7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

फिलिप्पियों 1

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस एक जेल में बंद है। उसके हाथों में जंजीरें हैं। पर जब वह फिलिप्पी के मसीही भाई-बहनों को चिट्ठी लिखता है, तो वह उदास नहीं है। वह लिखता है, "जब जब तुम्हें स्मरण करता हूँ, तब-तब अपने परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ।" सोचो, एक कैदी धन्यवाद कर रहा है!

पौलुस उन्हें याद करता है क्योंकि वे शुरू से ही उसके साथ सुसमाचार फैलाने में जुटे रहे। वह कहता है, परमेश्वर ने तुम्हारे भीतर जो अच्छा काम शुरू किया है, वे उसे ज़रूर पूरा करेंगे। यह ऐसा है जैसे कोई माली एक पौधा लगाए और कहे, "मैं इसे बड़ा होते देखूँगा, मैं इसे छोड़ूँगा नहीं।"

फिर पौलुस एक चौंकाने वाली बात बताता है। उसकी कैद ने सुसमाचार को रोका नहीं, बल्कि उसे फैलाया है! राजा के महल के सैनिकों को भी पता चल गया कि वह मसीह के लिए कैद है। कुछ भाई इससे साहस पाकर बेधड़क परमेश्वर का वचन सुनाने लगे।

पर सब कुछ अच्छा नहीं है। कुछ लोग जलन और झगड़े के कारण मसीह का प्रचार करते हैं, ताकि पौलुस को और दुःख दें। यह सुनकर हमें अजीब लगता है, है ना? कि दुश्मन जैसे लोग भी मसीह की बात सुनाएँ, पर बुरे इरादे से? पौलुस क्या करता है? वह गुस्सा नहीं होता। वह कहता है, "मसीह की कथा सुनाई जाती है, और मैं इससे आनन्दित हूँ।"

पौलुस को नहीं पता वह जीवित रहेगा या मर जाएगा। वह लिखता है, "मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है।" वह दोनों के बीच फंसा हुआ महसूस करता है, पर अंत में वह भरोसा रखता है कि वह जीवित रहेगा, ताकि फिलिप्पी के लोगों की मदद कर सके।

आखिर में वह उन्हें एक बात कहता है: डरो मत, चाहे विरोधी तुम्हें डराएँ। दृढ़ खड़े रहो, एक मन होकर सुसमाचार के लिए मिलकर काम करो।

इसका अर्थ क्या है?

यह पत्र हमें दिखाता है कि परमेश्वर का काम जंजीरों से नहीं रुकता। पौलुस कैद में है, पर उसकी खुशी कैद में नहीं है। उसकी खुशी परमेश्वर में है। कठिन हालात में भी वह भरोसा नहीं खोता, क्योंकि वह जानता है परमेश्वर ने जो काम शुरू किया, वे उसे पूरा करेंगे। यही सन्देश है: परमेश्वर बीच में काम छोड़ते नहीं।

समान सूत्र

पौलुस कहता है, "मेरे लिये जीवित रहना मसीह है।" उसका पूरा जीवन यीशु मसीह के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह याद दिलाता है कि परमेश्वर ने जो अच्छा काम फिलिप्पी के विश्वासियों में शुरू किया, वही काम यीशु मसीह के दिन तक पूरा होगा। यह उस बड़ी कहानी का हिस्सा है, परमेश्वर अपने लोगों को कभी बीच में नहीं छोड़ते, वे शुरू से आखिर तक साथ चलते हैं।

तुम्हारे लिए

जब तुम्हारे साथ कुछ कठिन होता है, स्कूल में कोई तुम्हें तंग करे या तुम बीमार पड़ो, तो याद रखना, परमेश्वर वहाँ भी काम कर सकते हैं। तुम पौलुस की तरह किसी के लिए धन्यवाद की प्रार्थना कर सकते हो, चाहे तुम्हारा दिन कठिन हो। और जब कोई तुमसे बुरा व्यवहार करे, तुम फिर भी दयालु रह सकते हो, जैसे पौलुस ने विरोधियों से भी डर नहीं खाया।

बात करें

अगर तुम पौलुस की जगह कैद में होते, तो क्या तुम भी धन्यवाद की प्रार्थना कर सकते थे?

परमेश्वर ने तुम्हारे भीतर कौन सा अच्छा काम शुरू किया है, जिसे वे पूरा करना चाहते हैं?

साथ में प्रार्थना

प्रिय परमेश्वर, धन्यवाद कि आप हमारा काम बीच में नहीं छोड़ते। जब हमारे लिए दिन कठिन हो, तो हमें पौलुस जैसा भरोसा दीजिए। हमें सिखाइए कि हर हाल में आनन्दित रहना कैसा होता है। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।

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फिलिप्पियों 1 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

फिलिप्पियों 1 किस विषय में है?
पौलुस एक जेल में बंद है। उसके हाथों में जंजीरें हैं। पर जब वह फिलिप्पी के मसीही भाई-बहनों को चिट्ठी लिखता है, तो वह उदास नहीं है। वह लिखता है, "जब जब तुम्हें स्मरण करता हूँ, तब-तब अपने परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ।" सोचो, एक कैदी धन्यवाद कर रहा है!
फिलिप्पियों 1 क्या कहता है?
फिर पौलुस एक चौंकाने वाली बात बताता है। उसकी कैद ने सुसमाचार को रोका नहीं, बल्कि उसे फैलाया है! राजा के महल के सैनिकों को भी पता चल गया कि वह मसीह के लिए कैद है। कुछ भाई इससे साहस पाकर बेधड़क परमेश्वर का वचन सुनाने लगे।
फिलिप्पियों 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
पौलुस को नहीं पता वह जीवित रहेगा या मर जाएगा। वह लिखता है, "मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है।" वह दोनों के बीच फंसा हुआ महसूस करता है, पर अंत में वह भरोसा रखता है कि वह जीवित रहेगा, ताकि फिलिप्पी के लोगों की मदद कर सके।
बच्चे फिलिप्पियों 1 से क्या सीख सकते हैं?
यह पत्र हमें दिखाता है कि परमेश्वर का काम जंजीरों से नहीं रुकता। पौलुस कैद में है, पर उसकी खुशी कैद में नहीं है। उसकी खुशी परमेश्वर में है। कठिन हालात में भी वह भरोसा नहीं खोता, क्योंकि वह जानता है परमेश्वर ने जो काम शुरू किया, वे उसे पूरा करेंगे। यही सन्देश है: परमेश्वर बीच में काम छोड़ते नहीं।
फिलिप्पियों 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
जब तुम्हारे साथ कुछ कठिन होता है, स्कूल में कोई तुम्हें तंग करे या तुम बीमार पड़ो, तो याद रखना, परमेश्वर वहाँ भी काम कर सकते हैं। तुम पौलुस की तरह किसी के लिए धन्यवाद की प्रार्थना कर सकते हो, चाहे तुम्हारा दिन कठिन हो। और जब कोई तुमसे बुरा व्यवहार करे, तुम फिर भी दयालु रह सकते हो, जैसे पौलुस ने विरोधियों से भी डर नहीं खाया।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

कुछ लोग मसीह का प्रचार इसलिए कर रहे थे कि पौलुस की जंजीरों में और दुःख जोड़ें, "पर वे स्वार्थ से मसीह की घोषणा करते हैं, निष्कपटता से नहीं।" सोचो, जेल में बैठे आदमी को अपने ही भाइयों से चोट मिल रही थी। फिर भी पौलुस टूटा नहीं, क्योंकि उसकी खुशी अपने नाम पर नहीं, मसीह के नाम पर टिकी थी। तुम्हारी खुशी किस पर टिकी है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 27

पौलुस जेल में बैठा है, और लिखता है, "चाहे मैं आकर तुम्हें देखूँ, चाहे न आऊँ।" यानी उसकी मौजूदगी उनके खड़े रहने की शर्त नहीं थी। कोई देख रहा हो या न देख रहा हो, चाल-चलन वही रहे।

सोचो, जब कोई आत्मिक सहारा देनेवाला पास नहीं होता, तब तुम्हारा चलना कैसा होता है? वहीं पता चलता है कि सुसमाचार तुम्हारे भीतर कितना गहरा उतरा है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

पौलुस जंजीरों में है, और वह लिखता है: "हे भाइयों, मैं चाहता हूँ कि तुम यह जान लो कि मुझ पर जो बीता है, उससे सुसमाचार ही की उन्नति हुई है।" वह अपनी कैद को रुकावट नहीं, रास्ता कहता है। तेरे जीवन की वह बात जिसे तू सबसे बड़ी बाधा समझता है, क्या हो अगर परमेश्वर उसी से किसी तक पहुँच रहा हो?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

पौलुस की जंजीर उसे रोक नहीं पाई, उलटे वही उसका प्रचार बन गई: "यहाँ तक कि कैसर के राजभवन की सारी पलटन और शेष सब लोगों में यह प्रगट हो गया कि मैं मसीह के लिये कैद हूँ।" जो पहरेदार उससे बंधा था, वही सुसमाचार सुनने वाला पहला व्यक्ति बना। तेरी जो परिस्थिति तुझे बाँधे हुए लगती है, क्या पता वही तेरे आसपास वालों के लिए मसीह को देखने की जगह हो।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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