12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

इफिसियों 2

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

इफिसियों 2 एक ऐसे व्यक्ति के शब्द हैं जो जानता है कि आपके साथ क्या हो चुका है, इससे पहले कि आप खुद समझ पाएं। पौलुस लिखते हैं, "उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे" (पद 1)। ये कोई अलंकार नहीं है। यह कहता है कि आध्यात्मिक रूप से, हम जीवित नहीं थे। हम उस संसार की रीति पर चल रहे थे जो परमेश्वर से दूर है, अपनी ही इच्छाओं और मन की मनसाओं को पूरा करते हुए (पद 2-3)। पौलुस खुद को भी इसमें शामिल करता है, "हम भी सब के सब" वही करते थे।

फिर आता है एक मोड़, जो शायद पूरे पत्र का सबसे भारी शब्द है: "परन्तु परमेश्वर ने…" (पद 4)। मृत्यु के बीच में, जब हमारी ओर से कुछ नहीं हो सकता था, परमेश्वर ने अपने बड़े प्रेम के कारण हमें मसीह के साथ जिलाया। पद 8-9 इसे साफ कर देते हैं: "विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं… न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।" यह उद्धार कमाई नहीं, उपहार है।

पद 11 से आगे पौलुस एक और दीवार की बात करता है, यहूदियों और गैर-यहूदियों के बीच की। गैर-यहूदी पाठक इस्राएल की प्रतिज्ञाओं से "दूर" और "आशाहीन" थे (पद 12)। पर मसीह के लहू ने उन्हें निकट ला दिया (पद 13)। मसीह ने बीच की दीवार को ढा दिया, दोनों को एक नई जाति बना दिया, और क्रूस पर बैर को ही नाश कर दिया (पद 14-16)। अंत में पौलुस एक मंदिर की तस्वीर देता है, जहाँ प्रेरित और भविष्यद्वक्ता नींव हैं, मसीह कोने का पत्थर है, और हम सब मिलकर परमेश्वर का निवास-स्थान बनते जा रहे हैं (पद 19-22)।

इसका क्या अर्थ है?

यह अध्याय दो चीज़ें एक साथ कहता है जो पहली नज़र में अजीब लगती हैं। पहली, हालत बहुत बुरी थी। "मरे हुए" शब्द नरम नहीं किया जा सकता। यह कोई कमज़ोरी या गलती की बात नहीं है, यह मृत्यु की बात है। दूसरी, परमेश्वर की प्रतिक्रिया उस हालत से कहीं बड़ी थी। "दया का धनी", "बड़ा प्रेम", "अनुग्रह का असीम धन" (पद 4, 7), ये शब्द नापतोल कर नहीं लिखे गए।

यहाँ एक बात साफ समझ लेनी ज़रूरी है: उद्धार का क्रम उल्टा नहीं हो सकता। आप पहले अच्छे बनकर परमेश्वर के करीब नहीं आते। परमेश्वर पहले आपको जिलाता है, फिर भले काम आते हैं, जो "परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया" (पद 10)। यह क्रम बहुत कुछ बदल देता है। आप उद्धार के लिए काम नहीं कर रहे, आप उद्धार से काम कर रहे हैं।

सूत्र

यह अध्याय पूरी बाइबल की कहानी का दिल है। परमेश्वर ने शुरू से ही मनुष्य के साथ संबंध चाहा, पर पाप ने दूरी बना दी, मृत्यु जैसी दूरी। फिर मसीह आता है, और अपने लहू से वह दूरी पाटता है (पद 13)। यह केवल व्यक्तिगत उद्धार की बात नहीं, यह दो अलग किए हुए समूहों, यहूदी और गैर-यहूदी, के बीच की बात भी है, जो मसीह में "एक नई जाति" बनते हैं (पद 15)। क्रूस केवल आपको परमेश्वर के पास नहीं लाता, वह आपको उन लोगों के पास भी लाता है जो आपसे बहुत अलग हैं। मंदिर की तस्वीर (पद 21-22) दिखाती है कि परमेश्वर अब किसी एक इमारत में नहीं, बल्कि लोगों में, एक साथ जुड़े हुए लोगों में रहते हैं। यही मसीह की योजना की पूर्णता है, जिसे पूरी बाइबल शुरू से बता रही है।

आपके लिए

शायद आप सोचते हों कि विश्वास एक प्रदर्शन है, कि परमेश्वर आपसे तब प्यार करेंगे जब आप काफी अच्छे बनेंगे। यह अध्याय उस सोच को जड़ से काटता है। आप पहले से मरे हुए थे, और परमेश्वर ने तब प्यार किया जब आपमें कुछ भी दिखाने लायक नहीं था। यह आपके परफॉर्मेंस के दबाव से आपको आज़ाद करता है। आपका उद्धार आपकी काबिलियत पर टिका नहीं है, और यह बात राहत की है, भले ही अहंकार को यह पसंद न आए।

दूसरी बात, यह अध्याय आपको अकेलेपन से बाहर निकालता है। आप "परदेशी और मुसाफिर" नहीं, बल्कि "परमेश्वर के घराने" के हिस्सा हैं (पद 19)। एक स्क्रीन के पीछे की दुनिया में जहाँ जुड़ाव अक्सर सतही होता है, यह कहता है कि आप किसी बड़ी, जीवित इमारत का हिस्सा हैं, जिसमें हर पत्थर ज़रूरी है। सोचिए कि आपके जीवन में कौन सी "दीवारें" हैं, जो आपको किसी से दूर रखती हैं। मसीह ने एक बड़ी दीवार ढा दी। क्या आपकी बनाई दीवारें उससे ज़्यादा मज़बूत हैं?

बात करें

अगर उद्धार पूरी तरह अनुग्रह से है, कर्मों से नहीं, तो फिर भले काम क्यों ज़रूरी हैं? इस अध्याय के अनुसार उत्तर दीजिए।

आपके जीवन में कौन सी "दीवार" है, जातीय, सामाजिक, या व्यक्तिगत, जिसे आप सोचते हैं कि मसीह शायद न ढहा सके? क्यों?

साथ में प्रार्थना

परमेश्वर, आपने हमें तब जिलाया जब हम मरे हुए थे, बिना किसी शर्त के, केवल अपने प्रेम के कारण। हमें याद दिलाइए कि हमारा मूल्य हमारी काबिलियत में नहीं, आपके अनुग्रह में है। जो दीवारें हमने अपने और दूसरों के बीच बना रखी हैं, उन्हें ढहा दीजिए, जैसे आपने क्रूस पर ढहाईं। हमें अपने घराने का हिस्सा बनाइए, और हमारे भीतर वह मंदिर रचिए जिसमें आप स्वयं निवास करें। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।

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इफिसियों 2 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

इफिसियों 2 किस विषय में है?
इफिसियों 2 एक ऐसे व्यक्ति के शब्द हैं जो जानता है कि आपके साथ क्या हो चुका है, इससे पहले कि आप खुद समझ पाएं। पौलुस लिखते हैं, "उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे" (पद 1)। ये कोई अलंकार नहीं है। यह कहता है कि आध्यात्मिक रूप से, हम जीवित नहीं थे। हम उस संसार की रीति पर चल रहे थे जो परमेश्वर से दूर है, अपनी ही इच्छाओं और मन की मनसाओं को पूरा करते हुए (पद 2-3)। पौलुस खुद को भी इसमें शामिल करता है, "हम भी सब के सब" वही करते थे।
इफिसियों 2 क्या कहता है?
पद 11 से आगे पौलुस एक और दीवार की बात करता है, यहूदियों और गैर-यहूदियों के बीच की। गैर-यहूदी पाठक इस्राएल की प्रतिज्ञाओं से "दूर" और "आशाहीन" थे (पद 12)। पर मसीह के लहू ने उन्हें निकट ला दिया (पद 13)। मसीह ने बीच की दीवार को ढा दिया, दोनों को एक नई जाति बना दिया, और क्रूस पर बैर को ही नाश कर दिया (पद 14-16)। अंत में पौलुस एक मंदिर की तस्वीर देता है, जहाँ प्रेरित और भविष्यद्वक्ता नींव हैं, मसीह कोने का पत्थर है, और हम सब मिलकर परमेश्वर का निवास-स्थान बनते जा रहे हैं (पद 19-22)।
इफिसियों 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यहाँ एक बात साफ समझ लेनी ज़रूरी है: उद्धार का क्रम उल्टा नहीं हो सकता। आप पहले अच्छे बनकर परमेश्वर के करीब नहीं आते। परमेश्वर पहले आपको जिलाता है, फिर भले काम आते हैं, जो "परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया" (पद 10)। यह क्रम बहुत कुछ बदल देता है। आप उद्धार के लिए काम नहीं कर रहे, आप उद्धार से काम कर रहे हैं।
किशोर इफिसियों 2 से क्या सीख सकते हैं?
शायद आप सोचते हों कि विश्वास एक प्रदर्शन है, कि परमेश्वर आपसे तब प्यार करेंगे जब आप काफी अच्छे बनेंगे। यह अध्याय उस सोच को जड़ से काटता है। आप पहले से मरे हुए थे, और परमेश्वर ने तब प्यार किया जब आपमें कुछ भी दिखाने लायक नहीं था। यह आपके परफॉर्मेंस के दबाव से आपको आज़ाद करता है। आपका उद्धार आपकी काबिलियत पर टिका नहीं है, और यह बात राहत की है, भले ही अहंकार को यह पसंद न आए।
इफिसियों 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
अगर उद्धार पूरी तरह अनुग्रह से है, कर्मों से नहीं, तो फिर भले काम क्यों ज़रूरी हैं? इस अध्याय के अनुसार उत्तर दीजिए।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 21

जिसमें सारी रचना एक साथ मिलकर प्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनती जाती है।" ध्यान दे, पौलुस कहता है "बनती जाती है", बन चुकी नहीं। तू अभी अधूरा लगता है, तो यही तो सच है। और एक पत्थर अकेले मन्दिर नहीं बनता। जिन लोगों से तू दूरी बनाए रखता है, परमेश्वर उन्हीं के साथ तुझे जोड़कर अपना घर खड़ा कर रहा है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

जिनमें तुम पहले इस संसार की रीति पर... चलते थे।" ध्यान दे, पौलुस ने "चलते थे" कहा, "चलते हो" नहीं। वह बहाव जो तुझे बहाए लिए जा रहा था, अब तेरे पीछे है। पर सच कह, क्या कुछ पुरानी आदतें अब भी तुझे खींचती हैं? मसीह ने तुझे उस धारा से निकाला है। अब बहने की नहीं, चलने की बारी है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

ताकि वह आनेवाले युगों में मसीह यीशु में हम पर दया के द्वारा अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए।" सोचो, परमेश्वर ने तुम्हें सिर्फ बचाया ही नहीं, उसने तुम्हें अपने अनुग्रह का नमूना बना दिया। जो कल तक अपराधों में मरा हुआ था, वही अब युगों तक यह गवाही देगा कि उसकी दया कितनी बड़ी है। तुम्हारी कहानी उसकी महिमा का सबूत है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

पौलुस "तुम" कहते कहते अचानक रुकता है और कहता है, "उनमें हम भी सब के सब पहले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे।" वह खुद को छूट नहीं देता। जो व्यवस्था का पालन करने वाला फरीसी था, वह भी उसी कतार में खड़ा है। जब तक हम दूसरों के पाप गिनते रहेंगे, कृपा सिर्फ एक शब्द रहेगी। जिस दिन "हम भी" कहना सीखेंगे, उस दिन वह जीवन बन जाएगी।

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