7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

मत्ती 5

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

The Explanation

यीशु ने देखा कि बहुत सारे लोग उनके पीछे चले आ रहे हैं। वे एक पहाड़ पर चढ़ गए, बैठ गए, और अपने चेलों को सिखाने लगे। यह उपदेश इतना खास है कि आज भी इसे "पहाड़ी उपदेश" कहा जाता है।

यीशु ने शुरुआत एक अजीब तरीके से की। उन्होंने कहा, "धन्य हैं वे…" यानी खुश हैं वे लोग। पर जिन्हें उन्होंने खुश कहा, वे आम तौर पर खुश नहीं दिखते। जो मन के दीन हैं, जो शोक करते हैं, जो नम्र हैं, जो सताए जाते हैं। दुनिया इन लोगों को हारे हुए समझती है। पर यीशु कहते हैं कि परमेश्वर की नज़र में ये लोग बहुत कीमती हैं। स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

फिर यीशु ने दो सुंदर तस्वीरें दीं। उन्होंने अपने चेलों से कहा, "तुम पृथ्वी के नमक हो" और "तुम जगत की ज्योति हो।" नमक खाने का स्वाद बदल देता है। दीया अंधेरे कमरे को उजाला कर देता है। यीशु के पीछे चलनेवाले लोग दुनिया में ऐसे ही होने चाहिए।

इसके बाद यीशु ने कुछ ऐसी बातें कहीं जो सुननेवालों को चौंकानेवाली लगीं। उन्होंने कहा, "यह मत सोचो कि मैं मूसा की व्यवस्था को खत्म करने आया हूँ। मैं तो उसे पूरा करने आया हूँ।" फिर उन्होंने पुरानी आज्ञाओं को नई गहराई से समझाया।

"हत्या न करना" यह तो सब जानते थे। पर यीशु ने कहा, अपने भाई पर क्रोध करना भी परमेश्वर की नज़र में गलत है। किसी को "मूर्ख" कहना भी गंभीर बात है। अगर मन्दिर में भेंट चढ़ाते समय याद आए कि किसी से झगड़ा है, तो पहले जाकर मेल कर लो, फिर भेंट चढ़ाओ।

यीशु ने कहा कि झूठी कसम मत खाओ। सच बात इतनी साफ हो कि "हाँ" का मतलब सचमुच हाँ हो, और "नहीं" का मतलब सचमुच नहीं।

फिर वे और भी आगे बढ़े। पुराने ज़माने में लोग कहते थे, "आँख के बदले आँख।" यानी जो तुम्हारे साथ बुरा करे, उसके साथ वैसा ही करो। पर यीशु ने कहा, "बुरे का सामना मत करो। अगर कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे, तो दूसरा गाल भी उसकी ओर कर दो।"

और सबसे कठिन बात आखिर में आई। "अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सतानेवालों के लिए प्रार्थना करो।" क्यों? क्योंकि परमेश्वर भी भलों और बुरों दोनों पर सूरज उगाते हैं, और दोनों पर बारिश बरसाते हैं।

What Does This Mean?

यीशु यहाँ बता रहे हैं कि परमेश्वर का राज्य कैसा दिखता है। यह राज्य पूरी तरह उल्टा है। दुनिया कहती है, ताकतवर बनो, बदला लो, अपनों से प्रेम करो और दुश्मनों से नफरत। पर यीशु कहते हैं, नम्र बनो, माफ करो, दुश्मनों से भी प्रेम करो।

यीशु यह भी दिखाते हैं कि परमेश्वर सिर्फ बाहर के काम नहीं देखते। वे मन के अन्दर भी देखते हैं। तुमने किसी को मारा नहीं, पर क्या मन में गुस्सा है? तुमने झूठ बोला नहीं, पर क्या तुम्हारी बात पर लोग भरोसा कर सकते हैं?

यह सुनकर मन में एक सवाल उठता है, क्या कोई इंसान सचमुच ऐसा जी सकता है? यह मुश्किल सवाल है। खुद यीशु के चेले भी बाद में हार गए, गिर गए, और फिर उठे। यह उपदेश हमें दिखाता है कि हमें परमेश्वर की मदद की कितनी जरूरत है।

The Common Thread

यीशु ने खुद कहा कि वे व्यवस्था को पूरा करने आए हैं। पूरे पवित्रशास्त्र में परमेश्वर एक ऐसे राज्य का वादा करते आए हैं जहाँ न्याय हो, शान्ति हो, और लोग सचमुच परमेश्वर से प्रेम करें। यीशु उस राज्य के राजा हैं। और सबसे अद्भुत बात यह है कि यीशु ने खुद यह जीवन जिया। उन्होंने अपने दुश्मनों से प्रेम किया। जब उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया, तब भी उन्होंने प्रार्थना की, "हे पिता, इन्हें माफ कर।" यीशु सिर्फ सिखाते नहीं, वे खुद वह जीवन जीते हैं जिसकी वे बात करते हैं।

For You

तुम्हारे स्कूल में, घर में, दोस्तों के बीच, कई बार ऐसे मौके आते हैं जब कोई तुम्हें चिढ़ाता है, या कुछ गलत कहता है। अंदर से गुस्सा आता है। यीशु की ये बातें आसान नहीं हैं। पर एक बात याद रखो: तुम अकेले नहीं हो। यीशु से माँगो कि वे तुम्हें ताकत दें। और अगर आज तुम्हारा किसी से झगड़ा है, तो शायद यह अच्छा मौका है जाकर मेल कर लेने का।

Talk About It

यीशु ने अपने बैरियों से प्रेम करने को कहा। तुम्हें लगता है यह क्यों इतना मुश्किल है, और क्या यह सचमुच मुमकिन है?

"नमक" और "ज्योति" होने का तुम्हारी ज़िंदगी में क्या मतलब हो सकता है, स्कूल में या घर में?

Praying Together

प्रभु यीशु, आपकी बातें सुन्दर हैं, पर कठिन भी हैं। हमें माफ कीजिए जब हम गुस्सा करते हैं या बदला लेना चाहते हैं। हमें ऐसा मन दीजिए जो नम्र हो, जो दूसरों से प्रेम करे, और जो सच बोले। हमें नमक और ज्योति बनाइए। आमीन।

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मत्ती 5 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

मत्ती 5 किस विषय में है?
यीशु ने देखा कि बहुत सारे लोग उनके पीछे चले आ रहे हैं। वे एक पहाड़ पर चढ़ गए, बैठ गए, और अपने चेलों को सिखाने लगे। यह उपदेश इतना खास है कि आज भी इसे "पहाड़ी उपदेश" कहा जाता है।
मत्ती 5 क्या कहता है?
इसके बाद यीशु ने कुछ ऐसी बातें कहीं जो सुननेवालों को चौंकानेवाली लगीं। उन्होंने कहा, "यह मत सोचो कि मैं मूसा की व्यवस्था को खत्म करने आया हूँ। मैं तो उसे पूरा करने आया हूँ।" फिर उन्होंने पुरानी आज्ञाओं को नई गहराई से समझाया।
मत्ती 5 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
फिर वे और भी आगे बढ़े। पुराने ज़माने में लोग कहते थे, "आँख के बदले आँख।" यानी जो तुम्हारे साथ बुरा करे, उसके साथ वैसा ही करो। पर यीशु ने कहा, "बुरे का सामना मत करो। अगर कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे, तो दूसरा गाल भी उसकी ओर कर दो।"
बच्चे मत्ती 5 से क्या सीख सकते हैं?
यीशु यह भी दिखाते हैं कि परमेश्वर सिर्फ बाहर के काम नहीं देखते। वे मन के अन्दर भी देखते हैं। तुमने किसी को मारा नहीं, पर क्या मन में गुस्सा है? तुमने झूठ बोला नहीं, पर क्या तुम्हारी बात पर लोग भरोसा कर सकते हैं?
मत्ती 5 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
तुम्हारे स्कूल में, घर में, दोस्तों के बीच, कई बार ऐसे मौके आते हैं जब कोई तुम्हें चिढ़ाता है, या कुछ गलत कहता है। अंदर से गुस्सा आता है। यीशु की ये बातें आसान नहीं हैं। पर एक बात याद रखो: तुम अकेले नहीं हो। यीशु से माँगो कि वे तुम्हें ताकत दें। और अगर आज तुम्हारा किसी से झगड़ा है, तो शायद यह अच्छा मौका है जाकर मेल कर लेने का।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय

What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 42

जो कोई तुझसे माँगे, उसे दे; और जो तुझसे उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।"

ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि कितना दे। वे हाथ की नहीं, चेहरे की बात करते हैं। क्योंकि हम अक्सर पैसे से पहले अपनी नज़रें छिपा लेते हैं, सुनने से पहले ही भीतर से मुकर जाते हैं।

आज किसी की ज़रूरत तुझ तक आए, तो पहले उसकी आँखों में देख। देना उसके बाद आसान लगेगा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

यीशु ने "बाईं" नहीं, "दाहिनी आँख" कहा। यानी वह जो सबसे कीमती है, जिस पर तू सबसे ज़्यादा भरोसा करता है। पाप हमें कभी बेकार चीज़ों से नहीं, अपनी प्रिय चीज़ों से फँसाता है। "उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे।" सोच, आज तेरे हाथ में वह क्या है जिसे तू छोड़ना नहीं चाहता, पर जो तुझे धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर खींच रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 32

यीशु के समय पत्नी को त्यागपत्र देना आसान था, और छोड़ी गई स्त्री के पास न सहारा था, न सम्मान। इसलिए यीशु कहते हैं, "जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है।" दोष उस पर डाला गया जिसने छोड़ा। क्या तेरे रिश्तों में भी कोई है जिसे तूने सुविधा से छोड़ दिया, और परमेश्वर उसका दर्द अब भी देख रहा है?

किसी अन्य आयु वर्ग की तलाश है?

हमारे पास छोटे बच्चों (3-6 वर्ष) और किशोरों (12 वर्ष और अधिक) के लिए विशेष संस्करण भी हैं।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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