1 थिस्सलुनीकियों 4
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
पौलुस थिस्सलुनीकियों को लिख रहे हैं, एक ऐसी कलीसिया को जिसे वे प्यार करते हैं। यह अध्याय दो हिस्सों में बंटा हुआ है, और दोनों हिस्से उन सवालों को छूते हैं जो आज भी तुम्हारे मन में घूमते हैं, शरीर और सेक्स के बारे में, और मृत्यु और भविष्य के बारे में।
पहले हिस्से में (1-12) पौलुस सीधी बात करते हैं। परमेश्वर की इच्छा है कि तुम पवित्र बनो, और व्यभिचार से बचे रहो। वे कहते हैं कि अपने शरीर को "पवित्रता और आदर" से रखना चाहिए, न कि अभिलाषा के अनुसार जैसा वे करते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। यह कोई हल्की सलाह नहीं है, वे कहते हैं कि इसे तुच्छ समझने वाला इंसान को नहीं बल्कि परमेश्वर को तुच्छ समझता है, जिन्होंने अपना पवित्र आत्मा दिया है। फिर वे भाईचारे के प्रेम की बात करते हैं, और एक शांत, काम करने वाली, ईमानदार जिंदगी की सलाह देते हैं जिससे बाहरवालों के बीच भी भरोसा बने।
दूसरा हिस्सा (13-18) एक अलग दर्द को छूता है, मृत्यु का दर्द। थिस्सलुनीकियों में कुछ विश्वासी मर गए थे, और बाकी लोग डरे हुए थे, वे क्या सोचें? क्या वे मसीह के आने का हिस्सा नहीं बनेंगे? पौलुस बिना झूठी तसल्ली दिए जवाब देते हैं। वे कहते हैं, यीशु मरे और फिर जी उठे, इसलिए जो उनमें सो गए हैं उन्हें भी परमेश्वर उसी तरह ले आएंगे। प्रभु स्वर्ग से उतरेंगे, तुरही फूंकी जाएगी, पहले वे जी उठेंगे जो मसीह में मरे हैं, और फिर जो जीवित बचे हैं वे उनके साथ उठा लिए जाएंगे। अंत एक वादा है, "हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।"
इसका क्या मतलब है?
यह अध्याय झूठी शर्म या झूठी तसल्ली नहीं देता। सेक्स के बारे में बाइबल चुप नहीं रहती, वह इसे गंभीरता से लेती है, क्योंकि शरीर कोई खिलौना नहीं है, वह कुछ पवित्र है। आज की दुनिया कहती है कि शरीर से जो चाहो करो, जब तक दूसरा सहमत हो। पौलुस कुछ और कहते हैं, तुम्हारा शरीर परमेश्वर के सामने एक जिम्मेदारी है, क्योंकि पवित्र आत्मा उसमें रहता है। यह प्रतिबंध नहीं है, यह आदर है, खुद के लिए और दूसरे के लिए।
और मृत्यु के बारे में, पौलुस किसी को यह नहीं कहते कि दुख मत करो। वे कहते हैं कि शोक करो, पर उनके जैसा नहीं जिन्हें आशा नहीं है। फर्क शोक में नहीं है, फर्क उस आशा में है जो शोक के साथ चलती है। यह ईमानदार है। मृत्यु अब भी दर्द देती है, लेकिन वह आखिरी शब्द नहीं है।
समान सूत्र
यह सारा अध्याय यीशु पर खड़ा है। पवित्रता की बात उनसे शुरू होती है, क्योंकि पवित्र आत्मा जो तुम्हें दिया गया है वही आत्मा है जो यीशु में था। और आशा की बात सीधे उनके पुनरुत्थान से निकलती है, "यदि हम विश्वास करते हैं कि यीशु मरा, और जी भी उठा, तो वैसे ही परमेश्वर उन्हें भी… ले आएगा।" यानी, तुम्हारी आशा किसी भावना पर नहीं टिकी, वह एक ऐतिहासिक घटना पर टिकी है। एक कब्र जो खाली हुई। अगर वह सच है, तो बाकी सब पीछे चलता है।
यह पूरी बाइबल की कहानी का अंत भी है, एक दिन परमेश्वर खुद आकर अपने लोगों को इकट्ठा करेंगे, और "इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।" यही वह वादा है जिसकी ओर पूरी बाइबल इशारा करती रहती है, परमेश्वर अपने लोगों के साथ, हमेशा के लिए।
तुम्हारे लिए
तुम्हारी उम्र में सेक्स को लेकर जो दबाव है, वह झूठा नहीं है, वह वाकई बहुत भारी है। स्क्रीन, रिश्ते, सब कुछ कहता है कि अपनी इच्छा ही सच्चाई है। पौलुस तुम्हें याद दिलाते हैं कि तुम्हारा शरीर तुम्हारी अपनी संपत्ति नहीं है जिसे तुम जैसे चाहो इस्तेमाल करो, वह एक उपहार है जिसे आदर से थामना है। यह कोई आसान रास्ता नहीं है, पर यह एक सच्चा रास्ता है।
और जब तुम किसी को खो चुके हो, या खोने से डरते हो, तो यह अध्याय झूठी मुस्कान नहीं मांगता। यह कहता है कि शोक करना ठीक है, बस उस आशा को मत भूलना जो यीशु के पुनरुत्थान से जुड़ी है। अगली बार जब मृत्यु किसी अपने को छू ले, इन शब्दों को याद करना, और "एक दूसरे को शान्ति दिया करो", जैसा पौलुस कहते हैं। यह आशा बांटने लायक है।
बात करो इस पर
तुम्हारी जिंदगी में पवित्रता की बात सुनकर सबसे पहला विचार क्या आता है, एक नियम का भार, या एक आदर जिसकी समझ बनती है? इसमें क्या फर्क है?
जब तुम किसी ऐसे की मृत्यु के बारे में सोचते हो जिसे तुम प्यार करते हो, तो क्या पुनरुत्थान की आशा तुम्हारे लिए सच्ची लगती है, या दूर की बात लगती है? क्यों?
साथ में प्रार्थना
प्रभु यीशु, आप मरे और जी उठे, और इसी में हमारी आशा टिकी है। हमारे शरीर को, हमारे रिश्तों को, हमारे दुख को आपके हाथों में सौंपते हैं। हमें सिखाएं कि आदर से जीना क्या है, और जब दुख आए तो हमें झूठी तसल्ली नहीं बल्कि सच्ची आशा दें। हम आपके आने की राह देखते हैं। आमीन।
1 थिस्सलुनीकियों 4 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
1 थिस्सलुनीकियों 4 किस विषय में है?
1 थिस्सलुनीकियों 4 क्या कहता है?
1 थिस्सलुनीकियों 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर 1 थिस्सलुनीकियों 4 से क्या सीख सकते हैं?
1 थिस्सलुनीकियों 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
पौलुस थिस्सलुनीकियों को डाँटता नहीं। वह कहता है, "जैसा तुम चलते भी हो, वैसे ही और भी बढ़ते जाओ।" यानी तू पहले से सही रास्ते पर है, बस रुक मत जा। परमेश्वर को प्रसन्न करना कोई रेखा नहीं जिसे पार करके काम खत्म हो जाए। यह प्रेम है, और प्रेम हमेशा और गहरा होना चाहता है। आज तू कहाँ ठहर गया है, यह सोचकर कि इतना काफ़ी है?
पौलुस यह नहीं कहता कि मत रोओ। वह कहता है, "ऐसा न हो कि तुम औरों के समान शोक करो जिन्हें आशा नहीं।" शोक मना नहीं है, निराशा मना है। और देखो, वह मरे हुओं को "जो सो गए हैं" कहता है। नींद का अंत जागना होता है। जिस कब्र पर तू आँसू बहाता है, मसीह उसे बिस्तर कहता है।
पौलुस कोई बड़ा मिशन नहीं सौंप रहा, वह कहता है: "चुपचाप रहने और अपना-अपना काम-काज करने, और अपने-अपने हाथों से कमाने का प्रयत्न करो।" थिस्सलुनीके के कुछ लोग प्रभु के आने की बाट जोहते-जोहते काम छोड़ बैठे थे। मसीह की प्रतीक्षा आपके हाथों को खाली नहीं करती, उन्हें ईमानदार बनाती है। आज आपका चुपचाप किया गया काम भी परमेश्वर की नज़र में गवाही है।
क्योंकि परमेश्वर ने हमें अशुद्धता के लिये नहीं, परन्तु पवित्रता के लिये बुलाया है।" ध्यान दे, पौलुस पवित्रता को नियम नहीं, बुलाहट कहता है। जिस दिन परमेश्वर ने तुझे अपना कहा, उसी दिन उसने तेरे शरीर, तेरी आँखों और तेरे एकांत के पलों को भी अपने लिये माँग लिया। तू किसी सूची का पालन नहीं कर रहा, तू एक बुलाने वाले को उत्तर दे रहा है।
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