बाइबल व्याख्या

1 इतिहास 19

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

दाऊद अम्मोनियों के राजा नाहाश की मृत्यु पर उसके पुत्र हानून को सांत्वना देने के लिए दूत भेजता है, क्योंकि नाहाश ने कभी उस पर प्रीति दिखाई थी। हानून के हाकिम इस सद्भाव को जासूसी समझते हैं, और हानून दूतों की दाढ़ियाँ मुँड़वाकर, उनके वस्त्र नितम्ब तक कटवाकर उन्हें अपमानित करके लौटा देता है। फिर डर के मारे अम्मोनी भारी धन देकर अरामी भाड़े की सेनाएँ बुलाते हैं; योआब और अबीशै दो मोर्चों पर लड़ते हैं, अरामी और अम्मोनी दोनों भागते हैं, और अंततः हदादेजेर के कर्मचारी दाऊद के अधीन होकर संधि कर लेते हैं। एक शोक-संदेश से शुरू हुई कहानी एक साम्राज्य के विस्तार पर समाप्त होती है।

मर्म

यह अध्याय एक असहज सच्चाई खोलता है: अनुग्रह को ठुकराया जा सकता है, और ठुकराया गया अनुग्रह अपने आप न्याय का रूप ले लेता है। दाऊद जो भेजता है वह सेना नहीं, शान्ति है। हानून उसमें षड्यंत्र देखता है। यहाँ मनुष्य का मूल रोग दिखता है: हम भलाई को भी शत्रुता मानकर पढ़ते हैं, क्योंकि हमारा भीतरी संसार संदेह से बना है। परमेश्वर का राज्य इस कहानी में तलवार से नहीं, बल्कि एक सांत्वना-पत्र से शुरू होता है, और जब वह पत्र फाड़ा जाता है तब तलवार उठती है। इतिहास की पुस्तक यह दिखाना चाहती है कि दाऊद का राज्य आक्रामक लालच से नहीं, बल्कि दूसरों की प्रतिक्रिया से फैलता है। परमेश्वर की वाचा-निष्ठा का तिरस्कार कभी तटस्थ नहीं रहता।

सूत्र

वचन 2 में "प्रीति" के पीछे इब्रानी शब्द हेसेद है, वह वाचा-निष्ठा जिससे परमेश्वर अपने लोगों से बँधे हैं। दाऊद एक गैर-इस्राएली राजा के प्रति यही निष्ठा निभाना चाहता है, और यही इस कहानी को बड़ी कथा से जोड़ता है। परमेश्वर भी संसार के पास पहले दूत भेजते हैं, सेना नहीं; और संसार उन दूतों के साथ वही करता है जो हानून ने किया, अपमान और विकृति। अन्ततः परमेश्वर अपने पुत्र को भेजते हैं, और उसकी दाढ़ी नोची जाती है, उसके वस्त्र उतारे जाते हैं, उसे नंगा करके अपमानित किया जाता है। अन्तर यह है कि मसीह का अपमान बदले की लड़ाई नहीं, बल्कि शत्रुओं के लिए संधि का द्वार बन गया। वही संधि जो अरामी हार के बाद पाते हैं, हमें क्रूस के नीचे अनुग्रह से मिलती है।

दर्पण

आपके जीवन में भी कोई है जिसने आपकी ओर बढ़ा हुआ हाथ गलत पढ़ा, और कोई ऐसा भी है जिसका हाथ आपने गलत पढ़ा। हानून के हाकिमों की आवाज़ परिचित लगती है: "इसके पीछे कुछ और होगा।" वह आवाज़ दफ़्तर में सहकर्मी की तारीफ़ पर शक करती है, परिवार में माफ़ी माँगते भाई की नीयत खोदती है, कलीसिया में मदद के प्रस्ताव में राजनीति सूँघती है। सावधानी बुद्धिमानी है, पर संदेह जब स्वभाव बन जाए तो वह हमें हानून की तरह अकेला और युद्धरत छोड़ देता है। दूसरी ओर दाऊद का व्यवहार भी देखिए: वह अपमानित लोगों से शर्मिंदगी छिपाने को नहीं कहता, वह उन्हें यरीहो में समय देता है। आज किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसकी नीयत पर आपने हाल में भीतर ही भीतर शक किया, एक छोटा संदेश भेजिए जिसमें केवल धन्यवाद हो, कोई शिकायत या शर्त नहीं।

अन्तर्पाठ

नाहाश का नाम हमें 1 शमूएल 11 में ले जाता है, जहाँ यही अम्मोनी राजा याबेश-गिलाद के लोगों की दाहिनी आँखें फोड़ने की शर्त रखता है। यानी दाऊद उस घराने पर प्रीति दिखा रहा है जिसने इस्राएल को क्रूरता से अपमानित किया था; अनुग्रह योग्यता नहीं देखता, वह केवल दिया जाता है। दूसरी ओर पौलुस रोमियों में लिखता है कि परमेश्वर की कृपा मनुष्य को मन फिराव की ओर ले जाने के लिए है, पर कठोर मन उसी कृपा से अपने लिए क्रोध जमा करता है। हानून इसका जीवित उदाहरण है: उसके हाथ में सांत्वना का पत्र था और उसने उसे युद्ध की घोषणा में बदल दिया। एक ही अनुग्रह, दो परिणाम, और अन्तर मनुष्य के मन में है।

बारीकी

सबसे मार्मिक पंक्ति युद्ध में नहीं, वचन 5 में है: "जब तक तुम्हारी दाढ़ियाँ बढ़ न जाएँ, तब तक यरीहो में ठहरे रहो।" प्राचीन पूर्व में दाढ़ी पुरुष की गरिमा और वाचा-पहचान का चिह्न थी; उसे मुँड़वाना किसी को सार्वजनिक रूप से शिशु बना देना था। दाऊद इन लोगों को तुरन्त दरबार में नहीं बुलाता, न ही उनकी लज्जा पर प्रवचन देता है। वह उन्हें सीमा-नगर यरीहो में रुकने को कहता है, जब तक समय उनके शरीर पर वह लौटा न दे जो शत्रु ने छीना। यह परमेश्वर के व्यवहार की छवि है: वे हमारी लज्जा को जल्दबाज़ी में ढकने के बजाय चंगाई के लिए जगह और समय देते हैं। अनुग्रह कभी-कभी प्रतीक्षालय जैसा दिखता है।

मुख्य पात्र

दाऊद यहाँ योद्धा से पहले शोक-संवेदना भेजने वाला पड़ोसी है, और यही उसे दिलचस्प बनाता है। वह प्रीति का कर्ज़ याद रखता है, अपने अपमानित सेवकों की गरिमा की रक्षा करता है, और युद्ध तब लड़ता है जब उसे थोपा जाता है। फिर भी ध्यान दीजिए कि निर्णायक धार्मिक वाक्य दाऊद के मुँह से नहीं, योआब के मुँह से निकलता है: "यहोवा जैसा उसको अच्छा लगे, वैसा ही करेगा।" यह न भाग्यवाद है, न विजय का घमंड; यह एक सेनापति की स्वीकृति है कि मोर्चा हम बाँधते हैं, परिणाम परमेश्वर देते हैं। इस अध्याय का असली मुख्य पात्र वही हैं, जो पर्दे के पीछे रहते हुए एक ठुकराई गई सांत्वना को अपने राज्य के विस्तार में बदल देते हैं।

चिन्तन

किसकी भलाई को मैंने हाल ही में हानून की तरह "ज़रूर कुछ चाल होगी" मानकर पढ़ा, और वह संदेह मेरे मन में कहाँ से आता है?

योआब की तरह पूरी ताकत से मोर्चा बाँधना और फिर परिणाम परमेश्वर पर छोड़ देना, मेरे किस ठोस दायित्व में आज इसका अर्थ होगा?

1 Chronicles में और गहराई से जानें

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The Message of Chronicles

Michael Wilcock

Shows why the retold history of Chronicles is a book of hope.

1 Chronicles: An Introduction and Commentary

Martin Selman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

1 and 2 Chronicles

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1 Chronicles 19 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 इतिहास 19 का क्या अर्थ है?
दाऊद अम्मोनियों के राजा नाहाश की मृत्यु पर उसके पुत्र हानून को सांत्वना देने के लिए दूत भेजता है, क्योंकि नाहाश ने कभी उस पर प्रीति दिखाई थी। हानून के हाकिम इस सद्भाव को जासूसी समझते हैं, और हानून दूतों की दाढ़ियाँ मुँड़वाकर, उनके वस्त्र नितम्ब तक कटवाकर उन्हें अपमानित करके लौटा देता है। फिर डर के मारे अम्मोनी भारी धन देकर अरामी भाड़े की सेनाएँ बुलाते हैं; योआब और अबीशै दो मोर्चों पर लड़ते हैं, अरामी और अम्मोनी दोनों भागते हैं, और अंततः हदादेजेर के कर्मचारी दाऊद के अधीन होकर संधि कर लेते हैं। एक शोक-संदेश से शुरू हुई कहानी एक साम्राज्य के विस्तार पर समाप्त होती है।
1 इतिहास 19 किस विषय में है?
वचन 2 में "प्रीति" के पीछे इब्रानी शब्द हेसेद है, वह वाचा-निष्ठा जिससे परमेश्वर अपने लोगों से बँधे हैं। दाऊद एक गैर-इस्राएली राजा के प्रति यही निष्ठा निभाना चाहता है, और यही इस कहानी को बड़ी कथा से जोड़ता है। परमेश्वर भी संसार के पास पहले दूत भेजते हैं, सेना नहीं; और संसार उन दूतों के साथ वही करता है जो हानून ने किया, अपमान और विकृति। अन्ततः परमेश्वर अपने पुत्र को भेजते हैं, और उसकी दाढ़ी नोची जाती है, उसके वस्त्र उतारे जाते हैं, उसे नंगा करके अपमानित किया जाता है। अन्तर यह है कि मसीह का अपमान बदले की लड़ाई नहीं, बल्कि शत्रुओं के लिए संधि का द्वार बन गया। वही संधि जो अरामी हार के बाद पाते हैं, हमें क्रूस के नीचे अनुग्रह से मिलती है।
1 इतिहास 19 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
नाहाश का नाम हमें 1 शमूएल 11 में ले जाता है, जहाँ यही अम्मोनी राजा याबेश-गिलाद के लोगों की दाहिनी आँखें फोड़ने की शर्त रखता है। यानी दाऊद उस घराने पर प्रीति दिखा रहा है जिसने इस्राएल को क्रूरता से अपमानित किया था; अनुग्रह योग्यता नहीं देखता, वह केवल दिया जाता है। दूसरी ओर पौलुस रोमियों में लिखता है कि परमेश्वर की कृपा मनुष्य को मन फिराव की ओर ले जाने के लिए है, पर कठोर मन उसी कृपा से अपने लिए क्रोध जमा करता है। हानून इसका जीवित उदाहरण है: उसके हाथ में सांत्वना का पत्र था और उसने उसे युद्ध की घोषणा में बदल दिया। एक ही अनुग्रह, दो परिणाम, और अन्तर मनुष्य के मन में है।
1 इतिहास 19 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
दाऊद यहाँ योद्धा से पहले शोक-संवेदना भेजने वाला पड़ोसी है, और यही उसे दिलचस्प बनाता है। वह प्रीति का कर्ज़ याद रखता है, अपने अपमानित सेवकों की गरिमा की रक्षा करता है, और युद्ध तब लड़ता है जब उसे थोपा जाता है। फिर भी ध्यान दीजिए कि निर्णायक धार्मिक वाक्य दाऊद के मुँह से नहीं, योआब के मुँह से निकलता है: "यहोवा जैसा उसको अच्छा लगे, वैसा ही करेगा।" यह न भाग्यवाद है, न विजय का घमंड; यह एक सेनापति की स्वीकृति है कि मोर्चा हम बाँधते हैं, परिणाम परमेश्वर देते हैं। इस अध्याय का असली मुख्य पात्र वही हैं, जो पर्दे के पीछे रहते हुए एक ठुकराई गई सांत्वना को अपने राज्य के विस्तार में बदल देते हैं।
1 इतिहास 19 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
योआब की तरह पूरी ताकत से मोर्चा बाँधना और फिर परिणाम परमेश्वर पर छोड़ देना, मेरे किस ठोस दायित्व में आज इसका अर्थ होगा?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

1 Chronicles 19 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

योआब चारों ओर से घिरा था, आगे अरामी, पीछे अम्मोनी। उसने सेना बाँटी और भाई से कहा, "यदि अरामी मुझ पर प्रबल होने लगें, तो तू मेरी सहायता करना; और यदि अम्मोनी तुझ पर प्रबल होने लगें, तो मैं तेरी सहायता करूँगा।" दोनों अलग मोर्चों पर थे, पर एक दूसरे की पीठ पर नज़र रखे हुए। तेरी लड़ाई में कौन ऐसा खड़ा है? और तू किसकी पीठ देख रहा है?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 7

पिता, जब मेरे विरुद्ध ताकतें जुटती दिखती हैं और गिनती मेरे खिलाफ लगती है, तब मेरे मन को थाम लीजिए। मुझे सिखाइए कि सुरक्षा रथों और हथियारों में नहीं, आपके साथ होने में है। डर के बीच भी मैं आप पर भरोसा रखना चुनूँ।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 5

दाऊद ने अपने अपमानित सेवकों से यह नहीं कहा कि "जल्दी लौट आओ, काम बाकी है।" उसने कहा, "जब तक तुम्हारी दाढ़ियाँ बढ़ न जाएँ, तब तक यरीहो में ठहरे रहो, तब लौट आना।" उसने उनकी लज्जा को समय दिया। परमेश्वर भी तुम्हारे घावों पर जल्दबाजी नहीं करता। कभी-कभी उसकी सेवा का पहला कदम यही होता है, ठहर जाना और भरने देना।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 15

पिता, जब आस पास के लोग हार मानकर पीछे हट जाते हैं, तो मेरा मन भी डगमगाने लगता है। मुझे भीड़ के डर से नहीं, तेरे भरोसे से चलना सिखा। जहाँ तू मुझे खड़ा करता है, वहाँ टिके रहने का साहस दे, क्योंकि लड़ाई का अंत तेरे ही हाथ में है।

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