2 कुरिन्थियों 3
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
पौलुस यहाँ एक अजीब सी बात से शुरू करते हैं। कुरिन्थ की कलीसिया में कुछ लोग उनसे सिफारिश की पत्रियाँ माँग रहे थे, जैसे आज कोई किसी नौकरी के लिए प्रमाण-पत्र माँगे। पौलुस कहते हैं, मुझे किसी कागज़ की ज़रूरत नहीं है, तुम खुद मेरी पत्री हो, मसीह ने तुम्हें मेरे हृदय पर लिख दिया है। यह कोई स्याही से लिखी चिट्ठी नहीं, यह जीवित परमेश्वर के आत्मा से हृदय की माँस रूपी पटिका पर लिखी हुई पत्री है।
इसके बाद पौलुस एक गहरी तुलना करते हैं, मूसा और पत्थर की पटियों के बीच। जब मूसा सीनै पर्वत से दस आज्ञाएँ लेकर उतरे, उनका चेहरा तेजोमय था, इतना तेज कि इस्राएली उसकी ओर देख नहीं सकते थे। पर वह तेज घटता जाता था, इसलिए मूसा को अपने मुँह पर परदा डालना पड़ता था। पौलुस कहते हैं कि वह वाचा, जो पत्थर पर खोदी गई थी, दोषी ठहराने वाली वाचा थी, वह मृत्यु की वाचा थी, फिर भी तेजोमय थी। तो फिर आत्मा की नई वाचा, जो धर्मी ठहराती है, कितनी अधिक तेजोमय होगी?
फिर पौलुस उस परदे की बात को और गहरा ले जाते हैं। वह कहते हैं कि आज तक, जब पुराने नियम की पुस्तक पढ़ी जाती है, तो लोगों के हृदयों पर एक परदा पड़ा रहता है। वे पढ़ते तो हैं, पर समझ नहीं पाते कि यह सब किस की ओर इंगित कर रहा है। और वह परदा किसी बाहरी वस्तु से नहीं, हृदय की मतिमन्दता से बना है। परन्तु जब कोई हृदय प्रभु की ओर फिरता है, तो वह परदा उठ जाता है। पौलुस के लिए यह मुक्ति की तस्वीर है, वे कहते हैं, जहाँ प्रभु का आत्मा है, वहाँ स्वतंत्रता है।
और अंत में एक अत्यंत सुंदर वाक्य आता है। हम सब, जिनके चेहरे उघाड़े हैं, जिस पर कोई परदा नहीं, दर्पण की तरह प्रभु के प्रताप को देखते हैं, और उसी को देखते-देखते हम स्वयं भी उसी तेजस्वी रूप में बदलते जाते हैं, अंश-अंश करके, धीरे-धीरे।
इसका क्या अर्थ है?
यह अध्याय दो प्रकार के धर्म के बीच का अंतर दिखाता है। एक वह धर्म जो बाहर से आता है, नियमों की एक सूची जो पत्थर पर खोदी गई है, जो सही और गलत दिखाती है पर बदलने की शक्ति नहीं देती। पौलुस उसे "शब्द की सेवा" कहते हैं और साफ कहते हैं, "शब्द मारता है।" यह कठोर लगता है, पर सच है। अगर तुम्हें सिर्फ बता दिया जाए कि क्या सही है, बिना किसी शक्ति के जो तुम्हें बदल सके, तो वह नियम तुम्हें दोषी ही ठहराएगा। तुम जान जाओगे कि तुम कम पड़ते हो, और वहीं रुक जाओगे।
दूसरा है "आत्मा की सेवा", जो हृदय के भीतर लिखी जाती है। यह बाहर से थोपा गया नियम नहीं, यह भीतर से आया परिवर्तन है। और यही फर्क इतना बड़ा है कि पौलुस कहते हैं, पुरानी वाचा का तेज भी नई वाचा के तेज के सामने फीका पड़ जाता है।
समान सूत्र
यह पूरा अध्याय अंततः यीशु मसीह की ओर इंगित करता है। वह परदा जो मूसा की पुस्तक पढ़ते समय हृदय पर पड़ा रहता है, वह मसीह में ही उठता है। इसका मतलब यह नहीं कि पुराना नियम गलत था, इसका मतलब है कि उसका पूरा अर्थ मसीह के बिना समझ में नहीं आता। तुम कुरान, गीता, या कोई भी नैतिक ग्रंथ पढ़ लो, वे तुम्हें बता सकते हैं क्या करना चाहिए, पर वे तुम्हें बदल नहीं सकते। मसीह में परमेश्वर का आत्मा भीतर आकर हृदय को ही बदल देता है, यह नियम की किताब नहीं, यह एक जीवित संबंध है।
और वह आखिरी तस्वीर, दर्पण में प्रताप को देखना और स्वयं बदल जाना, यह ठीक वही है जो विश्वास का जीवन है। हम मसीह को देखते हैं, और देखते-देखते वैसे बनते जाते हैं जैसा वे हैं।
तुम्हारे लिए
तुम्हारी ज़िंदगी में भी बहुत सी "सिफारिश की पत्रियाँ" चाहिए होती हैं, मार्क्स, फॉलोअर्स, दूसरों की मान्यता, यह सब साबित करने के लिए कि तुम काफी अच्छे हो। पौलुस कहता है, तुम्हारी पहचान किसी कागज़ या स्क्रीन पर लिखी नहीं जाती, वह हृदय पर लिखी जाती है, और परमेश्वर वह लिखने वाला है।
शायद तुम भी कभी नियमों की सूची से जूझते हो, "यह करो, यह मत करो", और फिर भी भीतर से कुछ नहीं बदलता। यह अध्याय कहता है कि सिर्फ जानना काफी नहीं, तुम्हें कुछ ऐसा चाहिए जो भीतर से बदले। वह आत्मा का काम है, तुम्हारा नहीं। और वह परदा, जो कभी-कभी तुम्हारी अपनी समझ पर, तुम्हारे संदेह पर पड़ा रहता है, वह जबरन उठाया नहीं जा सकता। पौलुस कहता है, जब हृदय प्रभु की ओर फिरता है, तब परदा उठता है। यह फिरना ही शुरुआत है।
बात करें
अपने जीवन में सोचो, कौन सी बातें तुम्हें "सिफारिश की पत्री" जैसी लगती हैं, जिनसे तुम अपनी पहचान साबित करने की कोशिश करते हो?
पौलुस कहते हैं "शब्द मारता है, पर आत्मा जिलाता है"। क्या तुमने कभी अनुभव किया है कि सिर्फ नियम जानने से बदलाव नहीं आता? उस अनुभव के बारे में बात करो।
साथ में प्रार्थना
परमेश्वर, हमारे हृदयों पर से वह परदा हटा दें जो हमें आपकी ओर देखने से रोकता है। हमें अपने आत्मा से भीतर से बदल दें, ताकि हम केवल नियम जानने वाले न रहें, बल्कि आपके प्रताप को देखते-देखते वैसे ही बनते जाएँ जैसा मसीह है। हमें वह स्वतंत्रता दें जो आपके आत्मा में है। आमीन।
2 कुरिन्थियों 3 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
2 कुरिन्थियों 3 किस विषय में है?
2 कुरिन्थियों 3 क्या कहता है?
2 कुरिन्थियों 3 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर 2 कुरिन्थियों 3 से क्या सीख सकते हैं?
2 कुरिन्थियों 3 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
मूसा का चेहरा ऐसा चमका था कि लोग उसकी ओर देख न सके। फिर भी पौलुस कहता है, "क्योंकि जो तेजोमय था, वह भी इस बढ़ते हुए तेज के कारण कुछ तेजोमय न ठहरा।" जैसे सूरज निकलते ही दीये की लौ फीकी लगने लगती है। तेरे जीवन में भी कुछ है जिसे तू सबसे चमकीला मानता है। मसीह के पास ला, और देख वह कितना छोटा पड़ जाता है। अच्छा फीका पड़ता है, ताकि सर्वोत्तम दिखाई दे।
मूसा ने अपना मुँह ढक लिया था, क्योंकि वह तेज मिटता जा रहा था। पर तुझसे कहा गया है: "हम सब के उघड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप" दिखता है। कोई परदा नहीं, कोई छिपाव नहीं। और बदलाव एक ही रात में नहीं, "अंश-अंश करके" होता है। तू आज भी उसी को निहारता रह, धीरे-धीरे तेरा चेहरा उसकी झलक देने लगेगा।
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