7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

लूका 4

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

लूका अध्याय 4 की शुरुआत में यीशु यरदन नदी से लौटते हैं, जहाँ वे बपतिस्मा ले चुके हैं। वे पवित्र आत्मा से भरे हुए हैं, यानी परमेश्वर की आत्मा उनके साथ है, उन्हें अगुआई दे रही है। यही आत्मा उन्हें जंगल में ले जाती है। वहाँ चालीस दिन तक शैतान उनकी परीक्षा करता है। यीशु भूखे हैं, कुछ खाया नहीं है। शैतान तीन बार आता है, पहले रोटी बनाने के लिए, फिर सारे राज्यों के अधिकार के लिए, फिर मन्दिर से कूदकर परमेश्वर को परखने के लिए। हर बार यीशु पवित्रशास्त्र से उत्तर देते हैं। शैतान हार मानकर कुछ समय के लिए चला जाता है।

फिर यीशु गलील लौटते हैं और आराधनालयों में उपदेश देते हैं। नासरत में, जहाँ वे बड़े हुए थे, वे यशायाह की पुस्तक पढ़ते हैं। वहाँ लिखा है कि परमेश्वर का आत्मा उस पर है, जो कंगालों को सुसमाचार सुनाएगा, बन्दियों को छुड़ाएगा, अंधों को दृष्टि देगा। यीशु कहते हैं, "आज ही यह लेख तुम्हारे सामने पूरा हुआ है।" लोग पहले चकित होते हैं, फिर गुस्से में आ जाते हैं जब यीशु कहते हैं कि परमेश्वर ने अपने देश से बाहर के लोगों पर भी दया दिखाई है। वे उन्हें पहाड़ की चोटी से नीचे गिराना चाहते हैं, पर यीशु बीच से निकल जाते हैं।

कफरनहूम में यीशु एक अशुद्ध आत्मा से पीड़ित मनुष्य को चंगा करते हैं, शमौन की सास का बुखार उतारते हैं, और शाम को अनेक बीमारों को हाथ रखकर ठीक करते हैं। सुबह वे एकांत में जाते हैं, पर भीड़ उन्हें ढूँढ़ती है। यीशु कहते हैं कि उन्हें और नगरों में भी परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाना है।

इसका क्या अर्थ है?

यह अध्याय दिखाता है कि यीशु मसीह होने का मतलब आसान जीवन नहीं है। भूख, परीक्षा, विरोध, यहाँ तक कि जानलेवा खतरा, यह सब उनके रास्ते में आता है। पर हर बार यीशु परमेश्वर के वचन पर टिके रहते हैं और अपने पिता की इच्छा से नहीं हटते। शैतान झूठ नहीं बोलता, वह सच बातें तोड़-मोड़कर पेश करता है, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है…"। यीशु जानते हैं कि वे कौन हैं, इसलिए उन्हें साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती।

नासरत की घटना कठिन है। अपने ही गाँव के लोग, जो यीशु को बचपन से जानते थे, उन्हें मारने की कोशिश करते हैं। क्यों? क्योंकि यीशु ने कहा कि परमेश्वर की दया केवल उनके लिए नहीं, बल्कि विधवा और नामान जैसे बाहरी लोगों के लिए भी थी। यह सुनना उन्हें अच्छा नहीं लगा।

समान सूत्र

नासरत में यीशु ने यशायाह की भविष्यवाणी पढ़ी, जो परमेश्वर का एक पुराना वायदा था। वायदा यानी परमेश्वर की दी हुई प्रतिज्ञा, जिस पर भरोसा किया जा सकता है। सदियों पहले लिखा गया कि कोई आएगा जो कंगालों, बन्दियों, अंधों के लिए मुक्ति लाएगा। यीशु ने कहा, वह वायदा आज पूरा हुआ है, मुझमें। यही कहानी का केंद्र है, परमेश्वर अपने वायदों को नहीं भूलते, चाहे उन्हें पूरा होने में कितना भी समय लगे। जंगल में यीशु ने भी दिखाया कि वे वैसे नहीं गिरे जैसे आदम और हव्वा गिरे थे। जहाँ पहले इंसान परीक्षा में हार गया, वहाँ यीशु खड़े रहे।

आपके लिए

क्या तुम कभी सोचते हो कि सही काम करना इतना मुश्किल क्यों होता है? यीशु को भी भूख लगी थी, फिर भी उन्होंने आसान रास्ता नहीं चुना। जब कोई तुम्हें कहे "बस थोड़ा सा गलत करने में क्या हर्ज है", तो याद रखना, परमेश्वर का वचन ताकत देता है, ठीक जैसे यीशु के लिए दिया। और यह भी सोचना, क्या तुम कभी किसी को इसलिए नापसंद करते हो क्योंकि परमेश्वर उससे भी प्यार करते हैं, जैसे नासरत के लोगों ने किया? यह सवाल आसान नहीं है, पर पूछने लायक है।

बात करें

यीशु ने शैतान की परीक्षाओं का जवाब पवित्रशास्त्र से दिया। क्या तुम्हें कोई ऐसी बात याद है जो तुम्हें कठिन समय में ताकत देती है?

नासरत के लोग गुस्सा हो गए क्योंकि परमेश्वर की दया दूसरों तक भी पहुँची। तुम्हें क्या लगता है, यह सुनना उनके लिए क्यों कठिन था?

साथ में प्रार्थना

प्रभु यीशु, धन्यवाद कि आप जंगल में भी, विरोध में भी, हमेशा परमेश्वर के वचन पर टिके रहे। हमें भी सिखाइए कि जब हमारी परीक्षा हो, तो हम आप की तरह खड़े रह सकें। हमारी आँखें खोल दीजिए ताकि हम देख सकें कि आपकी दया सबके लिए है, हमारे लिए भी और दूसरों के लिए भी। आमीन।

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लूका 4 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

लूका 4 किस विषय में है?
लूका अध्याय 4 की शुरुआत में यीशु यरदन नदी से लौटते हैं, जहाँ वे बपतिस्मा ले चुके हैं। वे पवित्र आत्मा से भरे हुए हैं, यानी परमेश्वर की आत्मा उनके साथ है, उन्हें अगुआई दे रही है। यही आत्मा उन्हें जंगल में ले जाती है। वहाँ चालीस दिन तक शैतान उनकी परीक्षा करता है। यीशु भूखे हैं, कुछ खाया नहीं है। शैतान तीन बार आता है, पहले रोटी बनाने के लिए, फिर सारे राज्यों के अधिकार के लिए, फिर मन्दिर से कूदकर परमेश्वर को परखने के लिए। हर बार यीशु पवित्रशास्त्र से उत्तर देते हैं। शैतान हार मानकर कुछ समय के लिए चला जाता है।
लूका 4 क्या कहता है?
कफरनहूम में यीशु एक अशुद्ध आत्मा से पीड़ित मनुष्य को चंगा करते हैं, शमौन की सास का बुखार उतारते हैं, और शाम को अनेक बीमारों को हाथ रखकर ठीक करते हैं। सुबह वे एकांत में जाते हैं, पर भीड़ उन्हें ढूँढ़ती है। यीशु कहते हैं कि उन्हें और नगरों में भी परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाना है।
लूका 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
नासरत की घटना कठिन है। अपने ही गाँव के लोग, जो यीशु को बचपन से जानते थे, उन्हें मारने की कोशिश करते हैं। क्यों? क्योंकि यीशु ने कहा कि परमेश्वर की दया केवल उनके लिए नहीं, बल्कि विधवा और नामान जैसे बाहरी लोगों के लिए भी थी। यह सुनना उन्हें अच्छा नहीं लगा।
बच्चे लूका 4 से क्या सीख सकते हैं?
क्या तुम कभी सोचते हो कि सही काम करना इतना मुश्किल क्यों होता है? यीशु को भी भूख लगी थी, फिर भी उन्होंने आसान रास्ता नहीं चुना। जब कोई तुम्हें कहे "बस थोड़ा सा गलत करने में क्या हर्ज है", तो याद रखना, परमेश्वर का वचन ताकत देता है, ठीक जैसे यीशु के लिए दिया। और यह भी सोचना, क्या तुम कभी किसी को इसलिए नापसंद करते हो क्योंकि परमेश्वर उससे भी प्यार करते हैं, जैसे नासरत के लोगों ने किया?
लूका 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
नासरत के लोग गुस्सा हो गए क्योंकि परमेश्वर की दया दूसरों तक भी पहुँची। तुम्हें क्या लगता है, यह सुनना उनके लिए क्यों कठिन था?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

जब शैतान सब परीक्षा कर चुका, तब कुछ समय के लिये उसके पास से चला गया।"

ध्यान दीजिए, "कुछ समय के लिये।" शैतान गया, पर हमेशा के लिये नहीं। यीशु ने जीता, फिर भी परीक्षा का दरवाज़ा बंद नहीं हुआ।

आप भी शायद सोचते हैं कि एक बड़ी लड़ाई जीतने के बाद सब खत्म हो गया। पर वह लौटकर आता है, नए मौके ढूँढ़ता है। इसलिए जीत के बाद भी सतर्क रहिए, और यीशु के पास ठहरे रहिए, जो हर बार आपके साथ खड़े हैं।

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