7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

फिलिप्पियों 4

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस यह पत्र जेल में बैठकर लिख रहे हैं। फिर भी वे इस अध्याय में बार-बार एक ही शब्द दोहराते हैं: आनन्दित रहो। यह अजीब लगता है, है ना? जो जेल में है, वह कैसे आनन्द की बात कर सकता है?

पहले पौलुस दो महिलाओं का नाम लेते हैं, यूओदिया और सुन्तुखे। ये दोनों फिलिप्पी की कलीसिया में पौलुस के साथ मिलकर काम करती थीं, पर लगता है कि उनके बीच कोई झगड़ा या मनमुटाव हो गया था। पौलुस उन्हें डांटते नहीं, बल्कि विनती करते हैं कि वे प्रभु में एक मन रहें। इससे पता चलता है कि पहली कलीसिया में भी सब कुछ ठीक नहीं था। असली लोग थे, असली झगड़े भी।

फिर पौलुस लिखते हैं कि किसी बात की चिन्ता मत करो, बल्कि हर बात परमेश्वर के सामने प्रार्थना में रखो। और वादा करते हैं कि तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से परे है, हृदय और विचारों की रखवाली करेगी। ध्यान दो, पौलुस यह नहीं कहते कि चिन्ता का कारण खत्म हो जाएगा। वे कहते हैं कि शान्ति हृदय की रखवाली करेगी, भले हालात वैसे ही रहें।

आगे पौलुस अपने बारे में एक बड़ी बात कहते हैं: उन्होंने सीखा है कि जिस दशा में हों, उसी में सन्तोष करें। चाहे भूखे हों या तृप्त, चाहे कुछ हो या कुछ न हो। और वह मशहूर वचन आता है: "जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।" यह वचन अक्सर अकेला लिया जाता है, जैसे यह कहता हो कि तुम कुछ भी बन सकते हो। पर पढ़ो तो असल में यह भूखे रहने और तृप्त होने दोनों के बारे में कहा गया है। मसीह की सामर्थ्य पौलुस को हर हाल में टिकाए रखती है, चाहे हाल अच्छा हो या बुरा।

अंत में पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया का धन्यवाद करते हैं, क्योंकि उन्होंने पैसे और सामान भेजकर पौलुस की मदद की थी। पौलुस कहते हैं कि यह भेंट परमेश्वर को भाने वाला बलिदान है। और वे विश्वास से कहते हैं कि परमेश्वर उनकी हर घटी, यानी हर कमी, पूरी करेंगे।

इससे क्या पता चलता है?

यह अध्याय दिखाता है कि आनन्द और परिस्थिति एक चीज़ नहीं हैं। पौलुस जेल में है, फिर भी आनन्दित है। यह कोई नकली मुस्कान नहीं है। यह गहरा भरोसा है कि प्रभु निकट है, और उसी भरोसे से चिन्ता प्रार्थना में बदल जाती है।

यह भी दिखाता है कि विश्वासी लोग आपस में झगड़ भी सकते हैं, और फिर भी एक शरीर बने रह सकते हैं। यूओदिया और सुन्तुखे को अलग नहीं किया गया, बल्कि उन्हें फिर से जोड़ने की कोशिश की गई।

सामान्य सूत्र

पौलुस की सामर्थ्य कहीं से खुद नहीं आती। वे लिखते हैं "जो मुझे सामर्थ्य देता है", यानी मसीह यीशु। यही पूरी बाइबल की बड़ी कहानी का हिस्सा है, परमेश्वर अपने लोगों को छोड़ते नहीं, चाहे हालात कैसे भी हों। शान्ति जो समझ से परे है, वह मसीह यीशु में मिलती है, किसी योजना या तरकीब में नहीं। और जो वादा पौलुस करता है, कि परमेश्वर हर घटी पूरी करेंगे, वह उस बड़े वादे की झलक है कि परमेश्वर अपने लोगों की देखभाल कभी नहीं छोड़ते।

तुम्हारे लिए

जब तुम्हारे मन में चिन्ता आती है, स्कूल की, दोस्ती की, घर की किसी बात की, तो यह अध्याय कहता है कि उसे अपने भीतर छिपाओ मत। परमेश्वर के सामने रख दो, जैसे कोई बात सच में किसी भरोसेमंद व्यक्ति को बताई जाती है। और जब किसी दोस्त से झगड़ा हो जाए, तो याद रखो कि यूओदिया और सुन्तुखे को भी जोड़ा गया, तुम्हें भी कोशिश करने का हक है। आनन्द का मतलब यह नहीं कि सब कुछ अच्छा है। इसका मतलब है कि तुम जानते हो कि प्रभु निकट है, चाहे हालात जैसे भी हों।

बातचीत के लिए

पौलुस कहते हैं कि उन्होंने सन्तोष करना "सीखा" है। इसका मतलब है कि यह आसान नहीं आया। तुम्हारे जीवन में ऐसी कौन सी बात है जिसमें सन्तोष करना अभी कठिन लगता है?

यूओदिया और सुन्तुखे का झगड़ा किस बारे में था, यह बाइबल हमें नहीं बताती। क्या तुम्हें लगता है कि यह जानना ज़रूरी था, या पौलुस का उन्हें जोड़ने की कोशिश करना ज़्यादा महत्वपूर्ण है?

संयुक्त प्रार्थना

प्रभु यीशु, कभी हमारे मन में चिन्ता भर जाती है, और हमें नहीं पता कि क्या करें। हमें सिखाइए कि हम अपनी हर बात आपके सामने रख सकते हैं। हमें वह शान्ति दीजिए जो समझ से परे है, और हमारे हृदय की रखवाली करे। और जब हमारे बीच झगड़ा हो, तो हमें एक मन होने में मदद कीजिए। आमीन।

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फिलिप्पियों 4 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

फिलिप्पियों 4 किस विषय में है?
पौलुस यह पत्र जेल में बैठकर लिख रहे हैं। फिर भी वे इस अध्याय में बार-बार एक ही शब्द दोहराते हैं: आनन्दित रहो। यह अजीब लगता है, है ना? जो जेल में है, वह कैसे आनन्द की बात कर सकता है?
फिलिप्पियों 4 क्या कहता है?
फिर पौलुस लिखते हैं कि किसी बात की चिन्ता मत करो, बल्कि हर बात परमेश्वर के सामने प्रार्थना में रखो। और वादा करते हैं कि तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से परे है, हृदय और विचारों की रखवाली करेगी। ध्यान दो, पौलुस यह नहीं कहते कि चिन्ता का कारण खत्म हो जाएगा। वे कहते हैं कि शान्ति हृदय की रखवाली करेगी, भले हालात वैसे ही रहें।
फिलिप्पियों 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
अंत में पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया का धन्यवाद करते हैं, क्योंकि उन्होंने पैसे और सामान भेजकर पौलुस की मदद की थी। पौलुस कहते हैं कि यह भेंट परमेश्वर को भाने वाला बलिदान है। और वे विश्वास से कहते हैं कि परमेश्वर उनकी हर घटी, यानी हर कमी, पूरी करेंगे।
बच्चे फिलिप्पियों 4 से क्या सीख सकते हैं?
यह भी दिखाता है कि विश्वासी लोग आपस में झगड़ भी सकते हैं, और फिर भी एक शरीर बने रह सकते हैं। यूओदिया और सुन्तुखे को अलग नहीं किया गया, बल्कि उन्हें फिर से जोड़ने की कोशिश की गई।
फिलिप्पियों 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
जब तुम्हारे मन में चिन्ता आती है, स्कूल की, दोस्ती की, घर की किसी बात की, तो यह अध्याय कहता है कि उसे अपने भीतर छिपाओ मत। परमेश्वर के सामने रख दो, जैसे कोई बात सच में किसी भरोसेमंद व्यक्ति को बताई जाती है। और जब किसी दोस्त से झगड़ा हो जाए, तो याद रखो कि यूओदिया और सुन्तुखे को भी जोड़ा गया, तुम्हें भी कोशिश करने का हक है। आनन्द का मतलब यह नहीं कि सब कुछ अच्छा है। इसका मतलब है कि तुम जानते हो कि प्रभु निकट है, चाहे हालात जैसे भी हों।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

पौलुस सिर्फ यह नहीं कहता कि मेरी बातें सुनो। वह कहता है, "जो बातें तुमने मुझसे सीखीं, और ग्रहण कीं, और सुनीं, और मुझमें देखीं, उन्हीं का पालन किया करो।" उसने अपना जीवन खुला रख दिया था। क्या कोई तुम्हें देखकर मसीह को सीख सकता है? और ध्यान दो, पहले शान्ति हृदय की रखवाली करती है, पर यहाँ शान्ति का परमेश्वर स्वयं साथ चलता है। जब तुम मानने लगते हो, तब वह पास आ जाता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

हे फिलिप्पियों, तुम आप भी जानते हो कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में... तुम्हें छोड़ और किसी कलीसिया ने लेने-देने के विषय में मेरी सहभागिता न की।" पौलुस को वह शुरुआती दिन याद है, जब वह जाना-पहचाना नाम नहीं था और देने में कोई फायदा नहीं दिखता था। तब फिलिप्पी ने हाथ बढ़ाया। सोचो, क्या तुम किसी का साथ तब देते हो जब उसका काम अभी छोटा और अनजाना है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 8

पौलुस यह चिट्ठी जेल से लिख रहा है। चारों ओर जंजीरें और अनिश्चितता, फिर भी वह कहता है, "जो बातें सुहावनी हैं, जो बातें मनभावनी हैं... इन्हीं बातों पर ध्यान लगाया करो।" ध्यान लगाना अपने आप नहीं होता, वह एक चुनाव है। आज रात सोने से पहले तेरा मन किस बात को बार बार दोहराएगा? वही चीज़ धीरे धीरे तुझे गढ़ती जाएगी।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

पौलुस ने दो बहनों का नाम चिट्ठी में लिख दिया, जो पूरी कलीसिया के सामने पढ़ी जानी थी: "मैं यूओदिया से विनती करता हूँ, और सुन्तुखे से भी विनती करता हूँ कि वे प्रभु में एक मन रहें।" ये दोनों सुसमाचार के काम में उसके साथ परिश्रम कर चुकी थीं। यानी सेवा करते हुए भी मन फट सकता है। सोचो, तुम्हारे और किसके बीच ऐसी दूरी है जिसे तुमने "छोटी बात" कहकर टाल रखा है?

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