12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

1 थिस्सलुनीकियों 5

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस थिस्सलुनीके के उस छोटे से नए विश्वासी समुदाय को लिख रहा है जिसके मन में एक बेचैन सवाल है: प्रभु कब लौटेंगे? और वह जवाब देता है जो हमें चौंकाता है। वह तारीख नहीं बताता। वह कहता है, "इसका प्रयोजन नहीं, कि समयों और कालों के विषय में तुम्हारे पास कुछ लिखा जाए।" जो जानना ज़रूरी था, वह वे पहले से जानते हैं: प्रभु का दिन ऐसे आएगा "जैसा रात को चोर आता है।" बिना घोषणा, बिना कैलेंडर।

फिर एक तीखी तस्वीर आती है। जो लोग कहते हैं, "कुशल है, और कुछ भय नहीं," उन पर अचानक विनाश आ पड़ेगा, जैसे गर्भवती स्त्री पर प्रसव की पीड़ा। यह छिपने की जगह वाली बात नहीं है, "वे किसी रीति से न बचेंगे।"

लेकिन तुरंत पौलुस का स्वर बदलता है। "पर हे भाइयों, तुम तो अंधकार में नहीं हो।" वह उन्हें एक नई पहचान देता है: "तुम सब ज्योति की सन्तान, और दिन की सन्तान हो।" रात का अंधेरा, नशा, नींद, यह उनकी दुनिया नहीं है। इसलिए वह कहता है, जागते और सावधान रहो। और फिर सैनिक की तस्वीर: विश्वास और प्रेम की झिलम, यानी छाती की ढाल, और सिर पर उद्धार की आशा का टोप।

क्यों यह भरोसा? क्योंकि "परमेश्वर ने हमें क्रोध के लिये नहीं, परन्तु इसलिए ठहराया कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उद्धार प्राप्त करें।" मसीह मरे, "कि हम चाहे जागते हों, चाहे सोते हों, सब मिलकर उसी के साथ जीएँ।" यहाँ "सोना" मृत्यु का इशारा है। जीवित या मृत, हम उनके साथ हैं।

इसके बाद पौलुस बहुत ज़मीनी हो जाता है। एक दूसरे को शान्ति दो। अगुओं का आदर करो, मेल-मिलाप से रहो। जो ठीक चाल नहीं चलते उन्हें समझाओ, निरुत्साहित को प्रोत्साहित करो, निर्बलों को सम्भालो, सब के साथ सहनशील रहो। बुराई के बदले बुराई नहीं। और फिर वे छोटे-छोटे वाक्य जो पत्थर की तरह भारी हैं: सदा आनन्दित रहो, निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो, हर बात में धन्यवाद करो। आत्मा को न बुझाओ। सब बातों को परखो, जो अच्छी है उसे पकड़े रहो।

अंत में एक प्रार्थना और एक वादा: "शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे… तुम्हारा बुलानेवाला विश्वासयोग्य है, और वह ऐसा ही करेगा।"

इसका अर्थ क्या है?

ध्यान दो कि पौलुस भविष्य के बारे में जानकारी नहीं, बल्कि चरित्र माँगता है। यह पूरे बाइबल का तरीका है: भविष्य का पर्दा उतना ही उठाया जाता है कि तुम आज ठीक से जी सको, उससे ज़्यादा नहीं। जो लोग तारीखें गिनते हैं, वे असल बात से भटक जाते हैं।

"जागते रहना" डर में जीना नहीं है। पौलुस भय पैदा नहीं कर रहा, वह पहचान याद दिला रहा है। तुम ज्योति की सन्तान हो। इसलिए जागते रहो, इसलिए नहीं कि जागते रहने से तुम ज्योति के बन जाओगे। यह क्रम बहुत ज़रूरी है, वरना विश्वास प्रदर्शन बन जाता है, और प्रदर्शन का दबाव तुम पहले से काफ़ी झेल रहे हो।

"सोना" और "मतवाला होना" यहाँ नैतिक सुस्ती की तस्वीरें हैं। वह हालत जिसमें तुम बस बहते जाते हो, जहाँ स्क्रीन के सामने घंटे गुज़र जाते हैं और तुम्हें याद भी नहीं रहता क्या देखा, जहाँ सुन्न होना दर्द से आसान लगता है। अंधकार का बड़ा हथियार क्रूरता नहीं, बेहोशी है।

और हाँ, ये आदेश खटकते हैं। "सदा आनन्दित रहो" उस दिन पढ़ना, जब सब कुछ बिखरा हुआ हो, एक तमाचे जैसा लग सकता है। ध्यान दो कि पौलुस यह नहीं कहता कि हर बात के लिए धन्यवाद करो, बल्कि "हर बात में धन्यवाद करो।" परिस्थिति को अच्छा कहने की ज़रूरत नहीं। पर सबसे अंधेरी परिस्थिति के भीतर भी परमेश्वर की उपस्थिति को स्वीकारना, यह सम्भव है। और यह पत्री लिखनेवाला आदमी खुद पिटाई और जेल जानता था। वह सस्ता उपदेश नहीं दे रहा।

मुख्य सूत्र

पूरे अध्याय का केंद्र आयत 9 और 10 है। हम क्रोध के लिये नहीं ठहराए गए। यह वाक्य समझने के लिए मानना पड़ता है कि परमेश्वर का क्रोध सचमुच है, कि बुराई के प्रति उनकी प्रतिक्रिया उदासीनता नहीं। और ठीक उसी बिंदु पर मसीह आते हैं: "वह हमारे लिये इस कारण मरा।" क्रूस पर वह हुआ जो हमें डराता है, और वह हमारे बजाय उनके साथ हुआ।

इसलिए प्रभु का दिन विश्वासी के लिए धमकी नहीं, घर वापसी है। और आयत 23 में जो प्रार्थना है, वह असल में परमेश्वर के काम पर भरोसा है: तुम्हें पवित्र करना तुम्हारा प्रोजेक्ट नहीं, उनका है। "तुम्हारा बुलानेवाला विश्वासयोग्य है, और वह ऐसा ही करेगा।" पूरी बाइबल की कहानी इसी वफ़ादारी की कहानी है, अब्राहम से लेकर मसीह के लौटने तक।

तुम्हारे लिए

आयत 21 तुम्हारी दुनिया के लिए लगभग भविष्यवाणी जैसा है: "सब बातों को परखो जो अच्छी है उसे पकड़े रहो।" तुम्हारे पास हर दिन सैकड़ों आवाज़ें आती हैं, हर एक सच होने का दावा करती है। पौलुस न अंधा भरोसा सिखाता है, न सब कुछ ठुकराने वाला संदेह। वह कहता है: परखो। जाँचो। और जो खरा निकले, उसे पकड़ लो, छोड़ो नहीं।

अब कुछ ठोस, और सचमुच मुश्किल। इस हफ़्ते आयत 14 को एक असली नाम दो। किसी को तुम जानते हो जो "निरुत्साहित" है, जो चुपचाप टूट रहा है। उसे प्रोत्साहित करना का मतलब उपदेश देना नहीं, बल्कि उसके पास बैठना, बिना जल्दबाज़ी, बिना फ़ोन। और आयत 15 को भी नाम दो: वह एक व्यक्ति जिसने तुम्हें चोट पहुँचाई और जिसका बदला तुम मन में हज़ार बार ले चुके हो। बुराई के बदले बुराई नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि तुम अन्याय को अच्छा कहो, पर यह कि तुम उसे अपने भीतर पालना बंद करो।

और आयत 17। निरन्तर प्रार्थना का मतलब घंटों घुटने टेकना नहीं, बल्कि दिन भर लाइन खुली रखना। बस के इंतज़ार में, परीक्षा से पहले, रात को अंधेरे में एक वाक्य। यही जागते रहना है।

इस पर बात करो

तुम्हारे जीवन में "सोना" या सुन्न हो जाना किस रूप में आता है, और उसे तुम कैसे पहचानते हो?

अगर परमेश्वर का पवित्र करने का काम तुम्हारे प्रयास पर नहीं, उनकी वफ़ादारी पर टिका है, तो यह तुम्हारे भीतर के प्रदर्शन के दबाव को कैसे बदलता है?

मिलकर प्रार्थना

शान्ति के परमेश्वर, हम अक्सर जागे हुए नहीं, बस थके हुए हैं। हमें अपनी ज्योति में जगाइए। जहाँ हम सुन्न हो चुके हैं, वहाँ हमें फिर संवेदनशील बनाइए। हमें परखने की समझ दीजिए और जो अच्छा है उसे पकड़ने का साहस। आप हमें बुलाने वाले हैं और आप विश्वासयोग्य हैं। हमें प्रभु यीशु मसीह के आने तक सम्भाल कर रखिए। आमीन।

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1 थिस्सलुनीकियों 5 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 थिस्सलुनीकियों 5 किस विषय में है?
पौलुस थिस्सलुनीके के उस छोटे से नए विश्वासी समुदाय को लिख रहा है जिसके मन में एक बेचैन सवाल है: प्रभु कब लौटेंगे? और वह जवाब देता है जो हमें चौंकाता है। वह तारीख नहीं बताता। वह कहता है, "इसका प्रयोजन नहीं, कि समयों और कालों के विषय में तुम्हारे पास कुछ लिखा जाए।" जो जानना ज़रूरी था, वह वे पहले से जानते हैं: प्रभु का दिन ऐसे आएगा "जैसा रात को चोर आता है।" बिना घोषणा, बिना कैलेंडर।
1 थिस्सलुनीकियों 5 क्या कहता है?
इसके बाद पौलुस बहुत ज़मीनी हो जाता है। एक दूसरे को शान्ति दो। अगुओं का आदर करो, मेल-मिलाप से रहो। जो ठीक चाल नहीं चलते उन्हें समझाओ, निरुत्साहित को प्रोत्साहित करो, निर्बलों को सम्भालो, सब के साथ सहनशील रहो। बुराई के बदले बुराई नहीं। और फिर वे छोटे-छोटे वाक्य जो पत्थर की तरह भारी हैं: सदा आनन्दित रहो, निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो, हर बात में धन्यवाद करो। आत्मा को न बुझाओ। सब बातों को परखो, जो अच्छी है उसे पकड़े रहो।
1 थिस्सलुनीकियों 5 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
"सोना" और "मतवाला होना" यहाँ नैतिक सुस्ती की तस्वीरें हैं। वह हालत जिसमें तुम बस बहते जाते हो, जहाँ स्क्रीन के सामने घंटे गुज़र जाते हैं और तुम्हें याद भी नहीं रहता क्या देखा, जहाँ सुन्न होना दर्द से आसान लगता है। अंधकार का बड़ा हथियार क्रूरता नहीं, बेहोशी है।
किशोर 1 थिस्सलुनीकियों 5 से क्या सीख सकते हैं?
आयत 21 तुम्हारी दुनिया के लिए लगभग भविष्यवाणी जैसा है: "सब बातों को परखो जो अच्छी है उसे पकड़े रहो।" तुम्हारे पास हर दिन सैकड़ों आवाज़ें आती हैं, हर एक सच होने का दावा करती है। पौलुस न अंधा भरोसा सिखाता है, न सब कुछ ठुकराने वाला संदेह। वह कहता है: परखो। जाँचो। और जो खरा निकले, उसे पकड़ लो, छोड़ो नहीं।
1 थिस्सलुनीकियों 5 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
अगर परमेश्वर का पवित्र करने का काम तुम्हारे प्रयास पर नहीं, उनकी वफ़ादारी पर टिका है, तो यह तुम्हारे भीतर के प्रदर्शन के दबाव को कैसे बदलता है?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 26

पत्री के अंत में पौलुस बड़ी बातें नहीं, बल्कि एक छोटी सी बात कहता है: "सब भाइयों को पवित्र चुम्बन से नमस्कार करो।" विश्वास सिर्फ मन में नहीं रहता, वह हाथ मिलाने, गले लगाने, नाम लेकर पुकारने तक उतरता है। सोचो, कलीसिया में कौन है जिससे तुम नज़रें चुराकर निकल जाते हो? शायद इस रविवार की सबसे बड़ी आज्ञा यही हो कि तुम उसके पास जाकर नमस्कार करो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

क्योंकि परमेश्वर ने हमें क्रोध के लिये नहीं, परन्तु इसलिये ठहराया कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उद्धार प्राप्त करें।"

पौलुस यह उन लोगों से कह रहा है जो प्रभु के दिन से डर रहे थे। ध्यान दे, परमेश्वर ने तेरे लिए पहले से कुछ ठहराया है, और वह क्रोध नहीं है। तू जिस डर के साथ सोता है, वह परमेश्वर का मन नहीं है। उसका मन तेरा उद्धार है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

पर हे भाइयों, तुम तो अंधकार में नहीं हो कि वह दिन तुम पर चोर के समान आ पड़े।"

चोर उसी के घर में अचानक आता है जो सो रहा हो। पौलुस डराता नहीं, वह याद दिलाता है: तू अंधकार का नहीं है। मसीह का दिन तेरे लिए धक्का नहीं, मुलाक़ात है।

पर एक सवाल रह जाता है। तेरा दिल आज जाग रहा है, या बस व्यस्त है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

सदा आनन्दित रहो।" सिर्फ दो शब्द, पर पौलुस ने ये उन लोगों को लिखे जो सताए जा रहे थे और अपनों की कब्र पर रो चुके थे। यानी यह आनंद हालात से नहीं आता, मसीह से आता है। आज तेरी परिस्थिति शायद न बदले, पर क्या तू उस आनंद को ढूँढ़ेगा जो हालात के नीचे नहीं दबता?

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