2 थिस्सलुनीकियों 2
नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
शाम हो गई थी। एक दूर के शहर में, जिसका नाम था थिस्सलुनीके।
छोटे-छोटे दीये जल रहे थे। रोटी की गरम खुशबू आ रही थी। लोग एक साथ बैठे थे, बिलकुल पास-पास।
पर वे खुश नहीं थे। वे डरे हुए थे।
किसी ने उनसे कुछ कहा था। कुछ डरावनी बात। "प्रभु यीशु का दिन आ गया!" ऐसी बात। और सब लोग घबरा गए।
तभी दरवाज़े पर आहट हुई। खट, खट, खट।
एक आदमी आया। उसके हाथ में एक चिट्ठी थी। पौलुस की चिट्ठी!
सब चुप हो गए। सबने कान लगाए। चिट्ठी खोली गई।
इसका क्या मतलब है?
पौलुस ने लिखा था: "मेरे भाइयों, डरो मत।"
"घबराओ मत। तुम्हारा मन शांत रहे।"
पौलुस जानता था कि वे डरे हुए हैं। इसलिए उसने ऐसा लिखा।
दुनिया में एक बुरा आदमी आएगा। वह बहुत बड़ा बनना चाहेगा। वह कहेगा: "मैं ही सबसे बड़ा हूँ!"
पर सुनो। ध्यान से सुनो।
प्रभु यीशु आएँगे। और वे बस एक फूँक मारेंगे। फूँ! और वह बुरा आदमी खत्म।
बस एक ही फूँक। यीशु इतने ताकतवर हैं।
तुम एक मोमबत्ती फूँक से बुझा सकते हो न? यीशु के लिए वह बुरा आदमी छोटी-सी मोमबत्ती जैसा है।
तो डरने की कोई बात नहीं। बिलकुल नहीं।
जोड़ने वाला धागा
चिट्ठी में और भी कुछ लिखा था। सबसे सुंदर बात।
पौलुस ने लिखा: "परमेश्वर ने तुम्हें चुन लिया है।"
बहुत, बहुत पहले। जब कुछ भी नहीं था। तब भी परमेश्वर ने सोचा: "मुझे ये लोग चाहिए।"
परमेश्वर ने उनसे प्रेम किया। परमेश्वर ने उन्हें बुलाया।
और परमेश्वर ने उन्हें एक तोहफ़ा दिया। शांति। मन के अंदर की चुपचाप, अच्छी शांति।
लोग सुनते रहे। और उनका डर धीरे-धीरे चला गया।
एक बच्चा मुस्कुराया। फिर उसकी माँ भी मुस्कुराई।
दीये जलते रहे। रात शांत थी। और वे अब घबराए हुए नहीं थे।
तुम्हारे लिए
क्या तुम्हें कभी डर लगता है?
शायद अंधेरे में। शायद तेज़ आवाज़ से। शायद जब माँ या पापा पास नहीं होते।
पौलुस की चिट्ठी तुम्हारे लिए भी है।
डरो मत। यीशु सबसे ताकतवर हैं। यीशु तुमसे प्रेम करते हैं।
और परमेश्वर ने तुम्हें भी चुना है। हाँ, तुम्हें!
पौलुस ने आख़िर में लिखा: "स्थिर रहो।" इसका मतलब है: कसकर पकड़े रहो।
जैसे तुम पापा का हाथ पकड़ते हो। बाज़ार में, भीड़ में। तुम छोड़ते नहीं हो।
वैसे ही यीशु का हाथ पकड़े रहो। वे तुम्हें कभी नहीं छोड़ेंगे।
बातचीत करें
तुम्हें कब-कब डर लगता है? बताओ।
यीशु तुमसे प्रेम करते हैं। इससे तुम्हें कैसा लगता है?
साथ मिलकर प्रार्थना
प्रभु यीशु,
कभी-कभी मुझे डर लगता है।
पर आप बहुत ताकतवर हैं।
आप मेरा हाथ पकड़े रहिए।
मुझे शांति दीजिए।
धन्यवाद कि आप मुझसे प्रेम करते हैं।
आमीन।
2 थिस्सलुनीकियों 2 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
2 थिस्सलुनीकियों 2 किस विषय में है?
2 थिस्सलुनीकियों 2 क्या कहता है?
2 थिस्सलुनीकियों 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
नन्हे बच्चे 2 थिस्सलुनीकियों 2 से क्या सीख सकते हैं?
2 थिस्सलुनीकियों 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
पौलुस डाँटता नहीं, विनती करता है: "अब हे भाइयों, हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन, और उसके पास हमारे इकट्ठे होने के विषय में, हम तुम से विनती करते हैं।" थिस्सलुनीके के लोग अफवाहों से घबरा गए थे। और पौलुस उनके डर को नरमी से थामता है। ध्यान दे, आशा सिर्फ यह नहीं कि मसीह आएगा, बल्कि यह कि हम उसके पास इकट्ठे होंगे। तेरा इंतज़ार किसी घटना का नहीं, एक व्यक्ति का है।
जिस पत्र में अधर्मी के आने और लोगों के भटकने की बात है, उसी में पौलुस लिखता है: "इसी लिये उसने तुम्हें हमारे सुसमाचार के द्वारा बुलाया, कि तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह की महिमा को प्राप्त करो।" यानी तेरा नाम भ्रम की सूची में नहीं, महिमा की बुलाहट में लिखा गया है। जब चारों ओर सब हिलता दिखे, तब यही याद रख कि तुझे किसने बुलाया और किस लिये बुलाया।
जिन्होंने सत्य से प्रेम करने से इन्कार किया, उनके बारे में लिखने के बाद पौलुस मुड़ता है: "परन्तु हे प्रभु के प्रिय भाइयों..." यही "परन्तु" तुम्हारा ठिकाना है। चारों ओर धोखा फैला हो, फिर भी तुम आदि से चुने गए हो, प्रेम किए गए हो। तुम्हारा विश्वास तुम्हारी पकड़ नहीं, उसकी पकड़ है।
पौलुस यह नहीं कहता कि वे सच्चाई को जानते नहीं थे। वह कहता है, "उन्होंने सत्य के प्रेम को ग्रहण नहीं किया जिससे उनका उद्धार होता।" यानी सच्चाई उनके सामने थी, पर उन्होंने उससे प्रेम नहीं किया। धोखा वहीं घर बनाता है जहाँ सत्य सिर्फ जानकारी हो, प्यार नहीं। बता, जो वचन तुझे चुभता है, क्या तू उसे अब भी प्यार करता है?
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