लूका 6
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
समझाइए
लूका 6 में तीन अलग-अलग दृश्य आते हैं, पर उनमें एक ही आदमी की एक ही पहचान उजागर होती है। पहला दृश्य सब्त के दिन का है। यीशु के चेले खेत से चलते हुए बालें तोड़कर खा रहे हैं, और फरीसी तुरंत उंगली उठाते हैं, "यह सब्त के दिन उचित नहीं।" यीशु उत्तर में दाऊद की कहानी याद दिलाते हैं, जब दाऊद और उसके साथियों ने भूख में वह रोटी खाई जो सिर्फ याजकों के लिए थी। बात साफ है, नियम का मतलब कभी यह नहीं था कि इंसान की ज़रूरत को कुचल दिया जाए। फिर यीशु एक बड़ा दावा करते हैं, "मनुष्य का पुत्र सब्त के दिन का भी प्रभु है।" यानी वे नियम के नीचे नहीं, नियम के ऊपर खड़े हैं।
दूसरा दृश्य आराधनालय में है। एक आदमी है जिसका दाहिना हाथ सूखा हुआ है, बेकार। शास्त्री और फरीसी घात लगाकर बैठे हैं, देखना चाहते हैं कि यीशु सब्त तोड़ेंगे या नहीं। यीशु उनके विचार जानते हैं, और सीधा सवाल पूछते हैं, "भला करना या बुरा करना, कौन-सा उचित है?" फिर वे उस आदमी को चंगा कर देते हैं, वहीं, सबके सामने। उत्तर में सिर्फ गुस्सा और साज़िश मिलती है, "हम यीशु के साथ क्या करें?"
तीसरा हिस्सा है बारह प्रेरितों का चुनाव, जिसके पहले यीशु पूरी रात पहाड़ पर प्रार्थना में बिताते हैं। फिर वे नीचे उतरकर एक बड़ी भीड़ के सामने वह उपदेश देते हैं जिसे हम "मैदान का उपदेश" कहते हैं। इसमें आशीषें हैं और हाय भी। दीन, भूखे, रोनेवाले धन्य कहलाते हैं, जबकि धनवान और तृप्त और हँसनेवालों पर हाय की चेतावनी है। फिर आता है वह हिस्सा जो सबसे ज़्यादा चुभता है, शत्रुओं से प्रेम रखना, गाल पर थप्पड़ खाकर भी दूसरा गाल फेर देना, बदले की उम्मीद के बिना देना। अंत में दो चित्र हैं, अंधा अंधे को राह नहीं दिखा सकता, और दो घरों की तुलना, एक चट्टान पर बना, दूसरा बिना नींव की मिट्टी पर।
इसका मतलब क्या है?
यह अध्याय बताता है कि यीशु किसी धार्मिक व्यवस्था के पालनकर्ता नहीं हैं, वे उस व्यवस्था के मालिक हैं। सब्त इंसान के भले के लिए बनाया गया था, न कि इंसान को कुचलने के लिए। जब नियम और दया आमने-सामने आते हैं, यीशु हमेशा दया चुनते हैं, और यही उनकी पहचान है।
फिर जब वे प्रेरितों को चुनने से पहले पूरी रात प्रार्थना करते हैं, यह दिखाता है कि यीशु का हर बड़ा फैसला परमेश्वर के साथ गहरी बातचीत से निकलता है। और उपदेश में जो कहा जाता है, वह किसी सुंदर नैतिक सलाह से कहीं ज़्यादा गहरा है। यह इंसान की दुनिया के हिसाब को पूरी तरह उलट देता है। दुनिया कहती है कि जो पास है, जो हँस रहा है, जिसकी तारीफ हो रही है, वही सफल है। यीशु कहते हैं कि परमेश्वर का राज्य उलटी दिशा से काम करता है।
और शत्रुओं से प्रेम की बात कोई रोमांटिक आदर्शवाद नहीं है। यह इस बात की गवाही है कि परमेश्वर स्वयं वैसे ही हैं, "बुरों पर भी कृपालु है।" यीशु यहाँ अपने पिता का चरित्र दिखा रहे हैं।
बड़ी कहानी से जोड़
पूरे अध्याय में एक धागा चलता है, यीशु वह हैं जिनके सामने हर नियम, हर व्यवस्था झुक जाती है, क्योंकि वे स्वयं उस व्यवस्था को देनेवाले हैं। यह वही परमेश्वर हैं जिन्होंने पुराने नियम में दया और न्याय की बात की थी, अब मांस में आकर उसे जीवित करके दिखा रहे हैं। सूखे हाथवाले आदमी का चंगा होना कोई अलग घटना नहीं, यह उस बड़ी प्रतिज्ञा का हिस्सा है कि परमेश्वर टूटे हुओं को जोड़ने आए हैं।
और अंत में जो चट्टान पर बने घर की बात है, वह चट्टान कोई नियमों की किताब नहीं, वह यीशु स्वयं हैं। जो उनकी बातें सुनता और मानता है, वह उस नींव पर खड़ा है जो आँधी में भी नहीं हिलती।
तुम्हारे लिए
तुम्हारी ज़िंदगी में ऐसे लोग होंगे जिनसे तुम्हें चोट मिली है, शायद स्कूल में, शायद घर में, शायद ऑनलाइन। यीशु यहाँ कोई हल्की बात नहीं कह रहे। वे कह रहे हैं कि तुम उनसे भी प्रेम रखो, उनके लिए प्रार्थना करो। यह कमज़ोरी नहीं है, यह वह ताकत है जो सिर्फ परमेश्वर की संतान में हो सकती है।
अपनी ज़िंदगी में यह भी देखो कि तुम किस चीज़ को अपनी नींव बना रहे हो। परीक्षा के नंबर, सोशल मीडिया की पसंद, दोस्तों की मान्यता, यह सब मिट्टी है। सिर्फ वही जो यीशु की बातों पर खड़ा होता है, आँधी में टिकता है।
बात करने के लिए
अगर कोई तुमसे बुरा व्यवहार करे, तो तुम्हारा पहला जवाब क्या होता है? यीशु की बात सुनने के बाद वह कैसे बदल सकता है?
तुम्हारी ज़िंदगी की नींव अभी किस चीज़ पर टिकी है, चट्टान पर या मिट्टी पर, और तुम इसे कैसे पहचान सकते हो?
साथ प्रार्थना करें
प्रभु, आप कृपालु हैं, तब भी जब हम उसके योग्य नहीं। हमें सिखाएँ कि हम अपने शत्रुओं से भी प्रेम रख सकें, और अपनी ज़िंदगी की नींव आपकी बातों पर रख सकें, ताकि जब आँधी आए तो हम टिके रहें। आमीन।
लूका 6 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
लूका 6 किस विषय में है?
लूका 6 क्या कहता है?
लूका 6 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर लूका 6 से क्या सीख सकते हैं?
लूका 6 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
क्षमा करो, तो तुम्हारी भी क्षमा की जाएगी।" ध्यान दे, यीशु पहले दो बातें रोकने को कहते हैं, दोष लगाना और अपराधी ठहराना। पर तीसरी बात करने को कहते हैं। चुप रह जाना काफी नहीं है। जिस व्यक्ति का नाम अभी तेरे मन में आया, उसके बारे में तू कुछ न कहे, यह तो शुरुआत है। असली काम है उसे छोड़ देना, जैसे परमेश्वर ने तुझे छोड़ दिया।
यीशु यह नहीं कहते कि भाई की आँख का तिनका पड़ा रहने दे। वह कहते हैं, "पहले अपनी आँख से लट्ठा निकाल ले, तब जो तिनका तेरे भाई की आँख में है, भली भाँति देखकर निकाल सकेगा।" सुधारना मना नहीं है, अंधे होकर सुधारना मना है। आँख बहुत कोमल चीज़ है। जिस हाथ ने अपनी पीड़ा पहचानी हो, वही किसी और की आँख छूने के योग्य है।
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