बाइबल व्याख्या

1 शमूएल 11

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

अम्मोनी नाहाश गिलाद के याबेश के सामने डेरा डालता है, और शहर हार मानने को तैयार है; पर वह जो शर्त रखता है वह सिर्फ़ अधीनता नहीं माँगती, वह चेहरा बिगाड़ना चाहती है, "मैं तुम सभी की दाहिनी आँखें फोड़कर इसे सारे इस्राएल की नामधराई का कारण कर दूँ।" सात दिन की मोहलत माँगी जाती है, दूत निकलते हैं, और शाऊल खेत से बैलों के पीछे-पीछे लौटते हुए रोने की आवाज़ सुनता है। उसी क्षण परमेश्वर का आत्मा उस पर बल से उतरता है, उसका कोप भड़कता है, वह बैलों के टुकड़े देश भर में भेजता है, और तीन लाख तीस हज़ार लोग एक मन होकर निकल आते हैं। भोर के अन्तिम पहर में अम्मोनी छावनी टूटती है, बदला लेने की माँग को शाऊल ठुकराता है, और गिलगाल में राज्य नये सिरे से स्थापित होता है।

मूल मर्म

ध्यान दीजिए कि इस अध्याय में सबसे पहले कौन बोलता है और सबसे ज़्यादा कौन चुप है। नाहाश बोलता है, याबेश के लोग बोलते हैं, दूत बोलते हैं, लोग रोते हैं, शाऊल गरजता है। परमेश्वर एक शब्द नहीं कहते। और फिर भी पूरी कहानी का धुरा वह छोटा-सा वाक्य है, "शाऊल पर परमेश्वर का आत्मा बल से उतरा।" यहाँ परमेश्वर बोलकर नहीं, उतरकर हस्तक्षेप करते हैं। यह वही आत्मा है जो न्यायियों की पुस्तक में गिदोन और यिप्तह पर उतरा था; यानी इस्राएल को राजा मिल तो गया, पर छुटकारा अब भी वहीं से आता है जहाँ से पहले आता था, ऊपर से, बिना माँगे, बिना योग्यता के। और शाऊल स्वयं इसे जानता है, इसलिए जीत के बाद जब लोग खून बहाना चाहते हैं तो वह कहता है, "आज यहोवा ने इस्राएलियों को छुटकारा दिया है।" उद्धार का श्रेय जिस क्षण मनुष्य लेने लगता है, उसी क्षण वह बदले की भाषा बोलने लगता है। यही इस अध्याय की चुपचाप कही गई सच्चाई है।

सूत्र

याबेश के लोग सात दिन माँगते हैं, और वे यह जानकर माँगते हैं कि शायद कोई न आए। "यदि हमको कोई बचानेवाला न मिलेगा, तो हम तेरे ही पास निकल आएँगे।" यह प्रार्थना की सबसे नंगी शक्ल है: एक तयशुदा समयसीमा, और उसके पार अंधेरा। पूरे पवित्रशास्त्र में परमेश्वर बार-बार ऐसे ही ऐन वक़्त पर आते हैं, न पहले, न बाद में। और वह बचानेवाला हमेशा वहीं से आता है जहाँ कोई नहीं देख रहा था: खेत से, बैलों के पीछे से, गिबा के एक अनजान आदमी से। सदियों बाद नासरत से आया एक बढ़ई इसी नमूने को पूरा करेगा, ऐसा उद्धारकर्ता जिसे लोग पहचानते नहीं क्योंकि वह गलत जगह से आया। इस्राएल का राजा पहली बार तब राजा दिखता है जब वह अपने लिए नहीं, दूसरों के अपमान के लिए क्रोधित होता है।

दर्पण

नाहाश एक आँख नहीं, इज़्ज़त फोड़ना चाहता है; वह चाहता है कि हर बार जब कोई याबेश के आदमी को देखे तो उसे इस्राएल की हार याद आए। हमारे जीवन में भी अपमान अक्सर इसी तरह काम करता है: दफ़्तर में वह टिप्पणी, परिवार में वह पुराना ताना, कर्ज़ की वह चिट्ठी जो सिर्फ़ पैसा नहीं, चेहरा माँगती है। और सबसे ख़तरनाक क्षण जीत के बाद आता है, जब लोग कहते हैं, "उनको लाओ कि हम उन्हें मार डालें।" जब आपको आख़िरकार सही ठहराया जाता है, तब आपके भीतर का हिसाब-किताबी जाग उठता है। आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसने आपको छोटा महसूस कराया, और उसके नीचे लिख दीजिए, "आज कोई मार डाला न जाएगा।"

अन्य वचनों की गूँज

याबेश-गिलाद कोई अनजान नाम नहीं था। न्यायियों की पुस्तक के आख़िरी, भयानक अध्यायों में इसी शहर से बिन्यामीन के बचे हुए लोगों को स्त्रियाँ दी गई थीं, यानी शाऊल के अपने गोत्र का ख़ून याबेश से जुड़ा था। शाऊल दूर के अजनबियों के लिए नहीं, अपने रिश्तेदारों के लिए उठता है, और फिर भी परमेश्वर का आत्मा उस स्वाभाविक क्रोध को अपने काम में जोत लेता है। और कहानी लौटकर आती है: पहला शमूएल के अन्त में, जब शाऊल का शव दीवार पर टाँगा जाएगा, याबेश के ही लोग रातों-रात जाकर उसे उतार लाएँगे। जो कर्ज़ चुकाया गया, वह याद रखा गया। कृतज्ञता इस्राएल में इतनी दुर्लभ है कि जहाँ मिलती है, वहाँ चमकती है।

कठिन प्रश्न

बैलों के टुकड़े काटकर देश भर में भेजना, और साथ में धमकी, "जो कोई आकर शाऊल और शमूएल के पीछे न हो लेगा उसके बैलों से ऐसा ही किया जाएगा।" यह पवित्र आत्मा की प्रेरणा है या डर की राजनीति? पाठ दोनों को अलग नहीं करता; वह बस कहता है कि आत्मा उतरा और फिर यह हुआ, और फिर "यहोवा का भय लोगों में ऐसा समाया।" हमें सुविधा होती अगर परमेश्वर हमेशा साफ़-सुथरे औज़ारों से काम करते। पर वे उसी शाऊल को उठाते हैं जो आगे चलकर इसी क्रोध के हाथों टूटेगा। यहाँ जवाब देने के बजाय चुप बैठना ईमानदारी है: परमेश्वर मनुष्यों को उनकी पूरी उलझी हुई हालत में इस्तेमाल करते हैं, और यह न उन्हें पवित्र करता है, न परमेश्वर को अपवित्र।

मुख्य पात्र

शाऊल इस अध्याय में सबसे ऊँचा है और सबसे कम जानता है कि वह ऊँचा है। वह अभिषिक्त हो चुका है, फिर भी बैल हाँक रहा है; वह पूछता है, "लोगों को क्या हुआ कि वे रोते हैं?" जैसे यह उसका मामला ही न हो। उसकी महानता जीत में नहीं, तेरहवीं आयत में है, जब वह भीड़ के हाथ से बदला छीन लेता है। यही वह आदमी है जो बाद में एक बलिदान के लिए बेसब्र हो जाएगा और एक शत्रु को बख़्श देने के कारण राज्य खो देगा। पढ़ते हुए मन भारी होता है: यहाँ हम देख रहे हैं कि वह क्या हो सकता था। परमेश्वर का आत्मा उतरता है; उसे थामे रखना दूसरी बात है।

चिन्तन के प्रश्न

जिस अपमान को आप अब भी याद रखे हुए हैं, उसमें आप याबेश के लोग हैं या नाहाश?

"आज यहोवा ने इस्राएलियों को छुटकारा दिया है" कहना आपके किस झगड़े को इसी हफ़्ते बदल देगा?

1 Samuel में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

1 Samuel: Looking on the Heart

Dale Ralph Davis

Storytelling commentary at its best, from Hannah's prayer to David's rise.

The Message of Samuel

Mary Evans

One clear guide through both books of Samuel and their flawed kings.

1 Samuel For You

Tim Chester

Accessible walk through Samuel, Saul and David with constant application.

1 and 2 Samuel: An Introduction and Commentary

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1 and 2 Samuel

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1 Samuel 11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 शमूएल 11 का क्या अर्थ है?
अम्मोनी नाहाश गिलाद के याबेश के सामने डेरा डालता है, और शहर हार मानने को तैयार है; पर वह जो शर्त रखता है वह सिर्फ़ अधीनता नहीं माँगती, वह चेहरा बिगाड़ना चाहती है, "मैं तुम सभी की दाहिनी आँखें फोड़कर इसे सारे इस्राएल की नामधराई का कारण कर दूँ।" सात दिन की मोहलत माँगी जाती है, दूत निकलते हैं, और शाऊल खेत से बैलों के पीछे-पीछे लौटते हुए रोने की आवाज़ सुनता है। उसी क्षण परमेश्वर का आत्मा उस पर बल से उतरता है, उसका कोप भड़कता है, वह बैलों के टुकड़े देश भर में भेजता है, और तीन लाख तीस हज़ार लोग एक मन होकर निकल आते हैं। भोर के अन्तिम पहर में अम्मोनी छावनी टूटती है, बदला लेने की माँग को शाऊल ठुकराता है, और गिलगाल में राज्य नये सिरे से स्थापित होता है।
1 शमूएल 11 किस विषय में है?
याबेश के लोग सात दिन माँगते हैं, और वे यह जानकर माँगते हैं कि शायद कोई न आए। "यदि हमको कोई बचानेवाला न मिलेगा, तो हम तेरे ही पास निकल आएँगे।" यह प्रार्थना की सबसे नंगी शक्ल है: एक तयशुदा समयसीमा, और उसके पार अंधेरा। पूरे पवित्रशास्त्र में परमेश्वर बार-बार ऐसे ही ऐन वक़्त पर आते हैं, न पहले, न बाद में। और वह बचानेवाला हमेशा वहीं से आता है जहाँ कोई नहीं देख रहा था: खेत से, बैलों के पीछे से, गिबा के एक अनजान आदमी से। सदियों बाद नासरत से आया एक बढ़ई इसी नमूने को पूरा करेगा, ऐसा उद्धारकर्ता जिसे लोग पहचानते नहीं क्योंकि वह गलत जगह से आया। इस्राएल का राजा पहली बार तब राजा दिखता है जब वह अपने लिए नहीं, दूसरों के अपमान के लिए क्रोधित होता है।
1 शमूएल 11 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
याबेश-गिलाद कोई अनजान नाम नहीं था। न्यायियों की पुस्तक के आख़िरी, भयानक अध्यायों में इसी शहर से बिन्यामीन के बचे हुए लोगों को स्त्रियाँ दी गई थीं, यानी शाऊल के अपने गोत्र का ख़ून याबेश से जुड़ा था। शाऊल दूर के अजनबियों के लिए नहीं, अपने रिश्तेदारों के लिए उठता है, और फिर भी परमेश्वर का आत्मा उस स्वाभाविक क्रोध को अपने काम में जोत लेता है। और कहानी लौटकर आती है: पहला शमूएल के अन्त में, जब शाऊल का शव दीवार पर टाँगा जाएगा, याबेश के ही लोग रातों-रात जाकर उसे उतार लाएँगे। जो कर्ज़ चुकाया गया, वह याद रखा गया। कृतज्ञता इस्राएल में इतनी दुर्लभ है कि जहाँ मिलती है, वहाँ चमकती है।
1 शमूएल 11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
शाऊल इस अध्याय में सबसे ऊँचा है और सबसे कम जानता है कि वह ऊँचा है। वह अभिषिक्त हो चुका है, फिर भी बैल हाँक रहा है; वह पूछता है, "लोगों को क्या हुआ कि वे रोते हैं?" जैसे यह उसका मामला ही न हो। उसकी महानता जीत में नहीं, तेरहवीं आयत में है, जब वह भीड़ के हाथ से बदला छीन लेता है। यही वह आदमी है जो बाद में एक बलिदान के लिए बेसब्र हो जाएगा और एक शत्रु को बख़्श देने के कारण राज्य खो देगा। पढ़ते हुए मन भारी होता है: यहाँ हम देख रहे हैं कि वह क्या हो सकता था। परमेश्वर का आत्मा उतरता है; उसे थामे रखना दूसरी बात है।
1 शमूएल 11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
"आज यहोवा ने इस्राएलियों को छुटकारा दिया है" कहना आपके किस झगड़े को इसी हफ़्ते बदल देगा?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

1 Samuel 11 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 6

शाऊल राजा चुना जा चुका था, फिर भी खेत में बैलों के पीछे चल रहा था। जब याबेश के लोगों की पीड़ा का समाचार आया, तब "परमेश्वर का आत्मा उस पर बल से उतरा, और उसका कोप बहुत भड़क उठा।" ध्यान दे, जब लोगों ने उसका अपना अपमान किया था, वह चुप रह गया था। पर दूसरों के दुख पर वह चुप न रह सका। तेरा क्रोध किस बात पर जागता है, अपनी इज़्ज़त पर या किसी और के आँसुओं पर?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 5

शाऊल राजा अभिषिक्त हो चुका था, फिर भी वह बैलों के पीछे खेत से लौट रहा था। ताज सिर पर नहीं, हल हाथ में। और लौटते ही उसने पूछा, "लोगों को क्या हुआ कि वे रोते हैं?" उसने भीड़ के आँसू देखे, अनदेखा नहीं किया।

परमेश्वर तुम्हें भी शायद किसी बड़े मंच पर नहीं, रोज़ के काम के बीच बुलाए। सवाल यह है, क्या तुम्हें आसपास रोते हुए लोग दिखाई देते हैं?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

गिबा के लोगों तक याबेश की खबर पहुँची और "सब लोग चिल्ला चिल्लाकर रोने लगे।" दूसरों के दुख पर रोना छोटी बात नहीं, पर आँसुओं ने अभी तक किसी की आँख नहीं बचाई थी। परमेश्वर ने उस रोने को शाऊल तक पहुँचाया, जो खेत से बैल हाँकता चला आ रहा था, और तब जाकर बचाव शुरू हुआ। तेरा रोना कहाँ तक पहुँचता है, बस तकिये तक या किसी के काम आने तक?

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