7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

मत्ती 23

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

The Explanation

यीशु मंदिर के आँगन में खड़े हैं। भीड़ और उनके चेले उन्हें सुन रहे हैं। वे शास्त्रियों और फरीसियों की बात करते हैं, ये वे अगुवे थे जो मूसा की व्यवस्था को लोगों को समझाते थे। यीशु कहते हैं कि उनकी सीख माननी चाहिए, परन्तु उनके जैसा काम मत करना, क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं। वे भारी बोझ दूसरों के कंधों पर रखते हैं, पर खुद उसे उँगली से भी सरकाना नहीं चाहते। वे सब कुछ दिखावे के लिए करते हैं, अपने ताबीज चौड़े बनाते, कपड़ों की झालरें लंबी करते, ताकि लोग उन्हें देखें और सम्मान दें। इसके बाद यीशु सात बार कहते हैं, "तुम पर हाय!" यह एक बहुत कड़ी चेतावनी है, दुःख और डाँट दोनों एक साथ। वे उन्हें अंधे अगुवे कहते हैं, क्योंकि वे पोदीना और सौंफ जैसी छोटी चीज़ों का दसवाँ अंश तो ठीक से देते हैं, पर न्याय, दया और विश्वास जैसी बड़ी बातें छोड़ देते हैं। अंत में यीशु रोते हुए यरूशलेम से बात करते हैं, क्योंकि यह शहर बार बार परमेश्वर के भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता रहा है।

What Does This Mean?

यीशु यहाँ बहुत कठोर लगते हैं। पर ध्यान से पढ़ो, वे नियमों के खिलाफ नहीं बोल रहे। वे खुद कहते हैं कि शास्त्री जो सिखाते हैं वह मानो। असली समस्या नियम नहीं, दिखावा है। शास्त्री और फरीसी बाहर से कुछ और दिखते थे, भीतर से कुछ और थे। यीशु उनकी तुलना चूना पुती कब्रों से करते हैं, ऊपर से सफेद और सुंदर, पर भीतर हड्डियाँ और सड़ांध से भरी हुई। यह एक बहुत कठोर तस्वीर है, पर यीशु इसे जानबूझकर इस्तेमाल करते हैं ताकि हम समझें, परमेश्वर हमारे भीतर को देखते हैं, केवल हमारे दिखावे को नहीं। यह सवाल शास्त्रियों से ज्यादा हम सबके लिए है, क्या मेरा भीतर और बाहर एक जैसा है?

The Common Thread

यह अध्याय परमेश्वर के बड़े वादे से जुड़ता है। परमेश्वर ने हमेशा चाहा कि उनके लोग सच्चे दिल से उनकी सेवा करें, केवल बाहरी नियमों से नहीं। यीशु खुद वह एक गुरु और स्वामी हैं जिनकी बात हमें सुननी है। वे बड़े होकर भी सेवक बने, जैसे वे खुद कहते हैं, जो तुम में बड़ा हो, वह सेवक बने। और अंत में यीशु का रोना दिखाता है कि परमेश्वर का हृदय कैसा है। वे यरूशलेम को मुर्गी की तरह अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करना चाहते थे, पर लोगों ने इनकार कर दिया। यही यीशु बाद में क्रूस पर अपनी जान दे देंगे, उन्हीं लोगों के लिए जिन्होंने उन्हें ठुकराया था।

For You

तुम भी कभी दिखावा करते हो? शायद स्कूल में अच्छे बनने का नाटक करना, या प्रार्थना करते समय ऐसा दिखाना जैसे तुम बहुत पवित्र हो, जबकि दिल में कुछ और चल रहा हो। यीशु यह नहीं कहते कि नियम बुरे हैं, वे कहते हैं दिल सही होना चाहिए। अगली बार जब तुम कोई अच्छा काम करो, खुद से पूछना, क्या मैं यह परमेश्वर के लिए कर रहा हूँ, या ताकि लोग मुझे देखें? यह सवाल आसान नहीं है, यीशु खुद इसे कठिन बना देते हैं। पर यह भी याद रखना, यही यीशु हमें प्यार से बुलाते हैं, जैसे मुर्गी अपने बच्चों को बुलाती है। उनके पास लौटना हमेशा संभव है।

Talk About It

क्या तुम्हें लगता है कि यीशु का गुस्सा दिखावे पर सही था, या यह बहुत ज्यादा कठोर था?

क्या कोई ऐसी बात है जो तुम भीतर महसूस करते हो पर बाहर कुछ और दिखाते हो?

Praying Together

प्रभु यीशु, आप हमारे भीतर को देखते हैं, जहाँ कोई और नहीं देख सकता। हमें दिखावे से बचाइए, और हमारा दिल आपके सामने सच्चा बनाइए। जैसे आपने यरूशलेम को अपने पंखों के नीचे बुलाया, वैसे ही हमें भी अपने पास बुलाइए। आमीन।

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मत्ती 23 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

मत्ती 23 किस विषय में है?
यीशु मंदिर के आँगन में खड़े हैं। भीड़ और उनके चेले उन्हें सुन रहे हैं। वे शास्त्रियों और फरीसियों की बात करते हैं, ये वे अगुवे थे जो मूसा की व्यवस्था को लोगों को समझाते थे। यीशु कहते हैं कि उनकी सीख माननी चाहिए, परन्तु उनके जैसा काम मत करना, क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं। वे भारी बोझ दूसरों के कंधों पर रखते हैं, पर खुद उसे उँगली से भी सरकाना नहीं चाहते। वे सब कुछ दिखावे के लिए करते हैं, अपने ताबीज चौड़े बनाते,
मत्ती 23 क्या कहता है?
यीशु यहाँ बहुत कठोर लगते हैं। पर ध्यान से पढ़ो, वे नियमों के खिलाफ नहीं बोल रहे। वे खुद कहते हैं कि शास्त्री जो सिखाते हैं वह मानो। असली समस्या नियम नहीं, दिखावा है। शास्त्री और फरीसी बाहर से कुछ और दिखते थे, भीतर से कुछ और थे। यीशु उनकी तुलना चूना पुती कब्रों से करते हैं, ऊपर से सफेद और सुंदर, पर भीतर हड्डियाँ और सड़ांध से भरी हुई। यह एक बहुत कठोर तस्वीर है, पर यीशु इसे जानबूझकर इस्तेमाल करते हैं ताकि हम समझें, परमे
मत्ती 23 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय परमेश्वर के बड़े वादे से जुड़ता है। परमेश्वर ने हमेशा चाहा कि उनके लोग सच्चे दिल से उनकी सेवा करें, केवल बाहरी नियमों से नहीं। यीशु खुद वह एक गुरु और स्वामी हैं जिनकी बात हमें सुननी है। वे बड़े होकर भी सेवक बने, जैसे वे खुद कहते हैं, जो तुम में बड़ा हो, वह सेवक बने। और अंत में यीशु का रोना दिखाता है कि परमेश्वर का हृदय कैसा है। वे यरूशलेम को मुर्गी की तरह अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करना चाहते थे, पर लोगों ने इनकार कर दिया। यही यीशु बाद में क्रूस पर अपनी जान दे देंगे, उन्हीं लोगों के लिए जिन्होंने उन्हें ठुकराया था।
बच्चे मत्ती 23 से क्या सीख सकते हैं?
तुम भी कभी दिखावा करते हो? शायद स्कूल में अच्छे बनने का नाटक करना, या प्रार्थना करते समय ऐसा दिखाना जैसे तुम बहुत पवित्र हो, जबकि दिल में कुछ और चल रहा हो। यीशु यह नहीं कहते कि नियम बुरे हैं, वे कहते हैं दिल सही होना चाहिए। अगली बार जब तुम कोई अच्छा काम करो, खुद से पूछना, क्या मैं यह परमेश्वर के लिए कर रहा हूँ, या ताकि लोग मुझे देखें?
मत्ती 23 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
क्या तुम्हें लगता है कि यीशु का गुस्सा दिखावे पर सही था, या यह बहुत ज्यादा कठोर था?

किसी अन्य आयु वर्ग की तलाश है?

हमारे पास छोटे बच्चों (3-6 वर्ष) और किशोरों (12 वर्ष और अधिक) के लिए विशेष संस्करण भी हैं।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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