12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

रोमियों 10

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस इस अध्याय में कुछ बहुत निजी बात कहते हैं। वे अपने ही लोगों, इस्राएलियों के लिए तड़प रहे हैं। वे कहते हैं कि इन लोगों में परमेश्वर के लिए जोश तो है, धुन तो है, पर वह धुन समझदारी के साथ नहीं है। यह एक अजीब वाक्य है। धार्मिक होना और सही होना, ये दो अलग बातें हो सकती हैं। इस्राएलियों ने व्यवस्था का पालन करके अपनी धार्मिकता खुद बनाने की कोशिश की, जबकि परमेश्वर पहले से ही एक धार्मिकता दे रहे थे, विश्वास के द्वारा।

पौलुस फिर एक गहरी बात कहते हैं, मसीह व्यवस्था का अन्त है। यानी यीशु मसीह में वह पूरा हो गया जो व्यवस्था कभी पूरा नहीं कर सकी। मूसा ने लिखा था कि जो व्यवस्था का पालन करे, वह उससे जीवित रहेगा, पर कोई भी इंसान उसे पूरी तरह पालन नहीं कर सकता। इसलिए विश्वास की धार्मिकता एक अलग रास्ता खोलती है। इसे स्वर्ग पर चढ़ने या अधोलोक में उतरने जैसी असंभव यात्रा नहीं करनी, क्योंकि वह वचन पहले से ही निकट है, मुख में और मन में।

इसके बाद वह वाक्य आता है जो पूरे अध्याय का केंद्र है। यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु मानकर अंगीकार करे, और अपने मन से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया, तो तू उद्धार पाएगा। मन से विश्वास, मुँह से अंगीकार, ये दोनों साथ चलते हैं। यह कोई गुप्त भावना नहीं है जो अंदर ही अंदर रह जाए, बल्कि कुछ ऐसा है जो कहा भी जाता है।

पौलुस आगे कहते हैं कि यहूदी और यूनानी में कोई भेद नहीं, प्रभु सबका है और जो भी उनका नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा। पर फिर एक तार्किक सिलसिला आता है, विश्वास कैसे आता है? जिसका नाम सुना ही नहीं, उस पर विश्वास कैसे करें? जिसने प्रचार नहीं किया, उसे कैसे सुनें? इसलिए विश्वास सुनने से आता है, और सुनना मसीह के वचन से। अंत में पौलुस इस्राएल की स्थिति पर लौटते हैं, यशायाह और मूसा के शब्दों के सहारे दिखाते हैं कि परमेश्वर ने हाथ फैलाए रखे, पर लोग नहीं माने।

इसका क्या अर्थ है?

यह अध्याय एक कठिन सच्चाई को सामने रखता है, अच्छी मंशा काफी नहीं है। इस्राएलियों की धुन झूठी नहीं थी, पर वह गलत दिशा में लगी थी। वे अपनी ही धार्मिकता बनाने में लगे रहे, जबकि परमेश्वर पहले से कुछ दे रहे थे। यह आज भी हो सकता है। कोई भी अपने प्रदर्शन से, अपने अच्छे कामों से, अपनी नैतिक सफलता से खुद को परमेश्वर के सामने स्वीकार्य बनाने की कोशिश कर सकता है। पौलुस कहते हैं कि यह रास्ता थका देने वाला और असंभव है, क्योंकि व्यवस्था का पूरा पालन किसी से नहीं होता।

दूसरी तरफ विश्वास का रास्ता सरल नहीं, पर पहुँच में है। वचन दूर नहीं, निकट है। यह किसी असाधारण आध्यात्मिक अनुभव या किसी असंभव खोज पर निर्भर नहीं है। यह उस सत्य को स्वीकार करने पर निर्भर है जो पहले से घोषित हो चुका है, यीशु मसीह प्रभु हैं, और परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया।

सूत्र

यह पूरा अध्याय यीशु मसीह की ओर इशारा करता है। व्यवस्था का अन्त वे स्वयं हैं, न इस अर्थ में कि वह रद्द हो गई, बल्कि इस अर्थ में कि जो लक्ष्य व्यवस्था दिखाती थी, वह लक्ष्य उनमें पूरा हो गया। यशायाह और योएल और मूसा के पुराने शब्द अचानक नए अर्थ में जीवित हो उठते हैं, क्योंकि जिसका नाम लेने से उद्धार मिलता है वह अब एक ऐतिहासिक व्यक्ति है, एक क्रूस पर मरा और तीसरे दिन जी उठा प्रभु। परमेश्वर की प्रतिज्ञा कि वे उन पर प्रगट होंगे जो उन्हें ढूँढ़ते भी न थे, यीशु में पूरी हुई, क्योंकि वे उन तक भी पहुँचे जिन्होंने कभी उनकी खोज नहीं की।

तुम्हारे लिए

तुम्हारी उम्र में एक दबाव होता है, अच्छा दिखने का, सही होने का, अपने आप को साबित करने का। यह दबाव विश्वास के अंदर भी घुस सकता है, जैसे परमेश्वर के सामने भी हमें कुछ बनकर दिखाना है। यह अध्याय उस दबाव को तोड़ता है। परमेश्वर के सामने खड़े होने का रास्ता प्रदर्शन नहीं, विश्वास है। मन से मानना और मुँह से कहना, यह छिपा नहीँ रह सकता। शायद तुम्हारे लिए यह चुनौती है कि विश्वास केवल एक निजी भावना नहीं रह सकता, कभी उसे शब्दों में भी आना पड़ता है, किसी दोस्त से, किसी बहस में, किसी सवाल के जवाब में। और यह भी याद रखने लायक है कि विश्वास सुनने से आता है। जो वचन नहीं सुनता, वह विश्वास नहीं कर सकता। इसलिए यह सवाल पूछने लायक है, क्या मैं वह वचन सुनने की जगह बनाता हूँ, या मेरी जिंदगी में इतना शोर है कि वह वचन कभी पहुँच ही नहीं पाता।

बातचीत के लिए

तुम्हारी जिंदगी में ऐसी कौन सी जगहें हैं जहाँ तुम अपने प्रदर्शन से, अपनी सफलता से खुद को साबित करने की कोशिश करते हो, चाहे परमेश्वर के सामने हो या दुनिया के सामने?

क्या तुमने कभी अपने विश्वास को शब्दों में, किसी दूसरे इंसान के सामने अंगीकार किया है? क्या रोकता है, या क्या मुश्किल लगता है?

साथ में प्रार्थना

हे परमेश्वर, हम अक्सर अपनी ही धार्मिकता बनाने में लगे रहते हैं, अपने प्रदर्शन से आपके सामने खड़ा होना चाहते हैं। हमें याद दिलाइए कि आपका वचन दूर नहीं, हमारे निकट है। हमें विश्वास दीजिए जो केवल मन में न रहे, बल्कि मुँह से भी निकले। और हमें ऐसे कान दीजिए जो आपके वचन को सुनने के लिए खुले रहें। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।

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रोमियों 10 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

रोमियों 10 किस विषय में है?
पौलुस इस अध्याय में कुछ बहुत निजी बात कहते हैं। वे अपने ही लोगों, इस्राएलियों के लिए तड़प रहे हैं। वे कहते हैं कि इन लोगों में परमेश्वर के लिए जोश तो है, धुन तो है, पर वह धुन समझदारी के साथ नहीं है। यह एक अजीब वाक्य है। धार्मिक होना और सही होना, ये दो अलग बातें हो सकती हैं। इस्राएलियों ने व्यवस्था का पालन करके अपनी धार्मिकता खुद बनाने की कोशिश की, जबकि परमेश्वर पहले से ही एक धार्मिकता दे रहे थे, विश्वास के द्वारा।
रोमियों 10 क्या कहता है?
इसके बाद वह वाक्य आता है जो पूरे अध्याय का केंद्र है। यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु मानकर अंगीकार करे, और अपने मन से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया, तो तू उद्धार पाएगा। मन से विश्वास, मुँह से अंगीकार, ये दोनों साथ चलते हैं। यह कोई गुप्त भावना नहीं है जो अंदर ही अंदर रह जाए, बल्कि कुछ ऐसा है जो कहा भी जाता है।
रोमियों 10 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय एक कठिन सच्चाई को सामने रखता है, अच्छी मंशा काफी नहीं है। इस्राएलियों की धुन झूठी नहीं थी, पर वह गलत दिशा में लगी थी। वे अपनी ही धार्मिकता बनाने में लगे रहे, जबकि परमेश्वर पहले से कुछ दे रहे थे। यह आज भी हो सकता है। कोई भी अपने प्रदर्शन से, अपने अच्छे कामों से, अपनी नैतिक सफलता से खुद को परमेश्वर के सामने स्वीकार्य बनाने की कोशिश कर सकता है। पौलुस कहते हैं कि यह रास्ता थका देने वाला और असंभव है, क्योंकि व्यवस्था का पूरा पालन किसी से नहीं होता।
किशोर रोमियों 10 से क्या सीख सकते हैं?
यह पूरा अध्याय यीशु मसीह की ओर इशारा करता है। व्यवस्था का अन्त वे स्वयं हैं, न इस अर्थ में कि वह रद्द हो गई, बल्कि इस अर्थ में कि जो लक्ष्य व्यवस्था दिखाती थी, वह लक्ष्य उनमें पूरा हो गया। यशायाह और योएल और मूसा के पुराने शब्द अचानक नए अर्थ में जीवित हो उठते हैं, क्योंकि जिसका नाम लेने से उद्धार मिलता है वह अब एक ऐतिहासिक व्यक्ति है, एक क्रूस पर मरा और तीसरे दिन जी उठा प्रभु। परमेश्वर की प्रतिज्ञा कि वे उन पर प्रगट होंगे जो उन्हें ढूँढ़ते भी न थे, यीशु में पूरी हुई, क्योंकि वे उन तक भी पहुँचे जिन्होंने कभी उनकी खोज नहीं की।
रोमियों 10 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
तुम्हारी जिंदगी में ऐसी कौन सी जगहें हैं जहाँ तुम अपने प्रदर्शन से, अपनी सफलता से खुद को साबित करने की कोशिश करते हो, चाहे परमेश्वर के सामने हो या दुनिया के सामने?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

वह सब का प्रभु है और अपने सब नाम लेनेवालों के लिये उदार है।" पौलुस यह उन लोगों से कह रहा था जो जाति और परंपरा के आधार पर खुद को दूसरों से ऊँचा समझते थे। परमेश्वर के पास कोई ऊँची पंक्ति नहीं है, कोई पिछड़ी कतार नहीं। तेरी जाति, तेरा गाँव, तेरा बीता हुआ जीवन उसकी उदारता की सीमा तय नहीं करते। तू पुकार, वह सुनता है। सवाल यह है कि जिन्हें तू अपने से छोटा मानता है, उनके लिए भी तेरा दिल इतना ही खुला है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 21

मैं सारे दिन अपने हाथ एक आज्ञा न माननेवाली और विवाद करनेवाली प्रजा की ओर बढ़ाए रहा।" सोचो, हाथ फैलाए रखना कितना थका देता है। परमेश्वर सारे दिन ऐसे ही खड़ा रहा, बुलाता रहा, और लोग मुँह फेरते रहे। तुम्हारी ओर भी वे हाथ अब तक फैले हैं। सवाल यह नहीं कि वह कब तक रुकेगा, सवाल यह है कि तुम कब तक टालोगे।

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For parents and teachers: किशोरों और युवाओं के लिए लिखा गया। युवा समूह, कन्फर्मेशन कक्षा, या व्यक्तिगत बाइबल अध्ययन के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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