12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

जकर्याह 6

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

जकर्याह एक और दर्शन देखते हैं। दो पहाड़ों के बीच से चार रथ निकलते हैं, हर रथ में अलग रंग के घोड़े जुते हैं, लाल, काले, श्वेत, और चितकबरे-बादामी। ये पहाड़ पीतल के हैं, यानी मजबूत, अटल। जकर्याह पूछते हैं, "ये क्या हैं?" दूत उत्तर देता है कि ये आकाश की चारों वायु हैं, जो सारी पृथ्वी के प्रभु के सामने खड़ी रहती हैं और अब निकल आई हैं। हर रथ एक दिशा में जाता है, उत्तर, पश्चिम, दक्षिण। जो उत्तर की ओर गए, उनके बारे में परमेश्वर कहते हैं कि उन्होंने वहाँ उनके प्राण को ठंडा किया है, यानी उस दिशा में जो कुछ हुआ, उससे परमेश्वर का क्रोध शांत हुआ। उत्तर वह दिशा थी जहाँ से बड़ी शक्तियाँ इस्राएल पर हमला करती थीं। यह दर्शन दिखाता है कि परमेश्वर पूरी पृथ्वी पर, हर दिशा में, नियंत्रण रखते हैं।

इसके बाद कहानी बदल जाती है। परमेश्वर जकर्याह से कहते हैं कि बाबेल से लौटे कुछ लोगों से सोना-चाँदी लें और उससे एक मुकुट बनाकर महायाजक यहोशू के सिर पर रखें। यह अजीब है, क्योंकि मुकुट तो राजा के लिए होता है, याजक के लिए नहीं। फिर परमेश्वर एक भविष्यवाणी देते हैं, एक पुरुष आएगा जिसका नाम "शाख" यानी "टहनी" या "अंकुर" है। वह अपने ही स्थान से उगेगा, यहोवा के मंदिर को बनाएगा, महिमा पाएगा, और अपने सिंहासन पर बैठकर प्रभुता करेगा। और उसके सिंहासन के पास एक याजक भी रहेगा, दोनों के बीच मेल की सम्मति होगी। फिर वह मुकुट मंदिर में स्मरण के रूप में रखा जाएगा, और दूर-दूर के लोग आकर मंदिर बनाने में मदद करेंगे।

इसका अर्थ क्या है?

यह अध्याय दो सच्चाइयों को साथ रखता है जो पहली नज़र में मेल नहीं खातीं। एक तरफ, इतिहास की बड़ी ताकतें, साम्राज्य, युद्ध, दिशाएँ, सब परमेश्वर के हाथ में हैं। वे किसी अंधी घटना का नतीजा नहीं हैं। दूसरी तरफ, एक छोटा-सा, टूटा हुआ समुदाय है, जो बाबेल से लौटा है, जिसका मंदिर मलबे में पड़ा है, और परमेश्वर उस समुदाय के बीच एक याजक को बुलाकर उसे राजसी मुकुट पहनाते हैं। यह अजीब मेल क्यों?

क्योंकि परमेश्वर यह दिखा रहे हैं कि उनकी योजना इतिहास की मशीनरी से बड़ी है, फिर भी वह एक व्यक्ति में, एक साधारण जगह में, उतरती है। "शाख" शब्द यशायाह की भविष्यवाणियों से जुड़ा है, वह एक ऐसे आने वाले के बारे में बात करता है जो राजा और याजक दोनों होगा, जो अकेला मंदिर बनाएगा और मेल स्थापित करेगा। यहोशू सिर्फ एक संकेत है, एक छाया, उस असली की ओर जो अभी आना बाकी है।

बड़ी कहानी से संबंध

यह पूरा अध्याय एक इशारे की तरह है, एक उँगली जो आगे की ओर इशारा करती है। पुराने इस्राएल में राजा और याजक अलग-अलग व्यक्ति होते थे, क्योंकि कोई भी इंसान दोनों काम पूरी तरह नहीं कर सकता था। लेकिन यहाँ भविष्यवाणी कहती है कि एक ही व्यक्ति दोनों होगा, राजा भी और याजक भी, और उन दोनों के बीच "मेल की सम्मति" होगी। यह भविष्यवाणी यीशु मसीह में पूरी होती है। वे राजा हैं, जो अपने सिंहासन पर प्रभुता करते हैं, और वे याजक भी हैं, जो अपने ही बलिदान से मेल कराते हैं। उन्हें किसी दूसरे याजक की जरूरत नहीं, क्योंकि वे स्वयं वह जगह हैं जहाँ परमेश्वर और मनुष्य मिलते हैं।

और चार रथ भी इसी कहानी में फिट होते हैं। जब यीशु आते हैं, तो वे कहते हैं कि सारा अधिकार उन्हें दिया गया है, स्वर्ग और पृथ्वी में। जो चार वायु जकर्याह के दर्शन में परमेश्वर के सामने खड़ी थीं, वे अब उस राजा-याजक के अधीन काम करती हैं। इतिहास की दिशा बदलती नहीं है अपने आप, वह किसी के हाथ में है, और वह हाथ छिदा हुआ है।

तुम्हारे लिए

तुम्हारी ज़िंदगी में भी शायद ऐसा ही तनाव है। एक तरफ बड़ी बातें हैं, जो तुम्हारे नियंत्रण में नहीं, राजनीति, दुनिया की हालत, तुम्हारा भविष्य, जिसके बारे में तुम कुछ खास नहीं कर सकते। दूसरी तरफ तुम्हारी अपनी छोटी दुनिया है, तुम्हारे दिन, तुम्हारे रिश्ते, तुम्हारा विश्वास जो कभी मज़बूत लगता है और कभी बिल्कुल कमज़ोर। यह अध्याय कहता है कि दोनों एक ही परमेश्वर के हाथ में हैं। तुम इतिहास को नहीं चला सकते, लेकिन जिसने चारों वायु को नियंत्रण में रखा, वही तुम्हारी आज की परेशानी को भी जानता है।

और यह भी याद रखने लायक है कि परमेश्वर टूटी हुई चीज़ों से शुरुआत करते हैं, न कि पूर्ण चीज़ों से। यहोशू कोई राजा नहीं था, एक याजक था, एक साधारण आदमी बाबेल की गुलामी से लौटा हुआ। फिर भी उसे मुकुट मिला, एक संकेत के रूप में। यदि तुम्हें लगता है कि तुम्हारा विश्वास बहुत कच्चा है, तुम्हारे सवाल बहुत ज़्यादा हैं, याद रखो कि परमेश्वर छोटी और अधूरी शुरुआतों से बड़े काम करते हैं। असली सवाल यह नहीं कि तुम कितने तैयार हो, बल्कि यह कि तुम किसकी ओर देख रहे हो।

चर्चा करें

अगर परमेश्वर सचमुच इतिहास की हर दिशा को नियंत्रित करते हैं, तो दुनिया में इतनी बुराई क्यों है? यह दर्शन उस सवाल को कैसे छूता है, और कहाँ रुक जाता है?

यीशु राजा और याजक दोनों हैं। इसका तुम्हारे लिए व्यावहारिक रूप से क्या मतलब है, जब तुम अपने पाप और अपनी असुरक्षा के साथ उनके सामने आते हो?

साथ में प्रार्थना

प्रभु, आप इतिहास की हर दिशा को जानते हैं, और फिर भी आप मेरी छोटी सी ज़िंदगी को भी देखते हैं। मुझे विश्वास दें कि यीशु मसीह मेरे राजा भी हैं और मेरे और आपके बीच मेल कराने वाले याजक भी। जब मेरा विश्वास कमज़ोर लगे, तो मुझे याद दिलाएँ कि आप टूटी हुई शुरुआतों से बड़ा काम करते हैं। आमीन।

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जकर्याह 6 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

जकर्याह 6 किस विषय में है?
जकर्याह एक और दर्शन देखते हैं। दो पहाड़ों के बीच से चार रथ निकलते हैं, हर रथ में अलग रंग के घोड़े जुते हैं, लाल, काले, श्वेत, और चितकबरे-बादामी। ये पहाड़ पीतल के हैं, यानी मजबूत, अटल। जकर्याह पूछते हैं, "ये क्या हैं?" दूत उत्तर देता है कि ये आकाश की चारों वायु हैं, जो सारी पृथ्वी के प्रभु के सामने खड़ी रहती हैं और अब निकल आई हैं। हर रथ एक दिशा में जाता है, उत्तर, पश्चिम, दक्षिण। जो उत्तर की ओर गए, उनके बारे में परमेश्वर कहते हैं कि उन्होंने वहाँ उनके प्राण को ठंडा किया है, यानी उस दिशा में जो कुछ हुआ, उससे परमेश्वर का क्रोध शांत हुआ। उत्तर वह दिशा थी जहाँ से बड़ी शक्तियाँ इस्राएल पर हमला करती थीं। यह दर्शन दिखाता है कि परमेश्वर पूरी पृथ्वी पर, हर दिशा में, नियंत्रण रखते हैं।
जकर्याह 6 क्या कहता है?
यह अध्याय दो सच्चाइयों को साथ रखता है जो पहली नज़र में मेल नहीं खातीं। एक तरफ, इतिहास की बड़ी ताकतें, साम्राज्य, युद्ध, दिशाएँ, सब परमेश्वर के हाथ में हैं। वे किसी अंधी घटना का नतीजा नहीं हैं। दूसरी तरफ, एक छोटा-सा, टूटा हुआ समुदाय है, जो बाबेल से लौटा है, जिसका मंदिर मलबे में पड़ा है, और परमेश्वर उस समुदाय के बीच एक याजक को बुलाकर उसे राजसी मुकुट पहनाते हैं। यह अजीब मेल क्यों?
जकर्याह 6 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह पूरा अध्याय एक इशारे की तरह है, एक उँगली जो आगे की ओर इशारा करती है। पुराने इस्राएल में राजा और याजक अलग-अलग व्यक्ति होते थे, क्योंकि कोई भी इंसान दोनों काम पूरी तरह नहीं कर सकता था। लेकिन यहाँ भविष्यवाणी कहती है कि एक ही व्यक्ति दोनों होगा, राजा भी और याजक भी, और उन दोनों के बीच "मेल की सम्मति" होगी। यह भविष्यवाणी यीशु मसीह में पूरी होती है। वे राजा हैं, जो अपने सिंहासन पर प्रभुता करते हैं, और वे याजक भी हैं, जो अपने ही बलिदान से मेल कराते हैं। उन्हें किसी दूसरे याजक की जरूरत नहीं, क्योंकि वे स्वयं वह जगह हैं जहाँ परमेश्वर और मनुष्य मिलते हैं।
किशोर जकर्याह 6 से क्या सीख सकते हैं?
तुम्हारी ज़िंदगी में भी शायद ऐसा ही तनाव है। एक तरफ बड़ी बातें हैं, जो तुम्हारे नियंत्रण में नहीं, राजनीति, दुनिया की हालत, तुम्हारा भविष्य, जिसके बारे में तुम कुछ खास नहीं कर सकते। दूसरी तरफ तुम्हारी अपनी छोटी दुनिया है, तुम्हारे दिन, तुम्हारे रिश्ते, तुम्हारा विश्वास जो कभी मज़बूत लगता है और कभी बिल्कुल कमज़ोर। यह अध्याय कहता है कि दोनों एक ही परमेश्वर के हाथ में हैं। तुम इतिहास को नहीं चला सकते, लेकिन जिसने चारों वायु को नियंत्रण में रखा, वही तुम्हारी आज की परेशानी को भी जानता है।
जकर्याह 6 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
अगर परमेश्वर सचमुच इतिहास की हर दिशा को नियंत्रित करते हैं, तो दुनिया में इतनी बुराई क्यों है? यह दर्शन उस सवाल को कैसे छूता है, और कहाँ रुक जाता है?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 14

निर्वासितों ने बाबुल से जो चाँदी और सोना लाया, वह मुकुट बनकर मन्दिर में रखा गया, "स्मरण के लिये।" उनके नाम आज भी लिखे हैं, हेलेम, तोबिय्याह, यदायाह, हेन। किसी ने उन्हें भीड़ में गिना नहीं होगा, पर परमेश्वर ने उनका दिया हुआ सामने रख छोड़ा। तेरी चुपचाप दी हुई भेंट भी उससे छिपी नहीं है।

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