12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

मत्ती 5

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

The Explanation

पहाड़ पर बैठकर यीशु ने जो सिखाया, वह इतिहास का सबसे प्रसिद्ध उपदेश है। और यह ऐसा उपदेश है जो शुरू से ही सब कुछ उलट देता है। दुनिया कहती है, "धन्य हैं वे जो ताकतवर हैं, अमीर हैं, जिनके पास फॉलोअर्स हैं।" यीशु कहते हैं, "धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं।" यानी वे जो जानते हैं कि उनके पास परमेश्वर के सामने दिखाने को कुछ नहीं है।

फिर एक के बाद एक ये आशीषें आती हैं। जो शोक करते हैं, जो नम्र हैं, जो धार्मिकता के भूखे हैं, जो दयावन्त हैं, जिनके मन शुद्ध हैं, जो मेल करवानेवाले हैं, जो सताए जाते हैं। यीशु उन लोगों को धन्य कहते हैं जिन्हें दुनिया आमतौर पर नज़रअंदाज़ करती है।

इसके बाद वे अपने चेलों से कहते हैं कि तुम पृथ्वी के नमक हो और जगत की ज्योति हो। नमक स्वाद देता है और सड़न रोकता है। ज्योति अंधकार में रास्ता दिखाती है। छिपाई नहीं जा सकती।

फिर यीशु व्यवस्था के बारे में बात करते हैं। वे उसे मिटाने नहीं आए, बल्कि पूरा करने आए हैं। और अब वे कुछ ऐसा करते हैं जो सुननेवालों को हिला देता है। वे बार-बार कहते हैं, "तुम सुन चुके हो कि कहा गया था… परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ।" और हर बार वे आज्ञा को गहरा करते हैं।

हत्या न करना? यीशु कहते हैं, गुस्सा भी हत्या की जड़ है। व्यभिचार न करना? यीशु कहते हैं, बुरी दृष्टि भी उतनी ही गंभीर है। झूठी शपथ न खाना? यीशु कहते हैं, बिल्कुल शपथ ही मत खाओ, तुम्हारी हाँ हाँ हो, नहीं नहीं। बदला लेने के बारे में? दूसरा गाल भी फेर दो। पड़ोसी से प्रेम? अपने बैरियों से भी प्रेम करो।

और अंत में एक ऐसा वाक्य जो साँस अटका देता है: "इसलिए चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है।"

What Does This Mean?

अगर तुम इस अध्याय को ईमानदारी से पढ़ो, तो एक ही प्रतिक्रिया संभव है: यह असंभव है। कौन कभी गुस्सा नहीं होता? कौन कभी किसी को गलत नज़र से नहीं देखता? कौन सचमुच अपने दुश्मन से प्रेम करता है?

यही तो बात है। यीशु यहाँ धर्म का एक नया, थोड़ा-कठिन संस्करण पेश नहीं कर रहे। वे यह दिखा रहे हैं कि परमेश्वर का राज्य कैसा दिखता है, और वह हमारी सतही धार्मिकता से कितना अलग है। फरीसी लोग नियमों के बाहरी पालन में माहिर थे। यीशु कहते हैं, "तुम्हारी धार्मिकता उनसे बढ़कर होनी चाहिए।" यानी दिल से।

यीशु सिर्फ काम नहीं देखते, वे मन देखते हैं। और यही डरावना है, और यही मुक्ति भी है। क्योंकि जब हमें एहसास होता है कि हम इस मानक तक कभी नहीं पहुँच सकते, तब हम पहली आशीष पर लौटते हैं: "धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं।" यानी वे जो जानते हैं कि उन्हें मदद चाहिए।

The Common Thread

पहाड़ी उपदेश कोई अलग-थलग नैतिक भाषण नहीं है। यह यीशु का घोषणापत्र है, वे किस तरह के राज्य को लाने आए हैं इसका खाका। और यहाँ एक गहरा विरोधाभास है: यीशु वह मानक बताते हैं जिसे कोई पूरा नहीं कर सकता, और फिर वे स्वयं वह मानक जीते हैं।

वे ही असल में मन के दीन थे। वे ही शोक करनेवाले थे। वे ही नम्र थे, दयावन्त, शुद्ध मन के, मेल करवानेवाले। वे ही धार्मिकता के कारण सताए गए। और सबसे बड़ी बात, जब उन्हें थप्पड़ मारा गया, तब उन्होंने सचमुच दूसरा गाल फेरा। जब उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया, तब उन्होंने अपने बैरियों के लिए प्रार्थना की, "हे पिता, इन्हें क्षमा कर।"

यीशु व्यवस्था को मिटाने नहीं आए, पूरा करने आए। और उन्होंने उसे हमारे लिए पूरा किया। जो सिद्धता वे हमसे माँगते हैं, वे स्वयं वह सिद्धता हैं। और जब हम उन पर भरोसा करते हैं, तो उनकी धार्मिकता हमारी हो जाती है।

For You

यह अध्याय आराम के लिए नहीं लिखा गया। यह तुम्हारे भीतर जाकर वहाँ खोदता है जहाँ तुम आमतौर पर किसी को नहीं आने देते।

वह लड़का जिसने तुम्हें ग्रुप चैट से निकाल दिया। वह लड़की जिसने तुम्हारे बारे में झूठ फैलाया। वह टीचर जिसने अन्याय किया। वह भाई या बहन जिसके साथ बात करना बंद हो गया है। यीशु तुम्हारे कंधे पर हाथ रखकर कहते हैं, "मैं जानता हूँ। और मैं तुमसे कहता हूँ, माफ कर दो। प्रार्थना करो। मेल करो।"

और वह गुप्त ज़िंदगी जो तुम्हारे फोन पर है, वे वीडियो, वे संदेश, वे विचार जो कोई नहीं देखता? यीशु कहते हैं, मैं देखता हूँ। और यह मायने रखता है।

लेकिन यह अध्याय पढ़ने के बाद अगर तुम्हें लगे "मैं कभी इतना अच्छा नहीं हो सकता", तो तुमने ठीक समझा है। तुम नहीं हो सकते। इसीलिए यीशु आए। तुम्हें सबसे पहले उनके पास आकर कहना है, "मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।" फिर वे अपने आत्मा से तुम्हें भीतर से बदलना शुरू करते हैं। नमक और ज्योति बनना तुम्हारी उपलब्धि नहीं है, यह उनका काम है जो तुम्हारे भीतर होता है।

एक जगह से शुरू करो। एक रिश्ता जहाँ मेल करना है। एक आदत जो अंधेरे में पलती है। एक व्यक्ति जिसके लिए तुम प्रार्थना करने से बचते हो। वहीं से।

Talk About It

यीशु कहते हैं कि गुस्सा भी हत्या की श्रेणी में आता है और बुरी दृष्टि भी व्यभिचार है। क्या तुम्हें यह अतिशयोक्ति लगती है, या यीशु कुछ ऐसा देख रहे हैं जो हम नहीं देखते? इसका तुम्हारे अपने जीवन के लिए क्या मतलब है?

*"अपने बैरियों से प्रेम रखो" – क्या यह वास्तव में संभव है, या यह सिर्फ एक आद

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मत्ती 5 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

मत्ती 5 किस विषय में है?
पहाड़ पर बैठकर यीशु ने जो सिखाया, वह इतिहास का सबसे प्रसिद्ध उपदेश है। और यह ऐसा उपदेश है जो शुरू से ही सब कुछ उलट देता है। दुनिया कहती है, "धन्य हैं वे जो ताकतवर हैं, अमीर हैं, जिनके पास फॉलोअर्स हैं।" यीशु कहते हैं, "धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं।" यानी वे जो जानते हैं कि उनके पास परमेश्वर के सामने दिखाने को कुछ नहीं है।
मत्ती 5 क्या कहता है?
हत्या न करना? यीशु कहते हैं, गुस्सा भी हत्या की जड़ है। व्यभिचार न करना? यीशु कहते हैं, बुरी दृष्टि भी उतनी ही गंभीर है। झूठी शपथ न खाना? यीशु कहते हैं, बिल्कुल शपथ ही मत खाओ, तुम्हारी हाँ हाँ हो, नहीं नहीं। बदला लेने के बारे में? दूसरा गाल भी फेर दो। पड़ोसी से प्रेम? अपने बैरियों से भी प्रेम करो।
मत्ती 5 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यीशु सिर्फ काम नहीं देखते, वे मन देखते हैं। और यही डरावना है, और यही मुक्ति भी है। क्योंकि जब हमें एहसास होता है कि हम इस मानक तक कभी नहीं पहुँच सकते, तब हम पहली आशीष पर लौटते हैं: "धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं।" यानी वे जो जानते हैं कि उन्हें मदद चाहिए।
किशोर मत्ती 5 से क्या सीख सकते हैं?
यह अध्याय आराम के लिए नहीं लिखा गया। यह तुम्हारे भीतर जाकर वहाँ खोदता है जहाँ तुम आमतौर पर किसी को नहीं आने देते।
मत्ती 5 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
एक जगह से शुरू करो। एक रिश्ता जहाँ मेल करना है। एक आदत जो अंधेरे में पलती है। एक व्यक्ति जिसके लिए तुम प्रार्थना करने से बचते हो। वहीं से।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय

What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 42

जो कोई तुझसे माँगे, उसे दे; और जो तुझसे उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।"

ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि कितना दे। वे हाथ की नहीं, चेहरे की बात करते हैं। क्योंकि हम अक्सर पैसे से पहले अपनी नज़रें छिपा लेते हैं, सुनने से पहले ही भीतर से मुकर जाते हैं।

आज किसी की ज़रूरत तुझ तक आए, तो पहले उसकी आँखों में देख। देना उसके बाद आसान लगेगा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

यीशु ने "बाईं" नहीं, "दाहिनी आँख" कहा। यानी वह जो सबसे कीमती है, जिस पर तू सबसे ज़्यादा भरोसा करता है। पाप हमें कभी बेकार चीज़ों से नहीं, अपनी प्रिय चीज़ों से फँसाता है। "उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे।" सोच, आज तेरे हाथ में वह क्या है जिसे तू छोड़ना नहीं चाहता, पर जो तुझे धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर खींच रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 32

यीशु के समय पत्नी को त्यागपत्र देना आसान था, और छोड़ी गई स्त्री के पास न सहारा था, न सम्मान। इसलिए यीशु कहते हैं, "जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है।" दोष उस पर डाला गया जिसने छोड़ा। क्या तेरे रिश्तों में भी कोई है जिसे तूने सुविधा से छोड़ दिया, और परमेश्वर उसका दर्द अब भी देख रहा है?

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For parents and teachers: किशोरों और युवाओं के लिए लिखा गया। युवा समूह, कन्फर्मेशन कक्षा, या व्यक्तिगत बाइबल अध्ययन के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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