3 से 6 वर्ष के बच्चे के लिए

इफिसियों 2

नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

सुनो, एक कहानी है। बहुत दूर, एक अंधेरी जगह थी। वहाँ सन्नाटा था। गहरा सन्नाटा। कुछ बच्चे वहाँ पड़े थे। वे हिल नहीं सकते थे। वे बोल नहीं सकते थे। वे मरे हुए थे। जैसे गहरी नींद में। उन्होंने गलत बातें सुनी थीं। उन्होंने गलत काम किए थे। इस दुनिया की खराब बातें मानी थीं। वे परमेश्वर से दूर थे। बहुत दूर। बिल्कुल अंधेरे में, ठंडे और उदास। कोई रोशनी नहीं थी। कोई आवाज़ नहीं थी।

पर परमेश्वर ने उन्हें देखा। परमेश्वर का प्यार बहुत बड़ा है। समुंदर से भी बड़ा। आसमान से भी ऊँचा। उनके हृदय में दया थी। मीठी, गरम दया, धूप जैसी। परमेश्वर ने अपना हाथ बढ़ाया। धीरे से। प्यार से। और बच्चों को उठाया। यीशु मसीह के साथ उठाया। मरे हुओं को जिलाया! यह बहुत बड़ा चमत्कार था। बच्चों ने आँखें खोलीं। उजाला देखा। गरमी महसूस की। वे खड़े हो गए। परमेश्वर के पास, स्वर्ग में बैठाए गए।

इसका क्या अर्थ है?

सुनो, बच्चों ने कुछ नहीं किया था। उन्होंने कोई अच्छा काम नहीं किया। उन्होंने मदद नहीं माँगी थी। फिर भी परमेश्वर ने उन्हें उठाया। यह एक तोहफा था। बड़ा तोहफा। मुफ़्त तोहफा, मुफ़्त में दिया गया। किसी ने पैसे नहीं दिए। किसी ने मेहनत नहीं की। परमेश्वर ने सिर्फ़ प्यार से दिया। बस विश्वास करना था। और उनका हाथ थाम लेना था। कोई यह नहीं कह सकता, मैंने यह किया। कोई घमण्ड नहीं कर सकता। क्योंकि यह परमेश्वर का काम है।

मुख्य सूत्र

कुछ बच्चे दूर रहते थे, यहूदी नहीं थे। कुछ बच्चे पास रहते थे, यहूदी थे। वे एक दूसरे को नहीं जानते थे। उनके बीच एक बड़ी दीवार थी। ऊँची, मोटी, पत्थर की दीवार। पर यीशु मसीह आए। उन्होंने अपना खून दिया, क्रूस पर। और दीवार गिर गई। धड़ाम! दूर वाले पास आ गए। पास वाले और पास आ गए। अब सब एक साथ थे। यहूदी और अन्यजाति, अब भाई-बहन हैं। एक नए परिवार की तरह। सब मिलकर एक घर बनाते हैं। सब एक पवित्र मंदिर बनते हैं, परमेश्वर के लिए। यीशु मसीह उस घर का कोने का पत्थर हैं। सबसे मज़बूत पत्थर।

तुम्हारे लिए

तुम भी परमेश्वर के घर में हो। तुम उनके बच्चे हो, प्यारे बच्चे। तुम पवित्र आत्मा के द्वारा परमेश्वर का घर हो। सुबह जब तुम उठते हो, याद करो, परमेश्वर ने तुम्हें उठाया। प्यार से, धीरे से, हमेशा के लिए। आज किसी दोस्त को पास बुलाओ। जो अकेला बैठा है, उसे बुलाओ। जैसे यीशु ने तुम्हें बुलाया। उसके साथ खेलो, उसे गले लगाओ।

बात करें

परमेश्वर ने तुम्हें प्यार से कैसे उठाया? तुम किसको आज अपने पास बुलाओगे?

साथ प्रार्थना करें

प्रिय परमेश्वर, आपने मुझे प्यार से उठाया। धीरे से, जैसे आप उठाते हैं। धन्यवाद, परमेश्वर, इस बड़े तोहफे के लिए। मुझे हमेशा अपने घर में रखिए। आमीन।

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इफिसियों 2 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

इफिसियों 2 किस विषय में है?
सुनो, एक कहानी है। बहुत दूर, एक अंधेरी जगह थी। वहाँ सन्नाटा था। गहरा सन्नाटा। कुछ बच्चे वहाँ पड़े थे। वे हिल नहीं सकते थे। वे बोल नहीं सकते थे। वे मरे हुए थे। जैसे गहरी नींद में। उन्होंने गलत बातें सुनी थीं। उन्होंने गलत काम किए थे। इस दुनिया की खराब बातें मानी थीं। वे परमेश्वर से दूर थे। बहुत दूर। बिल्कुल अंधेरे में, ठंडे और उदास। कोई रोशनी नहीं थी। कोई आवाज़ नहीं थी।
इफिसियों 2 क्या कहता है?
पर परमेश्वर ने उन्हें देखा। परमेश्वर का प्यार बहुत बड़ा है। समुंदर से भी बड़ा। आसमान से भी ऊँचा। उनके हृदय में दया थी। मीठी, गरम दया, धूप जैसी। परमेश्वर ने अपना हाथ बढ़ाया। धीरे से। प्यार से। और बच्चों को उठाया। यीशु मसीह के साथ उठाया। मरे हुओं को जिलाया! यह बहुत बड़ा चमत्कार था। बच्चों ने आँखें खोलीं। उजाला देखा। गरमी महसूस की। वे खड़े हो गए। परमेश्वर के पास, स्वर्ग में बैठाए गए।
इफिसियों 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
सुनो, बच्चों ने कुछ नहीं किया था। उन्होंने कोई अच्छा काम नहीं किया। उन्होंने मदद नहीं माँगी थी। फिर भी परमेश्वर ने उन्हें उठाया। यह एक तोहफा था। बड़ा तोहफा। मुफ़्त तोहफा, मुफ़्त में दिया गया। किसी ने पैसे नहीं दिए। किसी ने मेहनत नहीं की। परमेश्वर ने सिर्फ़ प्यार से दिया। बस विश्वास करना था। और उनका हाथ थाम लेना था। कोई यह नहीं कह सकता, मैंने यह किया। कोई घमण्ड नहीं कर सकता। क्योंकि यह परमेश्वर का काम है।
नन्हे बच्चे इफिसियों 2 से क्या सीख सकते हैं?
कुछ बच्चे दूर रहते थे, यहूदी नहीं थे। कुछ बच्चे पास रहते थे, यहूदी थे। वे एक दूसरे को नहीं जानते थे। उनके बीच एक बड़ी दीवार थी। ऊँची, मोटी, पत्थर की दीवार। पर यीशु मसीह आए। उन्होंने अपना खून दिया, क्रूस पर। और दीवार गिर गई। धड़ाम! दूर वाले पास आ गए। पास वाले और पास आ गए। अब सब एक साथ थे। यहूदी और अन्यजाति, अब भाई-बहन हैं। एक नए परिवार की तरह। सब मिलकर एक घर बनाते हैं। सब एक पवित्र मंदिर बनते हैं, परमेश्वर के लिए। यीशु मसीह उस घर का कोने का पत्थर हैं। सबसे मज़बूत पत्थर।
इफिसियों 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
तुम भी परमेश्वर के घर में हो। तुम उनके बच्चे हो, प्यारे बच्चे। तुम पवित्र आत्मा के द्वारा परमेश्वर का घर हो। सुबह जब तुम उठते हो, याद करो, परमेश्वर ने तुम्हें उठाया। प्यार से, धीरे से, हमेशा के लिए। आज किसी दोस्त को पास बुलाओ। जो अकेला बैठा है, उसे बुलाओ। जैसे यीशु ने तुम्हें बुलाया। उसके साथ खेलो, उसे गले लगाओ।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहले से तैयार किया कि हम उनमें चलें।"

ध्यान दो, काम पहले से तैयार हैं, तुम्हें उन्हें गढ़ना नहीं, बस उनमें चलना है। अनुग्रह ने तुम्हें बचाया और वही तुम्हारे आगे रास्ता बिछाता है। आज जो छोटा सा मौका तुम्हारे सामने आया, क्या वह संयोग था, या तैयार किया हुआ कदम?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 6

और मसीह यीशु में उसके साथ उठाया, और स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बिठाया।" ध्यान दे, यह बात भविष्य की नहीं, बीत चुके समय की है। परमेश्वर ने पहले ही कर दिया। जो कल तक अपने अपराधों में मरा हुआ था, वह आज मसीह के साथ बैठा है। तू अपनी जगह पाने के लिए नहीं लड़ रहा, तुझे बिठाया जा चुका है। आज तेरे चलने में यह बैठक दिखती है क्या?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

उस समय तुम मसीह से अलग... और आशाहीन और जगत में परमेश्वर रहित थे।" पौलुस चाहता है कि तुम अपना पुराना पता याद रखो। जहाँ कोई वादा नहीं था, कोई घर नहीं था। यह याद इसलिए नहीं कि तुम शर्मिंदा रहो, बल्कि इसलिए कि आज जो तुम्हारे पास है वह तुमने कमाया नहीं, वह तुम्हें दिया गया है। कभी सोचा है, अगर मसीह न मिलते तो आज तुम कहाँ खड़े होते?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 20

जिसके कोने का पत्थर मसीह यीशु आप ही है।" कोने का पत्थर वह होता है जिससे हर दीवार की सीधाई नापी जाती है। अगर वह टेढ़ा हो, पूरी इमारत टेढ़ी हो जाती है। सोच, तेरी ज़िंदगी में किस चीज़ से तू नाप रहा है, लोगों की राय से, अपनी समझ से, या मसीह से? तू अकेली ईंट नहीं है, तू एक घर का हिस्सा है जिसे परमेश्वर खुद जोड़ रहा है।

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For parents and teachers: विशेष रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों को ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए लिखा गया। इसे अपने बच्चे के साथ बातचीत की शुरुआत के रूप में उपयोग करें, एकमात्र स्रोत के रूप में नहीं। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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