फिलिप्पियों 4
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
फिलिप्पी की कलीसिया पौलुस के दिल के बहुत करीब थी। जब वह यह पत्र लिख रहे थे, तब वे जेल में थे, फिर भी शब्दों में शिकायत नहीं, बल्कि आनन्द है। यह अध्याय एक विदाई पत्र जैसा लगता है, जिसमें पौलुस अपने दिल की गहरी बातें कहते हैं। वे दो स्त्रियों, यूओदिया और सुन्तुखे से कहते हैं कि वे प्रभु में एक मन रहें, क्योंकि उनके बीच कोई मतभेद था जो कलीसिया को बांट सकता था। फिर वे सब को बुलाते हैं कि प्रभु में सदा आनन्दित रहें, चिन्ता को प्रार्थना में बदल दें, और जो बातें सत्य, आदरणीय, पवित्र और सुहावनी हैं, उन्हीं पर ध्यान लगाएं।
इसके बाद पौलुस अपने बारे में कुछ निजी कहते हैं जो बहुत ईमानदार है। वे कहते हैं कि उन्होंने सन्तोष सीखा है, चाहे वे दीन हों या बढ़ें, चाहे उनके पास भरपूर हो या भूखे रहें। यह कोई सहज स्वभाव नहीं था, उन्होंने कहा "मैंने सीखा है", यानी यह एक प्रक्रिया थी, समय के साथ आई हुई बात। और फिर वह प्रसिद्ध वचन आता है, "जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।" अंत में वे फिलिप्पियों का धन्यवाद करते हैं जिन्होंने कई बार उनकी सहायता की, और परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वे अपने वैभव के अनुसार उनकी हर घटी को पूरा करें।
इसका क्या अर्थ है?
यह अध्याय पढ़ते समय एक बात ध्यान देने योग्य है, पौलुस जेल में हैं, भविष्य अनिश्चित है, फिर भी वे लिखते हैं "आनन्दित रहो"। यह कोई हल्की-फुल्की खुशी की बात नहीं कर रहे, कोई सतही मुस्कान नहीं मांग रहे। यह आनन्द प्रभु में है, हालातों में नहीं। यह फर्क बहुत बड़ा है। तुम्हारी ज़िंदगी में भी ऐसे दिन आएंगे जब हालात ठीक नहीं होंगे, परीक्षा खराब जाए, रिश्ता टूटे, भविष्य धुंधला दिखे। पौलुस यह नहीं कहते कि तब झूठी मुस्कान लगाओ। वे कहते हैं कि आनन्द का स्रोत कहीं और है, प्रभु में है, जो हालात बदलने से पहले भी मौजूद है।
चिन्ता के बारे में भी वे बहुत सीधी बात करते हैं। "किसी भी बात की चिन्ता मत करो" यह आदेश किसी भावनाहीन इंसान का नहीं है, बल्कि किसी का है जिसने खुद जेल की दीवारों के बीच चिन्ता का सामना किया है। समाधान यह नहीं कि चिन्ता को दबा दो, बल्कि उसे प्रार्थना और धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सामने रख दो। और तब जो शान्ति मिलती है, वह समझ से परे है, यानी तर्क से हिसाब नहीं मिलता, फिर भी वह हृदय और विचारों को सुरक्षित रखती है।
समान सूत्र
यह पूरा अध्याय एक बड़े सच पर टिका है, परमेश्वर हमें अकेला नहीं छोड़ते। "जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ" इस वचन को अक्सर बाहर के संदर्भ से उठाकर पहन लिया जाता है, जैसे यह कोई गारंटी हो कि हर सपना पूरा होगा। पर पौलुस यह बात दीनता और भरपूरी दोनों के बारे में कह रहे हैं, यानी सामर्थ्य कठिनाई में टिके रहने की सामर्थ्य है, हर इच्छा पूरी करने की नहीं। यह सामर्थ्य मसीह यीशु से आती है, जिन्होंने खुद दीनता और क्रूस को जाना, और फिर महिमा को भी। वही मसीह जो पिता के पास से आए और सबकुछ छोड़कर मनुष्य बने, अब वही अपने लोगों को अपनी सामर्थ्य से थामते हैं। और यह वचन भी, "मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है तुम्हारी हर एक घटी को पूरा करेगा", यह परमेश्वर के चरित्र की तस्वीर है, वे देने वाले पिता हैं, अपनी संतान की कमी को अपने वैभव से भरने वाले।
तुम्हारे लिए
तुम शायद जेल में नहीं हो, पर तुम्हारी अपनी दीवारें हैं, परफॉर्मेंस का दबाव, यह डर कि तुम काफी अच्छे नहीं, अकेलापन जो स्क्रीन के पीछे छुपा रहता है। पौलुस का सन्तोष कोई निराशावाद नहीं था, "जैसा है वैसा ही ठीक है" वाली हार नहीं। यह एक सीखी हुई ताकत थी, जो हालात से नहीं बल्कि किसी और चीज़ से आती थी। तुम्हारे लिए सवाल यह है, तुम्हारी शांति किस पर टिकी है, नंबरों पर, लाइक्स पर, किसी के अप्रूवल पर? या उस पर जो तुम्हारे हृदय और विचारों को सुरक्षित रखने का वादा करते हैं?
आज रात, जब चिन्ता तुम्हारे दिमाग में घूमने लगे, उसे शब्दों में बदल कर परमेश्वर के सामने रख देना एक ठोस काम है, भावुक बात नहीं। और आठवीं आयत भी एक चुनौती है, तुम अपने दिमाग में क्या भरते हो, यह तय करता है कि तुम्हारा मन कैसा बनता है। यह सोचने लायक बात है कि तुम्हारी स्क्रीन पर, तुम्हारे कानों में रोज़ क्या-क्या घुसता है।
बात करो
अगर तुम्हारी शान्ति सच में हालात पर नहीं बल्कि परमेश्वर पर टिकी होनी चाहिए, तो अभी तुम्हारी शान्ति असल में किस पर टिकी है?
पौलुस कहते हैं उन्होंने सन्तोष "सीखा" है। तुम्हारी ज़िंदगी में वह कौन सी परिस्थिति है जिसमें सन्तोष सीखना सबसे कठिन लगता है?
साथ में प्रार्थना
प्रभु, आपके सामने हमारी चिन्ताएँ रखते हैं, वे जो हमें रात में जगाए रखती हैं और दिन में थका देती हैं। हमें सिखाइए कि हालात नहीं बदलने पर भी आपमें आनन्द कैसे किया जाता है। हमारे हृदय और विचारों को अपनी शान्ति से सुरक्षित रखिए, और हमें सामर्थ्य दीजिए कि हम मसीह में स्थिर रह सकें। आमीन।
फिलिप्पियों 4 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
फिलिप्पियों 4 किस विषय में है?
फिलिप्पियों 4 क्या कहता है?
फिलिप्पियों 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर फिलिप्पियों 4 से क्या सीख सकते हैं?
फिलिप्पियों 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
पौलुस ने दो बहनों का नाम चिट्ठी में लिख दिया, जो पूरी कलीसिया के सामने पढ़ी जानी थी: "मैं यूओदिया से विनती करता हूँ, और सुन्तुखे से भी विनती करता हूँ कि वे प्रभु में एक मन रहें।" ये दोनों सुसमाचार के काम में उसके साथ परिश्रम कर चुकी थीं। यानी सेवा करते हुए भी मन फट सकता है। सोचो, तुम्हारे और किसके बीच ऐसी दूरी है जिसे तुमने "छोटी बात" कहकर टाल रखा है?
पौलुस जेल में है, और लंबे समय बाद फिलिप्पी के विश्वासियों की मदद पहुँचती है। वह उलाहना नहीं देता। वह कहता है, "निश्चय तुम्हें आरम्भ में भी विचार था, पर तुम्हें अवसर न मिला।" देर के पीछे वह लापरवाही नहीं, बल्कि मजबूरी देखता है। सोचो, जो लोग तुमसे देर से मिले, क्या तुम उनके लिए भी ऐसी ही उदारता रख पाते हो?
पौलुस यह जेल से लिख रहा है, और फिर भी कहता है, "क्योंकि मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ, उसी में सन्तोष करूँ।" ध्यान दो, उसने कहा सीखा है। संतोष उसके स्वभाव में नहीं था, वह सालों की तंगी और खाली हाथों में सीखा गया पाठ था। तो शायद तुम्हारी आज की कमी भी सज़ा नहीं, कक्षा है। तुम उसमें क्या सीख रहे हो?
पौलुस अपनी पत्री के अंत में लिखता है, "हर एक पवित्र जन को जो मसीह यीशु में हैं नमस्कार कहो। जो भाई मेरे साथ हैं, तुम्हें नमस्कार कहते हैं।"
एक जेल की कोठरी से लिखे इन शब्दों में कितनी गर्माहट है। पौलुस जंजीरों में है, फिर भी उसकी सोच अपने भाइयों बहनों पर टिकी है। वह हर एक को याद कर रहा है, कोई भी छूट न जाए।
क्या आज आप किसी एक विश्वासी का नाम लेकर उसे याद कर सकते हैं? नमस्कार भेजना छोटी बात लगती है, पर यही प्रेम की असली भाषा है।
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