7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

इब्रानियों 12

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

इब्रानियों की पत्री लिखनेवाला एक तस्वीर बनाता है। सोचो, एक बड़ा खेल का मैदान है, और चारों तरफ की सीढ़ियों पर बहुत सारे लोग बैठे हैं, जो पहले ही विश्वास की दौड़ दौड़ चुके हैं। लेखक कहता है कि "गवाहों का ऐसा बड़ा बादल" हमें घेरे हुए है। ये वे लोग हैं जो पहले परमेश्वर पर भरोसा करते हुए जी चुके हैं। अब वे हमें देख रहे हैं, मानो हमें हिम्मत दे रहे हों।

फिर लेखक कहता है, चलो हर उस चीज़ को उतार दें जो हमें रोकती है, और पाप को भी, जो हमें उलझा देता है, जैसे कोई कपड़ा दौड़ते समय पैरों में फँस जाए। हमें धीरज से दौड़ना है, यीशु की ओर देखते हुए। यीशु ने क्रूस का दुःख सहा, लज्जा की परवाह न करके, क्योंकि उसके आगे आनन्द रखा हुआ था। अब वे परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठे हैं।

इसके बाद लेखक एक कठिन विषय पर आता है, अनुशासन का। वह कहता है कि प्रभु जिससे प्रेम करते हैं, उसे अनुशासित भी करते हैं, जैसे एक पिता अपने बेटे को। यह सुनने में अच्छा नहीं लगता, लेखक खुद मानता है कि अनुशासन उस समय आनन्द की नहीं, दुःख की बात लगती है। पर बाद में, जो इसे सहते हैं, उन्हें चैन और धार्मिकता का फल मिलता है।

फिर एक चेतावनी आती है, एसाव के बारे में, जिसने एक बार के भोजन के बदले अपना पहलौठे होने का अधिकार बेच दिया। बाद में वह पछताया, पर अवसर वापस नहीं मिला।

आखिर में लेखक दो पहाड़ों की तुलना करता है। एक है सीनै पहाड़, जहाँ धुआँ, आग, और डरावनी गड़गड़ाहट थी, और लोग इतने डर गए थे कि उन्होंने कहा, अब परमेश्वर हमसे बात न करें। दूसरा है सिय्योन पहाड़, स्वर्गीय यरूशलेम, जहाँ अनगिनत स्वर्गदूत, और यीशु मसीह हैं, जो नई वाचा के मध्यस्थ हैं, यानी परमेश्वर और इंसानों के बीच का सेतु।

इसका क्या मतलब है?

यह अध्याय हमें बताता है कि विश्वास की ज़िंदगी एक दौड़ की तरह है, जो लंबी है और जिसमें थकान भी आती है। पर हम अकेले नहीं दौड़ते। पहले के विश्वासियों की भीड़ हमें घेरे हुए है, और सबसे बढ़कर, यीशु खुद हमारे आगे दौड़ चुके हैं।

अनुशासन का हिस्सा समझना मुश्किल है। कोई भी सज़ा या सुधार को पसंद नहीं करता। पर लेखक कहता है कि यह दिखाता है कि परमेश्वर हमें अपना बच्चा मानते हैं, पराया नहीं। एक अच्छा पिता अपने बच्चे को यूँ ही नहीं छोड़ देता। सच पूछो तो यह सवाल खुला रहता है, हर दुःख अनुशासन नहीं होता, बाइबल खुद यह नहीं कहती कि हर कठिन चीज़ परमेश्वर की सज़ा है। पर यहाँ लेखक यह कह रहा है कि जब परमेश्वर हमें सुधारते हैं, तो वह प्रेम से करते हैं, नफरत से नहीं।

सूत्र

यह पूरा अध्याय यीशु की ओर इशारा करता है। वे "विश्वास के कर्ता और सिद्ध करनेवाले" हैं, यानी जिन्होंने विश्वास की राह शुरू की और पूरी भी की। सीनै पहाड़ पर लोग डर के मारे परमेश्वर से दूर भागे, पर यीशु के ज़रिए हम सिय्योन पहाड़ के पास, परमेश्वर के पास, बिना डरे आ सकते हैं। उनका खून, जो क्रूस पर बहा, हाबिल के खून से भी बेहतर बात कहता है, वह माफी और नई वाचा, यानी परमेश्वर का नया वादा, लेकर आता है।

तुम्हारे लिए

शायद तुम्हें भी कभी लगता हो कि घर में या स्कूल में सुधारे जाना अन्यायी है। यह अध्याय कहता है कि अनुशासन, अगर प्रेम से दिया जाए, तुम्हें बुरा नहीं बल्कि मज़बूत बनाने के लिए है। अगली बार जब कोई सुधार तुम्हें कड़वा लगे, याद रखना कि परमेश्वर भी अपने बच्चों के साथ ऐसा ही करते हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि तुम उनकी भलाई में हिस्सा पाओ। और जब दौड़ते-दौड़ते थकान लगे, याद रखो, यीशु की ओर देखो, और वे लोग जो पहले दौड़ चुके हैं, तुम्हें हिम्मत देने के लिए वहाँ हैं।

बात करो

क्या तुम्हें लगता है कि हर सुधार प्रेम से आता है? या कभी-कभी यह सिर्फ गुस्से से भी आ सकता है?

एसाव ने एक पल के फायदे के लिए बड़ी चीज़ खो दी। क्या तुम्हारी ज़िंदगी में ऐसी कोई चीज़ है जिसे तुम जल्दी से छोड़ देते हो, जो असल में कीमती है?

साथ में प्रार्थना

प्रभु यीशु, धन्यवाद कि आपने हमारे लिए दौड़ पूरी की। जब हमारी हिम्मत टूटने लगे, हमें अपनी ओर देखने में मदद करें। जब हमें सुधारा जाए, तो हमें यह समझने में मदद करें कि यह आपके प्रेम से आता है। हमें अपने पास, बिना डरे, आने की शक्ति दें। आमीन।

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इब्रानियों 12 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

इब्रानियों 12 किस विषय में है?
इब्रानियों की पत्री लिखनेवाला एक तस्वीर बनाता है। सोचो, एक बड़ा खेल का मैदान है, और चारों तरफ की सीढ़ियों पर बहुत सारे लोग बैठे हैं, जो पहले ही विश्वास की दौड़ दौड़ चुके हैं। लेखक कहता है कि "गवाहों का ऐसा बड़ा बादल" हमें घेरे हुए है। ये वे लोग हैं जो पहले परमेश्वर पर भरोसा करते हुए जी चुके हैं। अब वे हमें देख रहे हैं, मानो हमें हिम्मत दे रहे हों।
इब्रानियों 12 क्या कहता है?
इसके बाद लेखक एक कठिन विषय पर आता है, अनुशासन का। वह कहता है कि प्रभु जिससे प्रेम करते हैं, उसे अनुशासित भी करते हैं, जैसे एक पिता अपने बेटे को। यह सुनने में अच्छा नहीं लगता, लेखक खुद मानता है कि अनुशासन उस समय आनन्द की नहीं, दुःख की बात लगती है। पर बाद में, जो इसे सहते हैं, उन्हें चैन और धार्मिकता का फल मिलता है।
इब्रानियों 12 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
आखिर में लेखक दो पहाड़ों की तुलना करता है। एक है सीनै पहाड़, जहाँ धुआँ, आग, और डरावनी गड़गड़ाहट थी, और लोग इतने डर गए थे कि उन्होंने कहा, अब परमेश्वर हमसे बात न करें। दूसरा है सिय्योन पहाड़, स्वर्गीय यरूशलेम, जहाँ अनगिनत स्वर्गदूत, और यीशु मसीह हैं, जो नई वाचा के मध्यस्थ हैं, यानी परमेश्वर और इंसानों के बीच का सेतु।
बच्चे इब्रानियों 12 से क्या सीख सकते हैं?
अनुशासन का हिस्सा समझना मुश्किल है। कोई भी सज़ा या सुधार को पसंद नहीं करता। पर लेखक कहता है कि यह दिखाता है कि परमेश्वर हमें अपना बच्चा मानते हैं, पराया नहीं। एक अच्छा पिता अपने बच्चे को यूँ ही नहीं छोड़ देता। सच पूछो तो यह सवाल खुला रहता है, हर दुःख अनुशासन नहीं होता, बाइबल खुद यह नहीं कहती कि हर कठिन चीज़ परमेश्वर की सज़ा है। पर यहाँ लेखक यह कह रहा है कि जब परमेश्वर हमें सुधारते हैं, तो वह प्रेम से करते हैं, नफरत से नहीं।
इब्रानियों 12 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
शायद तुम्हें भी कभी लगता हो कि घर में या स्कूल में सुधारे जाना अन्यायी है। यह अध्याय कहता है कि अनुशासन, अगर प्रेम से दिया जाए, तुम्हें बुरा नहीं बल्कि मज़बूत बनाने के लिए है। अगली बार जब कोई सुधार तुम्हें कड़वा लगे, याद रखना कि परमेश्वर भी अपने बच्चों के साथ ऐसा ही करते हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि तुम उनकी भलाई में हिस्सा पाओ। और जब दौड़ते-दौड़ते थकान लगे, याद रखो, यीशु की ओर देखो, और वे लोग जो पहले दौड़ चुके हैं, तुम्हें हिम्मत देने के लिए वहाँ हैं।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 23

जब तू रविवार को थके मन से बैठता है, तुझे लगता है कि कमरे में बस कुछ ही लोग हैं। पर लिखा है, "जिनके नाम स्वर्ग में लिखे हुए हैं।" तेरा नाम किसी रजिस्टर में नहीं, स्वर्ग में दर्ज है। और जो विश्वासी तुझसे पहले चले गए, वे मिट नहीं गए, वे "सिद्ध किए हुए धर्मियों की आत्माएँ" हैं, पूरे किए गए। तू उसी सभा का हिस्सा है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

क्या आत्माओं के पिता के और भी अधीन न रहें जिससे जीवित रहें?" ध्यान दे, यहाँ सवाल यह नहीं कि परमेश्वर ताड़ना क्यों देता है, बल्कि यह कि तू किसके हाथ में है। पिता का हाथ मारता नहीं, थामता है। जो चोट आज तुझे तोड़ती लग रही है, वही तुझे जीवन की ओर मोड़ रही है। अधीन होना हार नहीं, जीने का रास्ता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

और अपने पाँवों के लिये सीधे मार्ग बनाओ, कि लँगड़ा भटक न जाए, वरन् चंगा हो जाए।" ध्यान दो, बात सिर्फ तुम्हारे चलने की नहीं है। तुम्हारे पीछे कोई लँगड़ाता हुआ आ रहा है, और वह तुम्हारे बनाए रास्ते पर पाँव रखेगा। तुम्हारी टेढ़ी चाल किसी और की चोट गहरी कर सकती है। आज तुम्हारे पीछे कौन चल रहा है?

किसी अन्य आयु वर्ग की तलाश है?

हमारे पास छोटे बच्चों (3-6 वर्ष) और किशोरों (12 वर्ष और अधिक) के लिए विशेष संस्करण भी हैं।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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