गिनती 29
छोटे बच्चे और प्री स्कूल (3 से 5 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
बातचीत में क्या हुआ?
एक बड़ा तम्बू था। सुनहरा, चमकता हुआ। उसमें परमेश्वर रहते थे। इस्राएल के लोग उस तम्बू के पास आते थे।
मूसा वहाँ खड़े थे। परमेश्वर ने मूसा से बात की। धीरे से, साफ़ साफ़।
परमेश्वर ने कहा, "सातवें महीने में एक दिन आएगा। उस दिन नरसिंगा फूँकना। तेज़ आवाज़। जय जय का दिन।"
फिर एक और दिन आएगा। उस दिन लोग उपवास करेंगे। यानी कुछ नहीं खाएँगे। वे चुप रहेंगे। अपने दिल को दुःख देंगे।
फिर सात दिन का एक बड़ा पर्व आएगा। बहुत बड़ा। हर दिन लोग जानवर लाएँगे। बछड़े, मेढ़े, भेड़ के बच्चे। बकरा भी।
वे जानवर वेदी पर चढ़ाएँगे। आग जलेगी। धुआँ ऊपर जाएगा, आसमान की तरफ।
तेल लगा हुआ मैदा भी चढ़ाएँगे। उसकी खुशबू मीठी होगी।
इसका मतलब क्या है?
इतने सारे जानवर। इतने दिन। क्यों?
क्योंकि पाप था। लोगों के दिल में कुछ टूटा हुआ था। वह ठीक करना था।
हर बकरा जो चढ़ता था, वह कहता था, "कुछ गलत हुआ है। हमें माफ़ी चाहिए।"
और परमेश्वर ने कहा, यह सुगन्ध मुझे सुखदायक लगती है। यानी परमेश्वर सुनते थे। परमेश्वर देखते थे। परमेश्वर पास आते थे।
यह काम हर साल करना था। फिर से, फिर से, फिर से। क्योंकि माफ़ी की ज़रूरत भी हर साल थी।
बड़ी कहानी से जोड़
एक दिन एक मेमना आया। एक ख़ास मेमना।
उसका नाम था यीशु मसीह।
वे वेदी पर नहीं गए। वे खुद वेदी बन गए। उन्होंने अपनी जान दी, एक बार।
अब बकरा लाने की ज़रूरत नहीं। अब हर साल आग जलाने की ज़रूरत नहीं।
यीशु मसीह ने एक बार सब ठीक कर दिया। हमेशा के लिए।
तेरे लिए
जब तुझसे कुछ गलत हो जाता है, तू क्या करता है?
तू परमेश्वर से कह सकता है, "मुझे माफ़ कर दीजिए।"
परमेश्वर सुनते हैं। परमेश्वर पास आते हैं। जैसे वे तम्बू में आए थे। अभी भी वैसे ही।
तुझे क्या अच्छा लगता है, जब कोई तुझे माफ़ कर देता है?
तू परमेश्वर से क्या कहना चाहता है आज?
प्रार्थना
प्यारे परमेश्वर, धन्यवाद यीशु मसीह के लिए। वे हमारे लिए आए। मुझे माफ़ कर दीजिए, जब मुझसे गलती होती है। आप पास आइए, जैसे तम्बू में आते थे। आमीन।
गिनती 29 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
गिनती 29 किस विषय में है?
गिनती 29 क्या कहता है?
गिनती 29 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
नन्हे बच्चे गिनती 29 से क्या सीख सकते हैं?
गिनती 29 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
आठ दिन के पर्व का पाँचवाँ दिन। न पहला, न आखिरी, कोई ऐसा दिन जिसे कोई याद नहीं रखता। फिर भी परमेश्वर लिखवाते हैं, "और बछड़ों, मेढ़ों, और भेड़ के बच्चों के साथ उनकी गिनती के अनुसार नियम के अनुसार उनका अन्नबलि और अर्घ भी चढ़ाना।" तेरे जीवन के वे साधारण दिन, जिनमें कुछ खास नहीं होता, उन्हें भी वह गिनता है।
झोपड़ियों के पर्व में हर दिन बैलों की गिनती घटती जाती थी, पर हर दिन यही आदेश दोहराया गया: "उनकी गिनती के अनुसार, नियम के अनुसार।" परमेश्वर को अनुमान से चढ़ाया गया कुछ नहीं चाहिए था। आज तेरी भक्ति शायद पहले जैसी बड़ी न लगे, फिर भी वह गिनी जाती है। छोटी होती संख्या भी पूरे मन से चढ़ाई जा सकती है।
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