7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

1 थिस्सलुनीकियों 4

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

थिस्सलुनीके एक बंदरगाह शहर था, शोरगुल से भरा, बाज़ारों और मंदिरों से भरा। वहाँ कुछ लोग यीशु पर विश्वास करने लगे थे, पर वे नए विश्वासी थे। पौलुस उन्हें ज़्यादा समय सिखा नहीं पाया था, इसलिए वह उन्हें चिट्ठी लिखता है। और ध्यान दो कि वह कैसे शुरू करता है: "हम तुम से विनती करते हैं।" वह डाँटता नहीं, वह विनती करता है, जैसे एक बड़ा भाई।

पौलुस उनकी तारीफ़ करता है: तुम पहले से ही परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन जी रहे हो। और फिर वह कहता है, "वैसे ही और भी बढ़ते जाओ।" यह दिलचस्प है। वह नहीं कहता, "बस, अब काफ़ी हो गया।" विश्वास एक पौधे जैसा है जो बढ़ता रहता है।

फिर वह तीन बातों की बात करता है। पहली: पवित्रता। उस शहर में लोग अपने शरीर के साथ जो मन में आए वही करते थे, और यह सबको सामान्य लगता था। पौलुस लिखता है कि परमेश्वर चाहते हैं कि तुम अलग हो। तुम्हारा शरीर कोई खिलौना नहीं है जिसे इस्तेमाल कर के फेंक दिया जाए। पति और पत्नी एक-दूसरे के प्रति वफ़ादार रहें, और कोई अपने भाई को इस बात में न ठगे। परमेश्वर ने हमें "अशुद्ध होने के लिये नहीं, परन्तु पवित्र होने के लिये बुलाया है।"

दूसरी बात: भाईचारे का प्रेम। यहाँ पौलुस मुस्कुराता हुआ लगता है। वह कहता है, इस बारे में मुझे तुम्हें लिखने की ज़रूरत ही नहीं, क्योंकि यह तुमने परमेश्वर से ही सीख लिया है। फिर भी, और भी बढ़ते जाओ। और वह कुछ बहुत ज़मीनी बात जोड़ता है: चुपचाप रहो, अपना काम करो, अपने हाथों से कमाओ। कोई तमाशा नहीं, कोई शेखी नहीं। बाहर के लोग देखें कि ये लोग भरोसे के लायक हैं।

तीसरी बात सबसे कोमल है। थिस्सलुनीके के कुछ विश्वासी मर चुके थे, और बाकी लोग डर गए थे। क्या वे अब हमेशा के लिए चले गए? पौलुस उन्हें एक अलग शब्द देता है: वे "सो गए हैं।" जो सोता है, वह जगाया जा सकता है। और फिर वह एक चित्र खींचता है जो सुनने में तुरही जैसा गूँजता है: प्रभु स्वयं स्वर्ग से उतरेंगे, एक ललकार सुनाई देगी, प्रधान स्वर्गदूत की आवाज़, परमेश्वर की तुरही। और जो मसीह में मरे हैं, वे पहले जी उठेंगे। बाकी लोग बादलों पर उठा लिए जाएँगे, और सब मिलकर हमेशा प्रभु के साथ रहेंगे।

इसका क्या अर्थ है?

गौर करो कि पौलुस दो चीज़ों को एक ही चिट्ठी में जोड़ देता है: रोज़ का साधारण जीवन और आख़िरी दिन। कैसे जीना है, और कहाँ पहुँचना है। ये दो अलग विषय नहीं हैं। क्योंकि हम प्रभु से मिलने जा रहे हैं, इसलिए आज हमारा जीना मायने रखता है।

और वह शोक को मना नहीं करता। वह नहीं कहता, "रोओ मत।" वह कहता है, "ऐसा न हो, कि तुम औरों के समान शोक करो जिन्हें आशा नहीं।" ईसाई भी रोते हैं। पर हमारे आँसुओं के पीछे एक उम्मीद खड़ी है।

ईमानदारी से कहूँ: मैं नहीं जानता कि वे बादल कैसे दिखेंगे, या तुरही कैसी सुनाई देगी। बाइबल यह भी नहीं बताती कि यह कब होगा। पौलुस हमें हर सवाल का जवाब नहीं देता। वह हमें बस इतना बताता है जितना तसल्ली के लिए ज़रूरी है, और वह आख़िर में लिखता है: "इन बातों से एक दूसरे को शान्ति दिया करो।"

जोड़नेवाला धागा

पूरी उम्मीद एक ही वाक्य पर टिकी है: "यीशु मरा, और जी भी उठा।" यही नींव है। अगर यीशु कब्र में ही रह जाते, तो पौलुस के पास लिखने के लिए कुछ नहीं होता। पर यीशु मृत्यु के भीतर गए और दूसरी तरफ़ से बाहर आए, और इसलिए मृत्यु अब आख़िरी दरवाज़ा नहीं है।

और आख़िरी वादा सबसे बड़ा है। यह नहीं कहा गया कि हम एक सुंदर जगह में रहेंगे। कहा गया है: "हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।" शुरू से ही परमेश्वर का यही मन था, अपने लोगों के साथ रहना। यह उसी की पूरी होती कहानी है।

तुम्हारे लिए

पौलुस का शब्द "और भी बढ़ते जाओ" तुम्हारे लिए भी है। तुम्हें रातभर में संत बनने की ज़रूरत नहीं। एक कदम काफ़ी है। सोचो: इस हफ़्ते किस एक बात में मैं एक कदम आगे बढ़ सकता हूँ? सच बोलने में? किसी को अकेले न छोड़ने में?

और वह अजीब सी सलाह याद रखो: चुपचाप अपना काम करो। अपनी अच्छाई का ढोल पीटना ज़रूरी नहीं। जो चुपचाप ठीक से किया जाता है, परमेश्वर वह देखते हैं।

अगर तुम्हारे परिवार में कोई मर गया है जो यीशु का था, तो यह अध्याय तुम्हारे लिए लिखा गया है। तुम रो सकते हो। पर तुम बिना उम्मीद के नहीं रोते।

इस पर बात करो

पौलुस लिखता है कि हमें दुख हो सकता है, पर "उनके समान नहीं जिन्हें आशा नहीं।" तुम्हारे अनुसार, इन दोनों तरह के दुख में फ़र्क़ क्या है?

"और भी बढ़ते जाओ" का तुम्हारे लिए इस समय क्या मतलब हो सकता है?

मिलकर प्रार्थना

प्रभु यीशु, आप मरे और जी उठे, और इसीलिए हमारे पास उम्मीद है। जिन्हें हमने खो दिया है, उन्हें हम आपके हाथों में सौंपते हैं। हमें आज एक कदम आगे बढ़ने की ताक़त दें, चुपचाप, ईमानदारी से। और हमें याद दिलाते रहें कि एक दिन हम सदा आपके साथ रहेंगे। आमीन।

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1 थिस्सलुनीकियों 4 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 थिस्सलुनीकियों 4 किस विषय में है?
थिस्सलुनीके एक बंदरगाह शहर था, शोरगुल से भरा, बाज़ारों और मंदिरों से भरा। वहाँ कुछ लोग यीशु पर विश्वास करने लगे थे, पर वे नए विश्वासी थे। पौलुस उन्हें ज़्यादा समय सिखा नहीं पाया था, इसलिए वह उन्हें चिट्ठी लिखता है। और ध्यान दो कि वह कैसे शुरू करता है: "हम तुम से विनती करते हैं।" वह डाँटता नहीं, वह विनती करता है, जैसे एक बड़ा भाई।
1 थिस्सलुनीकियों 4 क्या कहता है?
दूसरी बात: भाईचारे का प्रेम। यहाँ पौलुस मुस्कुराता हुआ लगता है। वह कहता है, इस बारे में मुझे तुम्हें लिखने की ज़रूरत ही नहीं, क्योंकि यह तुमने परमेश्वर से ही सीख लिया है। फिर भी, और भी बढ़ते जाओ। और वह कुछ बहुत ज़मीनी बात जोड़ता है: चुपचाप रहो, अपना काम करो, अपने हाथों से कमाओ। कोई तमाशा नहीं, कोई शेखी नहीं। बाहर के लोग देखें कि ये लोग भरोसे के लायक हैं।
1 थिस्सलुनीकियों 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
और वह शोक को मना नहीं करता। वह नहीं कहता, "रोओ मत।" वह कहता है, "ऐसा न हो, कि तुम औरों के समान शोक करो जिन्हें आशा नहीं।" ईसाई भी रोते हैं। पर हमारे आँसुओं के पीछे एक उम्मीद खड़ी है।
बच्चे 1 थिस्सलुनीकियों 4 से क्या सीख सकते हैं?
और आख़िरी वादा सबसे बड़ा है। यह नहीं कहा गया कि हम एक सुंदर जगह में रहेंगे। कहा गया है: "हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।" शुरू से ही परमेश्वर का यही मन था, अपने लोगों के साथ रहना। यह उसी की पूरी होती कहानी है।
1 थिस्सलुनीकियों 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
अगर तुम्हारे परिवार में कोई मर गया है जो यीशु का था, तो यह अध्याय तुम्हारे लिए लिखा गया है। तुम रो सकते हो। पर तुम बिना उम्मीद के नहीं रोते।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

पौलुस थिस्सलुनीकियों को डाँटता नहीं। वह कहता है, "जैसा तुम चलते भी हो, वैसे ही और भी बढ़ते जाओ।" यानी तू पहले से सही रास्ते पर है, बस रुक मत जा। परमेश्वर को प्रसन्न करना कोई रेखा नहीं जिसे पार करके काम खत्म हो जाए। यह प्रेम है, और प्रेम हमेशा और गहरा होना चाहता है। आज तू कहाँ ठहर गया है, यह सोचकर कि इतना काफ़ी है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

पौलुस यह नहीं कहता कि मत रोओ। वह कहता है, "ऐसा न हो कि तुम औरों के समान शोक करो जिन्हें आशा नहीं।" शोक मना नहीं है, निराशा मना है। और देखो, वह मरे हुओं को "जो सो गए हैं" कहता है। नींद का अंत जागना होता है। जिस कब्र पर तू आँसू बहाता है, मसीह उसे बिस्तर कहता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 11

पौलुस कोई बड़ा मिशन नहीं सौंप रहा, वह कहता है: "चुपचाप रहने और अपना-अपना काम-काज करने, और अपने-अपने हाथों से कमाने का प्रयत्न करो।" थिस्सलुनीके के कुछ लोग प्रभु के आने की बाट जोहते-जोहते काम छोड़ बैठे थे। मसीह की प्रतीक्षा आपके हाथों को खाली नहीं करती, उन्हें ईमानदार बनाती है। आज आपका चुपचाप किया गया काम भी परमेश्वर की नज़र में गवाही है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

क्योंकि परमेश्वर ने हमें अशुद्धता के लिये नहीं, परन्तु पवित्रता के लिये बुलाया है।" ध्यान दे, पौलुस पवित्रता को नियम नहीं, बुलाहट कहता है। जिस दिन परमेश्वर ने तुझे अपना कहा, उसी दिन उसने तेरे शरीर, तेरी आँखों और तेरे एकांत के पलों को भी अपने लिये माँग लिया। तू किसी सूची का पालन नहीं कर रहा, तू एक बुलाने वाले को उत्तर दे रहा है।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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