेश्वर रहते हैं।
तुम्हारे लिए
तुम्हारा शरीर और दिल परमेश्वर के लिए एक खास जगह है, जैसे वह मन्दिर खास था। जब तुम सच बोलते हो, किसी की मदद करते हो, या प्रार्थना करते हो, तब तुम परमेश्वर को अपने भीतर जगह देते हो। आज किसी एक छोटे काम से दिखाओ कि तुम्हारे भीतर परमेश्वर रहते हैं, शायद अपने छोटे भाई या बहन के साथ धीरज रखकर।
बात करें
क्या तुम्हें लगता है परमेश्वर का घर इतना सुंदर और सावधानी से क्यों बनाया गया था?
अगर तुम्हारा दिल परमेश्वर का घर है, तो तुम उसे कैसे साफ और सुंदर रख सकते हो?
संग साथ प्रार्थना
प्रभु परमेश्वर, धन्यवाद कि आप इतने महान और पवित्र हैं, फिर भी आप हमारे पास आना चाहते हैं। यीशु मसीह के द्वारा हमारे दिल में आइए और हमें अपना घर बनाइए। आमीन।
यहेजकेल 41 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
यहेजकेल 41 किस विषय में है?
यहेजकेल 41 क्या कहता है?
यहेजकेल 41 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे यहेजकेल 41 से क्या सीख सकते हैं?
यहेजकेल 41 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
मन्दिर और पवित्रस्थान के दो-दो किवाड़ थे।" इस लम्बी नापजोख के बीच परमेश्वर किवाड़ों का भी ज़िक्र करता है। किवाड़ दो काम करते हैं, वे भीतर आने देते हैं और वे रोकते भी हैं। पवित्रता कोई ठंडी दीवार नहीं, वह एक द्वार है। सोचो, तुम्हारे जीवन में कौन सा किवाड़ है जिसे खोलने से तुम डरते हो, और क्या वह ठीक वही जगह है जहाँ परमेश्वर खड़ा है?
भवन का पूर्व की ओर का सामना और आँगन सौ हाथ चौड़ा था।" सुनने में यह सिर्फ नाप है। पर जो लोग बंधुआई में बैठे थे, उनके लिए हर हाथ एक वादा था। परमेश्वर उसी की नाप लेता है जिसे वह सचमुच बनाने वाला है। और पूर्व की ओर, जहाँ से सूरज उगता है, वहीं से उसका तेज लौटकर आया। तेरे टूटे हुए हिस्से को भी वह नाप रहा है।
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