1 थिस्सलुनीकियों 5
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
पौलुस थिस्सलुनीके शहर के मसीहियों को यह पत्री लिखता है। ये लोग नए विश्वासी थे और उनके मन में एक बड़ा सवाल था: प्रभु यीशु कब लौटकर आएँगे? कुछ लोग तो शायद दिन गिनने लगे थे।
पौलुस का जवाब चौंकाने वाला है। वह कहता है कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं कि "समयों और कालों के विषय में" तुम्हें कुछ लिखा जाए। यानी: तारीख मैं तुम्हें नहीं बता सकता, और तुम्हें उसकी ज़रूरत भी नहीं है। इसके बजाय वह एक तस्वीर देता है: प्रभु का दिन ऐसे आएगा "जैसा रात को चोर आता है।" चोर पहले से खबर नहीं भेजता। वह तब आता है जब सब सो रहे होते हैं।
फिर पौलुस दो तरह के लोगों की बात करता है। कुछ लोग कहते हैं, "कुशल है, और कुछ भय नहीं," जैसे सब कुछ ठीक चल रहा है, कोई परमेश्वर नहीं, कोई हिसाब नहीं। उनके लिए वह दिन अचानक आएगा। लेकिन थिस्सलुनीके के विश्वासियों के बारे में वह कहता है: "तुम तो अंधकार में नहीं हो।" तुम "ज्योति की सन्तान, और दिन की सन्तान" हो। तुम्हारे लिए वह दिन डरावना नहीं, बल्कि घर लौटने जैसा है।
इसलिए, पौलुस कहता है, जागते और सावधान रहो। वह एक सिपाही की तस्वीर खींचता है: विश्वास और प्रेम की झिलम, यानी छाती पर पहनने वाला कवच, और सिर पर उद्धार की आशा का टोप, यानी हेलमेट। ये हथियार लड़ाई के लिए नहीं, बचाव के लिए हैं। और वह बहुत सुंदर बात जोड़ता है: परमेश्वर ने हमें क्रोध के लिए नहीं ठहराया, बल्कि इसलिए कि हम प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उद्धार पाएँ। यीशु हमारे लिए मरे, ताकि हम उनके साथ जीएँ।
पत्री के आखिर में पौलुस छोटे-छोटे वाक्यों की झड़ी लगा देता है, जैसे कोई जाते-जाते दरवाज़े पर खड़ा होकर सब कुछ कह देना चाहता है। एक दूसरे को शान्ति दो। जो तुम्हारे बीच परिश्रम करते हैं और सिखाते हैं, उनका आदर करो। निरुत्साहित को प्रोत्साहित करो, निर्बलों को सम्भालो, सब के साथ धीरज रखो। बुराई का बदला बुराई से न दो। सदा आनन्दित रहो, निरन्तर प्रार्थना करो, हर बात में धन्यवाद दो। आत्मा को न बुझाओ। सब बातों को परखो, और जो अच्छा है उसे पकड़े रहो।
इसका अर्थ क्या है?
ध्यान दो कि पौलुस भविष्य के बारे में सवाल का जवाब आज के जीवन से देता है। वह तारीख नहीं बताता, वह चरित्र बनाता है।
और सच कहूँ तो एक बात यहाँ खुली रह जाती है। क्यों परमेश्वर हमें यह नहीं बताते कि वह दिन कब है? मुझे इसका पूरा जवाब नहीं मालूम। लेकिन इतना दिखता है: अगर हमें तारीख पता होती, तो हम आखिरी हफ्ते तक इंतज़ार करते और तब तक जैसा मन आए वैसा जीते। न जानने से हमें हर दिन जागते रहना पड़ता है।
"जागते रहना" का मतलब डर के मारे आकाश ताकना नहीं है। पौलुस इसे बहुत ठोस बनाता है: किसी हारे हुए दोस्त को हिम्मत देना, बदला न लेना, शुक्रिया कहना, प्रार्थना करना। ऐसे जीने वाला व्यक्ति कभी भी तैयार है।
मुख्य सूत्र
पौलुस पूरी बात दो बातों पर टिकाता है, और दोनों परमेश्वर के बारे में हैं, हमारे बारे में नहीं।
पहली: यीशु मसीह हमारे लिए मरे। इसीलिए वह दिन हमारे लिए क्रोध का दिन नहीं, बल्कि मिलने का दिन है। हम अपनी अच्छाई के बल पर तैयार नहीं होते, हम उनके बलिदान के कारण सुरक्षित हैं।
दूसरी: "तुम्हारा बुलानेवाला विश्वासयोग्य है, और वह ऐसा ही करेगा।" पौलुस ने सिर्फ प्रार्थना की थी कि परमेश्वर उन्हें पूरी रीति से पवित्र करें, आत्मा, प्राण और देह तक। और फिर वह कहता है: जिन्होंने तुम्हें बुलाया, वे भरोसेमंद हैं। वे यह काम पूरा करेंगे। यह पूरी बाइबल की पुरानी आवाज़ है: परमेश्वर अपनी बात नहीं तोड़ते।
तुम्हारे लिए
तीन छोटे वाक्य लो जो पौलुस ने लिखे और इस हफ्ते उन्हें आज़माओ।
"निरुत्साहित को प्रोत्साहित करो।" तुम्हारी कक्षा में कोई है जो चुप हो गया है, जिसे टीम में कोई नहीं चुनता? उसके पास जाकर बैठना ही जागते रहना है।
"कोई किसी से बुराई के बदले बुराई न करे।" यह उम्र वही है जब बदला लेना बहुत तर्कसंगत लगता है। उसने मुझे चिढ़ाया, तो मैं भी। पौलुस कहता है: यह श्रृंखला तोड़ो।
"हर बात में धन्यवाद करो।" हर बात के लिए नहीं, हर बात में। यानी बुरे दिन में भी कुछ ऐसा ढूँढ़ो जिसके लिए परमेश्वर को शुक्रिया कहा जा सके। यह मुश्किल है। लेकिन कोशिश करने लायक है।
इस पर बात करो
अगर तुम्हें पता चल जाए कि यीशु ठीक एक साल बाद लौटेंगे, तो तुम अपने जीवन में क्या बदलते? और क्यों नहीं आज ही?
"आत्मा को न बुझाओ" का क्या मतलब हो सकता है? तुम्हारे ख्याल से हम कैसे परमेश्वर की आवाज़ को अपने अंदर धीमा कर देते हैं?
मिलकर प्रार्थना
प्रभु यीशु, आप हमारे लिए मरे, इसलिए हमें आपके आने से डरना नहीं है। हमें जागते रहना सिखाइए, न डर से, बल्कि प्रेम से। किसी को हिम्मत देने की नज़र हमें दीजिए, और बदला लेने की इच्छा से बचाइए। आप विश्वासयोग्य हैं, और आप अपना काम पूरा करेंगे। आमीन।
1 थिस्सलुनीकियों 5 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
1 थिस्सलुनीकियों 5 किस विषय में है?
1 थिस्सलुनीकियों 5 क्या कहता है?
1 थिस्सलुनीकियों 5 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे 1 थिस्सलुनीकियों 5 से क्या सीख सकते हैं?
1 थिस्सलुनीकियों 5 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
पत्री के अंत में पौलुस बड़ी बातें नहीं, बल्कि एक छोटी सी बात कहता है: "सब भाइयों को पवित्र चुम्बन से नमस्कार करो।" विश्वास सिर्फ मन में नहीं रहता, वह हाथ मिलाने, गले लगाने, नाम लेकर पुकारने तक उतरता है। सोचो, कलीसिया में कौन है जिससे तुम नज़रें चुराकर निकल जाते हो? शायद इस रविवार की सबसे बड़ी आज्ञा यही हो कि तुम उसके पास जाकर नमस्कार करो।
क्योंकि परमेश्वर ने हमें क्रोध के लिये नहीं, परन्तु इसलिये ठहराया कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उद्धार प्राप्त करें।"
पौलुस यह उन लोगों से कह रहा है जो प्रभु के दिन से डर रहे थे। ध्यान दे, परमेश्वर ने तेरे लिए पहले से कुछ ठहराया है, और वह क्रोध नहीं है। तू जिस डर के साथ सोता है, वह परमेश्वर का मन नहीं है। उसका मन तेरा उद्धार है।
पर हे भाइयों, तुम तो अंधकार में नहीं हो कि वह दिन तुम पर चोर के समान आ पड़े।"
चोर उसी के घर में अचानक आता है जो सो रहा हो। पौलुस डराता नहीं, वह याद दिलाता है: तू अंधकार का नहीं है। मसीह का दिन तेरे लिए धक्का नहीं, मुलाक़ात है।
पर एक सवाल रह जाता है। तेरा दिल आज जाग रहा है, या बस व्यस्त है?
सदा आनन्दित रहो।" सिर्फ दो शब्द, पर पौलुस ने ये उन लोगों को लिखे जो सताए जा रहे थे और अपनों की कब्र पर रो चुके थे। यानी यह आनंद हालात से नहीं आता, मसीह से आता है। आज तेरी परिस्थिति शायद न बदले, पर क्या तू उस आनंद को ढूँढ़ेगा जो हालात के नीचे नहीं दबता?
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