3 से 6 वर्ष के बच्चे के लिए

1 शमूएल 17

नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

सुनो, एक कहानी है। मैदान में दो सेनाएँ खड़ी थीं। एक तरफ पलिश्ती, दूसरी तरफ इस्राएली। बीच में एक गहरी तराई थी।

तब पलिश्तियों की सेना से एक बहुत बड़ा आदमी निकला। उसका नाम गोलियत था। वह बहुत, बहुत लंबा था। उसके सिर पर पीतल का टोप था। उसके कपड़े लोहे के थे, भारी भारी। उसके हाथ में एक बड़ा भाला था।

गोलियत बहुत तेज़ चिल्लाया, "कोई एक आदमी मेरे पास आओ!" उसकी आवाज़ गड़गड़ाहट जैसी थी।

सब इस्राएली डर गए। बहुत डर गए। वे भागे।

इसी समय एक छोटा लड़का आया। उसका नाम दावीद था। वह भेड़ों की देखभाल करता था। उसके पिता ने उसे रोटी और पनीर देकर भाइयों के पास भेजा था।

दावीद ने गोलियत की चिल्लाहट सुनी। वह डरा नहीं। उसने कहा, "यह पलिश्ती कौन है, जो जीवित परमेश्वर की सेना को ललकारे?"

इसका मतलब क्या है?

राजा शाऊल ने दावीद को बुलाया। शाऊल ने कहा, "तू तो छोटा लड़का है।"

पर दावीद ने कहा, "मैंने भेड़ें चराई हैं। जब सिंह आता था, मैं उससे लड़ता था। जब भालू आता था, मैं उससे भी लड़ता था। परमेश्वर ने मुझे तब बचाया। वे अब भी मुझे बचाएँगे।"

दावीद को लोहे के कपड़े नहीं चाहिए थे। उसने सिर्फ अपनी लाठी ली। और पाँच चिकने पत्थर, नदी से। और अपना गोफन।

गोलियत ने दावीद को देखा और हँसा। वह तो बस एक लड़का था।

पर दावीद ने कहा, "तू तलवार लेकर आता है। मैं यहोवा के नाम से आता हूँ।"

फिर दावीद दौड़ा। एक पत्थर निकाला। गोफन घुमाया। पत्थर हवा में गया, सीधा गोलियत के माथे पर लगा। गोलियत गिर गया। धम्म!

समानता

दावीद के पास तलवार नहीं थी, पर यहोवा उसके साथ थे। दावीद ने कहा था, यह लड़ाई यहोवा की है। परमेश्वर ने एक छोटे लड़के के द्वारा बड़ा काम किया। बहुत बाद में, परमेश्वर ने अपने ही पुत्र यीशु को भेजा। वे भी छोटे और कमज़ोर दिखे। पर उन्होंने सबसे बड़ी लड़ाई जीती। परमेश्वर छोटों के द्वारा बड़े काम करते हैं।

तुम्हारे लिए

क्या तुम कभी डरते हो? अंधेरे से, या किसी बड़ी चीज़ से? दावीद भी छोटा था, गोलियत बहुत बड़ा था। पर दावीद परमेश्वर के साथ गया। तुम भी डरने पर परमेश्वर से बात कर सकते हो। वे तुम्हारे साथ हैं, जैसे दावीद के साथ थे।

बात करें

तुम्हें कब डर लगता है?

दावीद ने गोफन और पत्थर क्यों लिए, तलवार क्यों नहीं?

साथ में प्रार्थना

प्रभु, आप दावीद के साथ थे। आप मेरे साथ भी हैं। जब मैं डरूँ, मुझे याद दिलाएँ, आप मेरे पास हैं। आमीन।

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1 शमूएल 17 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 शमूएल 17 किस विषय में है?
सुनो, एक कहानी है। मैदान में दो सेनाएँ खड़ी थीं। एक तरफ पलिश्ती, दूसरी तरफ इस्राएली। बीच में एक गहरी तराई थी।
1 शमूएल 17 क्या कहता है?
इसी समय एक छोटा लड़का आया। उसका नाम दावीद था। वह भेड़ों की देखभाल करता था। उसके पिता ने उसे रोटी और पनीर देकर भाइयों के पास भेजा था।
1 शमूएल 17 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
पर दावीद ने कहा, "मैंने भेड़ें चराई हैं। जब सिंह आता था, मैं उससे लड़ता था। जब भालू आता था, मैं उससे भी लड़ता था। परमेश्वर ने मुझे तब बचाया। वे अब भी मुझे बचाएँगे।"
नन्हे बच्चे 1 शमूएल 17 से क्या सीख सकते हैं?
पर दावीद ने कहा, "तू तलवार लेकर आता है। मैं यहोवा के नाम से आता हूँ।"
1 शमूएल 17 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
क्या तुम कभी डरते हो? अंधेरे से, या किसी बड़ी चीज़ से? दावीद भी छोटा था, गोलियत बहुत बड़ा था। पर दावीद परमेश्वर के साथ गया। तुम भी डरने पर परमेश्वर से बात कर सकते हो। वे तुम्हारे साथ हैं, जैसे दावीद के साथ थे।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

पलिश्तियों ने अपनी सेनाओं को युद्ध के लिये इकट्ठा किया... और सोको और अजेका के बीच एपेसदम्मीम में डेरे डाले।"

गोलियत का नाम अभी आया भी नहीं, सिर्फ जगहों के नाम हैं। पर ध्यान दे, शत्रु यहूदा की ही ज़मीन पर डेरा डाल रहा है, वादे के देश के भीतर।

तेरी लड़ाई भी शायद ऐसे ही शुरू हुई थी, बिना शोर के। परमेश्वर उस नक्शे को पहले से जानता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 8

गोलियत ने इस्राएल को यही याद दिलाया, "क्या तुम शाऊल के अधीन नहीं हो?" वह उन्हें परमेश्वर के लोग नहीं, बस एक राजा के दास कहता है। डर की आवाज़ हमेशा यही करती है, तुम्हारी पहचान छोटी कर देती है। आज जो आवाज़ तुमसे कहती है कि तुम बस अपनी कमज़ोरी हो, उससे पूछो, तू मुझे नाम देने वाला कौन होता है?

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For parents and teachers: विशेष रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों को ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए लिखा गया। इसे अपने बच्चे के साथ बातचीत की शुरुआत के रूप में उपयोग करें, एकमात्र स्रोत के रूप में नहीं। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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