13 वर्ष और उससे बड़े किशोर के लिए

निर्गमन 9

किशोर (13 वर्ष और उससे बड़े) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

निर्गमन 9 में हम देखते हैं कि यहोवा मूसा के द्वारा फ़िरौन को लगातार चेतावनी देते रहे हैं। पहले दो विपत्तियों के बाद भी फ़िरौन का मन नहीं पिघला, तो अब कहानी आगे बढ़ती है। परमेश्वर कहते हैं कि अगर फ़िरौन ने इस्राएलियों को उपासना के लिए जाने न दिया, तो मिस्र के सारे पशु मरी से मर जाएँगे, लेकिन इस्राएलियों के पशुओं को कुछ नहीं होगा। ऐसा ही हुआ। फिर भी फ़िरौन का मन कठोर रहा।

इसके बाद फोड़ों की विपत्ति आती है। मूसा और हारून राख उड़ाते हैं, और वह मनुष्यों व पशुओं दोनों पर फोड़े बनकर निकलती है, यहाँ तक कि जादूगर भी मूसा के सामने खड़े नहीं रह सकते। फिर भी यहोवा फ़िरौन के मन को कठोर कर देते हैं।

फिर आती है ओलों की विपत्ति, जो इस अध्याय का केंद्र बिंदु है। यहाँ परमेश्वर पहले से चेतावनी देते हैं, "कल मैं इसी समय ऐसे भारी-भारी ओले बरसाऊँगा, कि जिनके तुल्य मिस्र की नींव पड़ने के दिन से लेकर अब तक कभी नहीं पड़े।" यह ध्यान देने योग्य है कि कुछ मिस्री अधिकारियों ने यहोवा के वचन का भय मानकर अपने पशुओं को घर में बंद कर लिया, जबकि दूसरों ने इसकी परवाह नहीं की। जब ओले, आग और गर्जन के साथ गिरे, तो जिन्होंने सावधानी बरती वे बच गए, और जिन्होंने नहीं बरती, उनके पशु और लोग मारे गए। गोशेन में, जहाँ इस्राएली रहते थे, कोई ओले नहीं गिरे।

इस बार फ़िरौन टूटता हुआ दिखता है। वह कबूल करता है, "यहोवा धर्मी है, और मैं और मेरी प्रजा अधर्मी हैं।" मूसा प्रार्थना करता है, ओले रुक जाते हैं। लेकिन जैसे ही संकट टलता है, फ़िरौन फिर से अपना मन कठोर कर लेता है।

इसका क्या अर्थ है?

यह अध्याय किसी आसान कहानी का हिस्सा नहीं है। यह दिखाता है कि इनकार करना एक आदत बन सकती है, कुछ ऐसा जो बार-बार दोहराने से व्यक्ति के भीतर जड़ पकड़ लेता है। फ़िरौन के पास बार-बार मौका था। उसने संकेत देखे, प्रमाण देखे, यहाँ तक कि सही शब्द भी बोले, "यहोवा धर्मी है।" परंतु शब्द बोलना और बदलना दो अलग बातें हैं। उसका पछतावा संकट के डर से निकला था, हृदय के बदलाव से नहीं।

परमेश्वर यहाँ स्पष्ट करते हैं कि यह केवल गुलामों की आज़ादी की बात नहीं है। वे कहते हैं, "जिससे तू जान ले कि सारी पृथ्वी पर मेरे तुल्य कोई दूसरा नहीं है।" यह विपत्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि परमेश्वर ही वास्तविक सत्ता रखते हैं, चाहे मिस्र के देवता कुछ भी दावा करें। और परमेश्वर यह भी कहते हैं कि उन्होंने फ़िरौन को जानबूझकर बचाए रखा है, "कि तुझे अपना सामर्थ्य दिखाऊँ।" यानी फ़िरौन का अहंकार भी किसी तरह परमेश्वर के बड़े मकसद का हिस्सा बन जाता है।

यह भी ध्यान देने लायक है कि परमेश्वर ने भेद किया, इस्राएल और मिस्र के बीच, जिन्होंने चेतावनी सुनी और जिन्होंने नहीं सुनी। यह दिखाता है कि संकट के बीच भी परमेश्वर अंधाधुंध सजा नहीं देते। जवाब देने का मौका हमेशा रहता है, भले ही वह मौका सीमित हो।

बड़ी कहानी से संबंध

इस पूरे वृत्तांत में हम रोमियों 9:18 का संदर्भ पाते हैं, जहाँ पौलुस फ़िरौन के इस कठोर होने की चर्चा करता है और परमेश्वर की संप्रभुता की बात करता है। यह एक कठिन धर्मशास्त्रीय विषय है, जिसे कोई आसान जवाब देकर चुप नहीं किया जा सकता। परंतु ध्यान दें कि फ़िरौन ने भी खुद अपना मन कठोर किया, और परमेश्वर ने भी। दोनों बातें एक साथ सच हैं, और यह हमें यह याद दिलाता है कि मनुष्य की जिम्मेदारी और परमेश्वर की संप्रभुता दोनों बाइबल में साथ-साथ चलती हैं, बिना एक दूसरे को नकारे।

आगे प्रकाशितवाक्य में भी ओलों और आग का उल्लेख मिलता है, जब अंतिम न्याय का समय आएगा। मिस्र पर आई विपत्तियाँ एक पूर्वझलक हैं कि अंत में परमेश्वर का न्याय पूरी पृथ्वी पर प्रकट होगा। लेकिन इस पूरी कहानी के पीछे एक बड़ा उद्धार भी छिपा है, क्योंकि यही परमेश्वर बाद में अपने पुत्र यीशु मसीह को भेजते हैं, जो स्वयं न्याय सहकर हमें छुड़ाते हैं। फ़िरौन ने दया के मौके ठुकराए, पर क्रूस पर दिखाया गया कि परमेश्वर न्याय और दया दोनों को पूरी तरह पूरा कर सकते हैं।

तुम्हारे लिए

फ़िरौन की कहानी पढ़कर दूर से उस पर हँसना आसान है, पर खुद से पूछना ज़्यादा ईमानदार है, क्या तुम भी कभी वही करते हो। कितनी बार हम सच को पहचान लेते हैं, उसे मान भी लेते हैं शब्दों में, पर फिर संकट टलते ही पुरानी आदत में लौट जाते हैं। शायद यह किसी रिश्ते में हो, किसी आदत में हो, या परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते में ही हो। यह अध्याय पूछता है कि क्या तुम्हारा पछतावा सच में बदलाव की ओर ले जाता है, या केवल डर के क्षण भर के लिए है।

आपस में चर्चा करो

फ़िरौन ने कहा "यहोवा धर्मी है," पर फिर भी वह नहीं बदला। क्या तुम्हारे जीवन में ऐसा कोई क्षण है जब तुमने सही बात मान ली, पर व्यवहार नहीं बदला?

परमेश्वर ने इस्राएल और मिस्र के बीच भेद किया, पर यह भेद चेतावनी सुनने और न सुनने पर भी निर्भर था। इसका क्या मतलब है तुम्हारे लिए, जब परमेश्वर तुमसे कुछ कहते हैं?

एक साथ प्रार्थना

प्रभु, हमें ईमानदार बनाइए। हमें वह साहस दीजिए जो केवल सही शब्द बोलने से संतुष्ट नहीं होता, बल्कि सच में बदलने की इच्छा रखता है। जब हमारा मन कठोर होने लगे, तो हमें झकझोर दीजिए, और हमें याद दिलाइए कि आप ही धर्मी हैं और आप ही सच्चे परमेश्वर हैं। आमीन।

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निर्गमन 9 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

निर्गमन 9 किस विषय में है?
निर्गमन 9 में हम देखते हैं कि यहोवा मूसा के द्वारा फ़िरौन को लगातार चेतावनी देते रहे हैं। पहले दो विपत्तियों के बाद भी फ़िरौन का मन नहीं पिघला, तो अब कहानी आगे बढ़ती है। परमेश्वर कहते हैं कि अगर फ़िरौन ने इस्राएलियों को उपासना के लिए जाने न दिया, तो मिस्र के सारे पशु मरी से मर जाएँगे, लेकिन इस्राएलियों के पशुओं को कुछ नहीं होगा। ऐसा ही हुआ। फिर भी फ़िरौन का मन कठोर रहा।
निर्गमन 9 क्या कहता है?
इस बार फ़िरौन टूटता हुआ दिखता है। वह कबूल करता है, "यहोवा धर्मी है, और मैं और मेरी प्रजा अधर्मी हैं।" मूसा प्रार्थना करता है, ओले रुक जाते हैं। लेकिन जैसे ही संकट टलता है, फ़िरौन फिर से अपना मन कठोर कर लेता है।
निर्गमन 9 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह भी ध्यान देने लायक है कि परमेश्वर ने भेद किया, इस्राएल और मिस्र के बीच, जिन्होंने चेतावनी सुनी और जिन्होंने नहीं सुनी। यह दिखाता है कि संकट के बीच भी परमेश्वर अंधाधुंध सजा नहीं देते। जवाब देने का मौका हमेशा रहता है, भले ही वह मौका सीमित हो।
किशोर निर्गमन 9 से क्या सीख सकते हैं?
फ़िरौन की कहानी पढ़कर दूर से उस पर हँसना आसान है, पर खुद से पूछना ज़्यादा ईमानदार है, क्या तुम भी कभी वही करते हो। कितनी बार हम सच को पहचान लेते हैं, उसे मान भी लेते हैं शब्दों में, पर फिर संकट टलते ही पुरानी आदत में लौट जाते हैं। शायद यह किसी रिश्ते में हो, किसी आदत में हो, या परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते में ही हो। यह अध्याय पूछता है कि क्या तुम्हारा पछतावा सच में बदलाव की ओर ले जाता है, या केवल डर के क्षण भर के लिए है।
निर्गमन 9 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
प्रभु, हमें ईमानदार बनाइए। हमें वह साहस दीजिए जो केवल सही शब्द बोलने से संतुष्ट नहीं होता, बल्कि सच में बदलने की इच्छा रखता है। जब हमारा मन कठोर होने लगे, तो हमें झकझोर दीजिए, और हमें याद दिलाइए कि आप ही धर्मी हैं और आप ही सच्चे परमेश्वर हैं। आमीन।

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