12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

मत्ती 23

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

The Explanation

यह अध्याय यीशु के सबसे तीखे और सबसे ईमानदार भाषणों में से एक है। वे भीड़ से और अपने चेलों से खुलकर बात करते हैं, और सीधे शास्त्रियों और फरीसियों की ओर इशारा करते हैं, जो उस समय के धार्मिक नेता थे। यीशु कहते हैं कि वे "मूसा की गद्दी पर बैठे हैं", यानी उनके पास सिखाने का अधिकार तो है, इसलिए उनकी शिक्षा मानी जाए, परन्तु उनके काम की नकल न की जाए, क्योंकि "वे कहते तो हैं पर करते नहीं" (23:3)। वे लोगों पर भारी बोझ डालते हैं पर खुद उसे हल्का करने के लिए उंगली तक नहीं उठाते। उनका धर्म दिखावे के लिए है, चौड़े ताबीज, बड़ी झालरें, मुख्य आसन, और "रब्बी" कहलाने की भूख।

इसके बाद यीशु सात बार "हाय" कहते हैं, एक के बाद एक, जैसे घंटी बजाकर चेतावनी दी जा रही हो। वे उन पर आरोप लगाते हैं कि वे स्वर्ग के राज्य का द्वार बंद करते हैं, लोगों को और भी बुरा बना देते हैं, शपथों को लेकर उलझे हुए और बेईमान नियम बनाते हैं, पोदीने और जीरे का दसवां अंश तो देते हैं पर न्याय, दया और विश्वास छोड़ देते हैं। वे "कटोरे और थाली को ऊपर-ऊपर से माँजते हैं" पर भीतर गंदगी भरी है। यीशु उन्हें "चूना फिरी हुई कब्रों" जैसा कहते हैं, बाहर से सुंदर, भीतर मुर्दों की हड्डियों से भरी हुई।

अध्याय का अंत अचानक कठोर से कोमल हो जाता है। यीशु यरूशलेम के लिए रोते हुए से बोलते हैं, जैसे मुर्गी अपने बच्चों को पंखों के नीचे इकट्ठा करना चाहती है, पर उन्होंने नहीं चाहा। और फिर वे कहते हैं कि यरूशलेम उन्हें फिर नहीं देखेगा, जब तक वे न कहें, "धन्य है वह, जो प्रभु के नाम से आता है।"

What Does This Mean?

यह अध्याय केवल दो हज़ार साल पुराने धार्मिक नेताओं की आलोचना नहीं है। यह उस दरार की बात करती है जो हर इंसान में हो सकती है, वह दरार जो बाहर दिखाई देने वाले और भीतर सच में होने वाले के बीच होती है। फरीसियों की समस्या यह नहीं थी कि उनके नियम गलत थे, बल्कि यह थी कि उनका धर्म एक प्रदर्शन बन गया था, एक छवि बनाने का तरीका, दिल की सच्चाई नहीं।

यीशु के लिए यह गंभीर बात है, इतनी गंभीर कि वे अपनी सबसे तीखी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। क्यों? क्योंकि दिखावे का धर्म दूसरों को नुकसान पहुंचाता है, "तुम मनुष्यों के विरोध में स्वर्ग के राज्य का द्वार बंद करते हो" (23:13)। जब विश्वास केवल दिखावा बन जाता है, तो वह न केवल व्यक्ति को खोखला करता है, बल्कि दूसरों को भी परमेश्वर से दूर धकेल देता है।

The Common Thread

यीशु इस अध्याय में खुद को उस एकमात्र "गुरु" और "स्वामी" के रूप में रखते हैं जिसके आगे हर इंसान, चाहे कितना भी धार्मिक क्यों न हो, बराबर है और सेवक बनने के लिए बुलाया गया है (23:8-11)। वे किसी मानवीय स्थिति या उपाधि के ऊपर नहीं, बल्कि नम्रता और सेवा के ऊपर अपना राज्य बनाते हैं।

और अंत में जो दुःख भरी पुकार है, "हे यरूशलेम, हे यरूशलेम," वह वही आवाज़ है जो पूरी बाइबल में गूंजती है, परमेश्वर का वह दिल जो बार-बार अपने लोगों को बुलाता है, और बार-बार ठुकराया जाता है। भविष्यद्वक्ताओं को मार डाला गया, और अब यीशु खुद उसी राह पर चलने वाले हैं, वे खुद क्रूस पर चढ़ाए जाने की बात करते हैं (23:34)। यह अध्याय यीशु के दुख की ओर एक कदम है। पर आखिरी वाक्य में एक दरवाज़ा खुला रहता है, "धन्य है वह, जो प्रभु के नाम से आता है", वह दिन अभी आना बाकी है, वह उम्मीद अभी बुझी नहीं है।

For You

तुम शायद फरीसी नहीं हो, पर वह दरार तुम्हारे अंदर भी हो सकती है। सोशल मीडिया की दुनिया में हम सब एक छवि बनाना सीख जाते हैं, वह ज़िंदगी जो दूसरों को दिखाई जाती है, और वह ज़िंदगी जो असल में भीतर चल रही होती है। कभी-कभी चर्च जाना, बाइबल पढ़ना, "अच्छा ईसाई" दिखना भी ऐसा ही एक मुखौटा बन सकता है, जब दिल कहीं और हो।

यीशु इस दरार को बर्दाश्त नहीं करते, न इसलिए कि वे कठोर हैं, बल्कि इसलिए कि वे तुमसे सच्चा प्यार करते हैं। वे चाहते हैं कि तुम्हारा भीतर और बाहर एक जैसा हो। यह सवाल पूछने लायक है, क्या मेरा विश्वास परमेश्वर के सामने है, या लोगों के सामने एक प्रदर्शन है? और साथ ही यह भी याद रखना, जो यीशु इतनी सख्ती से बोलते हैं, वही अगले ही पल यरूशलेम के लिए रोते हैं। उनका गुस्सा प्रेम से अलग नहीं है, वह उसी का दूसरा रूप है।

Talk About It

तुम्हारी अपनी ज़िंदगी में कहाँ "बाहर" और "भीतर" में सबसे बड़ा फर्क दिखता है?

यीशु फरीसियों से इतनी सख्ती से क्यों बोलते हैं, पर यरूशलेम के लिए रोते हैं? इन दोनों में क्या विरोधाभास नहीं, बल्कि गहरा संबंध है?

Praying Together

प्रभु यीशु, आप जानते हैं कि मेरे भीतर क्या है, वह सब जो मैं दूसरों को नहीं दिखाता। मुझे दिखावे से बचाइए, और मेरे दिल को सच्चा बनाइए। मुझे वह नम्रता दीजिए जो सेवा करना जानती है, न कि वह घमंड जो सिर्फ दिखना चाहता है। और जब मैं भटकूं, तो मुझे याद दिलाइए कि आपका दिल अब भी मुझे अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करना चाहता है। आमीन।

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मत्ती 23 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

मत्ती 23 किस विषय में है?
यह अध्याय यीशु के सबसे तीखे और सबसे ईमानदार भाषणों में से एक है। वे भीड़ से और अपने चेलों से खुलकर बात करते हैं, और सीधे शास्त्रियों और फरीसियों की ओर इशारा करते हैं, जो उस समय के धार्मिक नेता थे। यीशु कहते हैं कि वे "मूसा की गद्दी पर बैठे हैं", यानी उनके पास सिखाने का अधिकार तो है, इसलिए उनकी शिक्षा मानी जाए, परन्तु उनके काम की नकल न की जाए, क्योंकि "वे कहते तो हैं पर करते नहीं" (23:3)। वे लोगों पर भारी बोझ डालते हैं पर खुद उसे हल्का करने के लिए उंगली तक नहीं उठाते। उनका धर्म दिखावे के लिए है, चौड़े ताबीज, बड़ी झालरें, मुख्य आसन, और "रब्बी" कहलाने की भूख।
मत्ती 23 क्या कहता है?
अध्याय का अंत अचानक कठोर से कोमल हो जाता है। यीशु यरूशलेम के लिए रोते हुए से बोलते हैं, जैसे मुर्गी अपने बच्चों को पंखों के नीचे इकट्ठा करना चाहती है, पर उन्होंने नहीं चाहा। और फिर वे कहते हैं कि यरूशलेम उन्हें फिर नहीं देखेगा, जब तक वे न कहें, "धन्य है वह, जो प्रभु के नाम से आता है।"
मत्ती 23 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यीशु के लिए यह गंभीर बात है, इतनी गंभीर कि वे अपनी सबसे तीखी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। क्यों? क्योंकि दिखावे का धर्म दूसरों को नुकसान पहुंचाता है, "तुम मनुष्यों के विरोध में स्वर्ग के राज्य का द्वार बंद करते हो" (23:13)। जब विश्वास केवल दिखावा बन जाता है, तो वह न केवल व्यक्ति को खोखला करता है, बल्कि दूसरों को भी परमेश्वर से दूर धकेल देता है।
किशोर मत्ती 23 से क्या सीख सकते हैं?
और अंत में जो दुःख भरी पुकार है, "हे यरूशलेम, हे यरूशलेम," वह वही आवाज़ है जो पूरी बाइबल में गूंजती है, परमेश्वर का वह दिल जो बार-बार अपने लोगों को बुलाता है, और बार-बार ठुकराया जाता है। भविष्यद्वक्ताओं को मार डाला गया, और अब यीशु खुद उसी राह पर चलने वाले हैं, वे खुद क्रूस पर चढ़ाए जाने की बात करते हैं (23:34)। यह अध्याय यीशु के दुख की ओर एक कदम है। पर आखिरी वाक्य में एक दरवाज़ा खुला रहता है, "धन्य है वह, जो प्रभु के नाम से आता है", वह दिन अभी आना बाकी है, वह उम्मीद अभी बुझी नहीं है।
मत्ती 23 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
यीशु इस दरार को बर्दाश्त नहीं करते, न इसलिए कि वे कठोर हैं, बल्कि इसलिए कि वे तुमसे सच्चा प्यार करते हैं। वे चाहते हैं कि तुम्हारा भीतर और बाहर एक जैसा हो। यह सवाल पूछने लायक है, क्या मेरा विश्वास परमेश्वर के सामने है, या लोगों के सामने एक प्रदर्शन है? और साथ ही यह भी याद रखना, जो यीशु इतनी सख्ती से बोलते हैं, वही अगले ही पल यरूशलेम के लिए रोते हैं। उनका गुस्सा प्रेम से अलग नहीं है, वह उसी का दूसरा रूप है।

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For parents and teachers: किशोरों और युवाओं के लिए लिखा गया। युवा समूह, कन्फर्मेशन कक्षा, या व्यक्तिगत बाइबल अध्ययन के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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